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सुबह सुबह किसी बात पर मूड खराब हुआ तो यह “कूडे के ट्रक वाला सिद्धांत” याद आ गया। कुछ दिन पहले एक ई पत्र में प्राप्त हुआ था। सार कुछ इस तरह से है।

क्या आप एक खराब ड्राइवर, किसी अभद्र कर्मचारी, किसी बदमिजाज दुकानदार के चक्कर में अपना दिन खराब कर लेते हैं? सडक चलते आपसे किसी ने कुछ कह दिया, कोई दुकानदार बद्तमीजी से पेश आया, रेस्तरां में गये और सर्विस अच्छी नही हुई आदि आदि? एक अच्छे/सफल इन्सान का गुण यह है कि वह किस तरह से ऐसी गैरजरूरी बातों को नज़रअंदाज करके अपना ध्यान जरूरी कामों पर लगाये। कूडे के ट्रक का सिद्धांत कहता है कि -

“कई लोग कूडे से भरे ट्रक की तरह होते हैं। वे अपने साथ साथ क्रोध, भय, घृणा, नैराश्य का कचरा अन्दर में समेटे चलते हैं। जैसे जैसे यह कचरा उनके अन्दर भरता चला जाता है, उन्हे इसे कहीं फेंकने की जरूरत महसूस होती है। ठीक कचरे से भरे ट्रक की तरह। हो सकता है बदकिस्मती से आज आप उनके रास्ते में आ गये और उन्होने इसे आपके ऊपर फेंक दिया।

तो अबकी बार कोई अपना कचरा आपके ऊपर इस तरह फेंके, तो इसे दिल पर मत लीजिये। सामने वाले पर तरस खाइये। मुस्कुराकर उसे नजरंदाज कीजिये और खुश रहिये। आप ज्यादा अच्छा और प्रसन्न महसूस करेंगे। और हाँ, ये भी देखें कि कितनी बार हम अपना गुस्सा दूसरों पर उतारते हैं और कचरे के ट्रक की तरह बर्ताव करते हैं।”

ई मेल में इसके रचियता का नाम था, David J Polly. थोडा गूगल किया तो पता चला कि “The Law of Garbage Truck” डेविड साहब का ट्रेड मार्क है। वे एक ख्यातनाम वक्ता और लेखक हैं। कचरे के ट्रक वाली कहानी विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं, अंग्रेजी में। इस पर एक वेबसाइट भी है। यहाँ और यहाँ डेविड साहब के ब्लाग भी हैं।

सिद्धांत सुनने में अच्छा लगता है ना। भारतीय दर्शन पर नज़र डालेंगे तो हमारे यहां इस तरह का दृष्टांत भगवान बुद्ध के प्रेरक प्रसंगों में मिलता है। जब एक व्यक्ति बुद्ध को खूब गालियां देता है पर वो जरा भी विचलित नही होते। शिष्य के पूंछने पर उसे समझाते हैं कि भई जब वो गालियां मैने स्वीकार ही नहीं कीं तो वो तो उसी के पास रही ना। मुझे लगी ही नही। मुझे उससे क्या फर्क पडता है।

सो नया तो कुछ भी नही है, बचपन से पढते आ रहे हैं, जीवन में उतार सकें तो बात बने।

तेलुगु नव वर्ष (युगादि) पर दोस्तों के साथ श्रीसैलम जाने का मौका मिला जहाँ भारत के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक और शक्तिपीठ हैं। सुबह सवेरे की बस पकड कर छः घंटे के सफर के उपरांत श्री सैलम पहुँचे, ये आपने पिछली पोस्ट में पढा। अब आगे….

बस से उतर कर जो आगे का नजारा किया तो भीड देख कर भाई लोग भौंचक रह गये। कन्धे से कन्धा सटा कर चलते लोग। मुझे पूर्णिमा के आसपास गिरिराज जी(गोवर्धन, मथुरा) की परिक्रमा याद आ गई…वैसी ही भीड, रैले का रैला चलता हुआ..२१ किलोमीटर (सात कोस) तक। यहां फर्क ये था कि बस एक किलोमीटर आगे मंदिर तक जाना था…पर दिक्कत ये कि हमें कुछ पता नही था। मित्र रामा एक बार आया था पर इस भीड को देख कर उसका सारा दिशा ज्ञान धरा रह गया। भीड के रेले के साथ साथ चलते हुए मंदिर के पास तक पहुंछे तो बताया गया कि थोडा गलत आ गये हैं…कुछ पीछे से एक मोड मुडना था और दर्शन वाली लाइन उधर ही थी। घूमते फिरते उधर पहुँचे। अभी तक सडक पर चलती भीड देखी थी…अब दर्शन की लाइन देख कर सांस अटक गई। फ्री दर्शन की लाइन का तो कोई पार नही दिख रहा था और ५० रुपये वाले दर्शन में जो मारा मारी हो रही थे वो देखी नही गई। हार कर एक जगह लाइन में लगे जहां सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे बताये गये। सबसे बडी मुश्किल यह कि सूचना देने वाला कोई नही। लोग एक दूसरे से पूंछते और एक दूसरे को जवाब भी दे देते। थोडी देर बाद पता चला कि ये १०० रुपये वाली खिडकी तो बंद पडी है..और टिकट नही मिल रहे हैं। फिर भी खडे रहे। किसी तरह खिडकी तक पहुँचे तो बताया गया कि टिकट अब शाम को ६ बजे मिलेंगे।

३५० वाला…? शाम को।

६०० वाला….? शाम को।

१००० वाला…? ह्म्म्म आपको चाहिये?..मिल सकता है..। नही..शाम को!

मन किया कि आसपास घूम कर दर्शन किये बगैर की लौट जायें..पर नही..आये हैं तो इनसे मिल कर ही जायेंगे। हमें हैदराबाद के अपने पिच्चर हाल याद आये..जहां से हम कभी खाली हाथ नही लौटे चाहे ४० की टिकट ८० में खरीदी हो। अफसोस यहां कोई ब्लेक नही हो रही थी।

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(भीड का पहला नजारा)

मुझे समझ नही आ रहा कि क्या मन्दिर में पैसे देकर दर्शन वाली व्यवस्था होनी चाहिये? या सब एक समान हों और दर्शन की कोई बेहतर व्यवस्था हो। माना कि गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते लेकिन कम से कम इंतजाम तो ठीक किये जा सकते हैं? खडे रहने की व्यवस्था, छाया, सूचना एवं जानकारी आदि आधारभूत व्यवथाएं तो प्रशासन उपलब्ध करवा ही सकता है..या फिर सोंचा हुआ है कि राम जी की मरजी राम जी का खेत। भगवान का घर है..यहां हम क्या कर सकते हैं। खैर ये हमें बाद में पता चला कि युगादि का त्यौहार होने की वजह से उन २-३ दिनों में आम दिनों से २-३ गुनी भीड थी अन्यथा समान्यतः इतनी अव्यव्स्था नही होती। फिर भी चूंकि ये बात पहले से पता होती है सो बेहतर इनतजाम तो किये ही जा सकते हैं।

खैर..सोंचा गया कि भगवान से तो शाम को ही मिलेंगे..आसपास घूम लियी जाये। पहले मंदिर का एक चक्कर काटा, इस आस में कि बेकडोर एंट्री का कोई इंतजाम हो। असफल। मंदिर के पीछे प्रसाद वितरण काउंटर थे जहाँ से पाँच-पाँच रुपये के लड्डू खरीदे और स्वयं ने भोग लगाया। बहुत स्वादिष्ट। फिर होटल में खाना खाया और सोंचा कि रात को लौटने के लिये आखिरी बस में टिकट करवा लेते हैं।बस अड्डे पहुँचे तो वहां एक सूचना चिपकी हुई थी…फलां-फलां-फलां दिन बसों के अग्रिम आरक्षण बंद रहेंगे। अव्यवस्था का एक और नमूना। जिस समय सबसे ज्यादा भीड रहे, सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब सेवाएं बन्द कर दो। पब्लिक अपने आप निपटेगी।

खैर, अब आसपास घूमने निकलना था। घूमने के लिये २१० रुपये में एक आटो किया गया। तय हुआ कि वो हमें साक्षी गणपति, शिखरम एवं अन्य २-३ मंदिर दिखायेगा। हम इस मुगालते में थे कि आसपास ही कोई झरना भी है,जो कि इस २१० वाले पैकेज में शामिल है। तेलुगु में बात हुई थी सो रामा से कहा कि एक बार कनफर्म कर लो। उसने भी हाँ-हूँ करके टाल दिया। खैर, आटो में बैठकर चले। साक्षी गणपति और एक अन्य मंदिर तो २-३ किलोमीटर की दूरी पर ही निकले। हमें लगा कि बेटा आटो वाले ने ठग लिया। उसके बाद गये एक अन्य स्थल पर, जिसका नाम नही पता चला। वहां काफी नीचे सीढियां जाती थीं और नीचे पहाड में से पानी निकल रहा था। लोकेशन एक छोटे मोटे झरने जैसी ही थी,लेकिन सूखा हुआ। शायद बरसात में आते तो नजारा कुछ और होता। यहाँ खत्म करके पूंछा अब कहां..तो बोले शिखरम। यह इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी बताई जाती है। यहाँ सबसे ऊपर नंदी की मूर्ति स्थित है। और वहां से श्रीसैलम कस्बा और मुख्य मंदिर भी नजर आता है। नंदी के दोनों सींगों के बीच में से मंदिर को देखने की परंपरा है, शुभ माना जाता है।लोग देख रहे थे और हम लोगों को देख रहे थे। यहाँ से नीचे उतरे तो पता चला कि यह आटो डील का आखिरी पडाव था और अब वापस हमें श्रीसैलम कस्बा जाना था। झरने के बारे में पूंछा तो बताया गया कि वो तो यहाँ से ६०-७० किलोमीटर दूर है, वो इस डील का हिस्सा नही था!

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(शिखरम से शहर और कृष्णा नदी)

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(नंदी के इन दो सींगों के बीच में से मंदिर देखने की परंपरा है)

वापस पहुँचे करीब पाँच बजे। अभी छः बजने में एक घंटा था पर फिर भी टिकट मिलने के संभावित स्थल पर जाकर भीड में खडे हो लिये। इस बार भी किसी को पता नही था कि टिकट यहीं मिलेंगे अथवा नही। मिलेंगे तो कितने रुपये वाले मिलेंगे। पर हम डटे रहे। अभी सडक पर ही खडे थे और टिकट खिडकी तक पहुँचने वाली रेलिंग का दरवाजा नही खुला था। पौने छः के करीब वो दरवाजा खुला और जो भगदड मची कि अलवर में पिच्चर हाल के बार हुई धक्का मुक्की और बेल्टें याद आ गईं। कुदते फांदते लाइन में लगे और टिकट खिडकी खुलने का इंतजार करने लगे। आखिरकार खिडकी खुली और लाइन सरकना शुरू हुई। टिकट खिडकी के करीब पहुँचकर पता चला कि वहां मात्र साढे छः सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे थे ये “अभिषेकम” के टिकट थे। अन्य किसी टिकट के बारे में जानकारी नही थी और दर्शन तो आज ही करने थे तो टिकट खरीदे गये..जिसमें २ नारियल, एक गुलाबजल की शीशी और एक गमछा साथ में मिला। मंदिर के अंदर पहुँच कर ऐसा लगा कि आधा लडाई फतह हो गई है। पर यहां अन्दर जाकर कहां जाना है यह कोई जानकारी नही थी। हम अलग तरफ से घुसे थे, दर्शन की लाइन (फ्री और पचास रुपये वाले) अलग जा रही थी। एक जगह कुछ लोगों का झुण्ड दिखा जो हमारा वाला ही सामान लिये हुए थे ..उनसे पूंछा तो पता चला कि हमें भी यहीं बैठना था। यह जगह गर्भगृह से थोडा हट कर थी और यहां हमें भगवान का अभिषेक करना था। आखिरकार एक सज्जन आये और उन्होने लाइन लगवाई..सात सात के ग्रुप में अभिषेक करना था भगवान का। उसके पहले ऊपरी वस्त्र (शर्ट और बनियान ) उतारने का आदेश मिला। सो वो उतार कर साफी गले में डाल ली गई। हमें ये चिन्ता थी कि हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर पायेंगे या नही सो अभिषेक करवाने वाले सज्जन से ही पूंछा कि भाईसाहब, मुख्य मंदिर के दर्शन इस पैकेज में शामिल हैं या नहीं। उन्होने हाँ कहा तो तसल्ली हुई। यहां अपना नम्बर आया तो गुलाबजल से भगवान का अभिषेक किया गया, एक नारियल फोडा गया और चल दिये। दर्शन के लिये किधर से जाना है अभी भी यह पता नही थी। एक पुलिसवाले से पूंछा तो उन्होने शार्टकट बताया और हमने एक दरवाजा पार करके सीधे अपने आप को मुख्य मंदिर के अन्दर पाया। चूंकि मंदिर का अंदरूनी भाग बहुत छोटा था और पब्लिक बहुत ज्यादा, सो गर्मी औए उमस भयंकर थी। कुछ AC लगे हुए दिखे पर काम नही कर रहे थे। हमने सोंचा कि हमें तो यहां से चन्द पल में चल देना है, बेचारे भगवान जी का क्या हाल होता था, जो हमेशा यहीं रहते हैं। एकदम मुख्य गृह तो और भी बहुत छोटा था और अंधेरा भी। पंडित लोग खडे थे जो किसी को २ सेकेंड से ज्याद मत्था नही टेकने देते । आप सिर झुकाइये..पीछे से वो आपको झुकायेंगे और उठा देंगे। हमने सिर टिकाया और जो पीछे से धक्का लगा तो भट्ट से सिर टकराया शिवलिंग से। हमने शिवजी से माफी मांगी और निकल लिये। इसके बाद ज्यादा समय नही लगा, शक्तिपीठ के दर्शन किये और थोडी ही देर में हम मंदिर के बाहर थे। बाहर अभी भी भीड जोरदार थी सो हमने निश्चय किया कि अगर भीड में अलग अलग हो गये तो बस स्टेण्ड के पास मिलेंगे। हमें चिन्ता यह थी कि भीड की वजह से लौटती बस में जगह नही मिलेगी। पर ऐसा कुछ नही हुआ। जिस बस में लौटे वो लगभग खाली आई और हम सीट पर लम्बलेट होकर आये। शायद हैदराबाद में हमारे सिवा सबको पता था कि पर श्रीसैलम में कर्नाटक और महाराष्ट्र से आये हुए लोगों की भीड होती है सो अभी ना ही जाया जाये तो बेहतर।

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(शाम को दर्शन के समय भीड)

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पोस्ट कुछ ज्यादा लम्बी हो गई। इस पोस्ट को कुल तीन भागों में बांटने का विचार था पर महसूस कर रहा हूं कि पार्ट में पोस्ट ’कमिट’ तो कर देता हूं..पर एक भाग लिखने के बाद दूसरा भाग लिखना लम्बा खिंच जाता है (या बिल्कुल ही टल जाता है) जो कि गलत है। कम से कम दो पोस्ट्स के दूसरे भाग इस चिट्ठे पर आने की राह देख रहे हैं पर नही आ पा रहे। प्रयास रहेगा कि सीरियल पोस्ट के चक्कर में ना ही पडा जाये।

पंकज उधास साहब के साथ एक शाम का जिक्र मैने अपनी पिछली पोस्ट में किया था। मेरे मित्र मुरली ने कुछ गज़लें अपने मोबाइल पर रिकार्ड की थीं, यू ट्यूब पर उन्हे अब चढा पाया हूँ। आप भी सुनिये।

पहली है, “हुई मंहंगी बहुत शराब, थोडी थोडी पिया करो”। आपने शायद पहले भी सुनी होगी। पर यहाँ लाइव प्रस्तुति में बाँसुरी, तबले, वायलिन और मैंडालिन की जुगलबंदी बहुत जबरदस्त बन पडी है। गज़ल ना सुनें …बस संगीत सुनें तो भी काम चल जायेगा। :) बाँसुरी पर राकेश चौरसिया जी बैठे हैं। बाकि कलाकारों के नाम याद नही रहे। इस तरह की जुगलबंदी मुझे बहुत पसंद है। अनूप जलोटा के कुछ कैसेट्स में इस तरह की जुगलबंदी सुनने को मिलती है। जगजीत सिंह भी कभी कभार प्रयोग करते हैं। और शायद लाइव प्रस्तुतियों की USP भी यही होती है।

इसके बाद सुनिये, “सोने चाँदी जैसा रंग है तेरा, चांदी सोने जैसे बाल” :)

वीडियोन की गुणवत्ता थोडी खराब है…कैमरे की पहुँच इतनी ही था, हाँ आवाज आपको एकदम सही सुनाई देगी। (सिवाय बीच बीच में हमारी आवाज और दाद के)।

कुछ और वीडियो - चिट्ठी आई है, जियें तो जियें कैसे

वर्डप्रेस में वीडियो तो आराम से चढ गया, यू ट्यूब की कृपा से। पर आडियो कैसे चढायें ये अभी समस्या बना हुआ है। वर्डप्रेस आडियो फ़ाइल होस्ट करने के अलग से पैसे माँग रहा है, जो फिलहाल मैं देने से रहा। और कोई जगह सुझा सकते हैं जहाँ फोकट होस्ट कर सकूं? वर्डप्रेस फोरम पर यहाँ दी गई सलाह के मुताबिक होस्टेड फाइल का URL शायद मुझे कुछ इस तरह मिलना चाहिये। www.hostname.com/meri-file.mp3

पिछली दो पोस्ट्स में मैने बचपन की कुछ बातें लिखी थीं..मसलन बचपन के टोटके और बचपन की तमन्नाएं। एक और चीज़ जिस पर मैं लिखना चाहता था वो थे..बचपन के डर और चिन्ताएं। पर लिखते लिखते रह गया। कारण यह, कि अगर सबको पता चला जाता कि मैं बचपन में रात में अकेले घर की छत पर या बगीचे में  जाने से डरता था या रात को पापाजी पान लाने भेजते थे तो मुहल्ले की अंधेरी गली, एक सांस में फर्राटे से दौडते हुए पार करता था तो कितनी इन्सल्ट होती ना मेरी। बहादुर बच्चे भी भला कहीं डरते हैं? नही ना। इसीलिये मैने किसी को नही बताया। खैर…डर नही, लेकिन बचपन की एक बडी चिन्ता आपके साथ बांटते हैं, वो ये ..कि बेटा बडे होकर क्या करेंगे?

बडे होकर क्या करेंगे/बनेंगे…ये अपने लिये सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय हुआ करता था। एक समय था, शायद ७-८ साल की उम्र में, जब में अपने आसपास लोगों को काम करते देखता और बस यह तुलना किया करता था कि मैं यह काम कर पाऊंगा या नही। जो काम करते हुए देखता था वहां अपने आप को फिट करता था..और पता चलता था कि इनमें से शायद कोई भी काम नही कर पाऊंगा। कुछेक बानगी…

  • सब्जी वाला नही बन सकता…मुझे तराजू से तौलना नही आता।
  • दर्जी नही बन सकता…नाप लेना नही आता, सिलना भी नही आता।
  • ड्राइवर नही बन सकता…गाडी तो क्या साइकिल भी नही चला पाता। और मुझे तो रास्ता भी याद नही रहता।
  • अपनी कपडे दुकान पर भी नही बैठ सकता…ना तो मुझे कपडा नापना और काटना आता..और ना ही इतने सारे कपडों के दाम याद रहते।
  • कारीगर नही बन सकता…प्लास्तर करना और पत्थर काटना नही आता।
  • नाई की दुकान नही खोल सकता..बाल काटना भी नही आता।

बोले तो, हर जगह असफलता। सोंचिये…कैरियर का कित्ता बडा सवाल मेरे आगे मुँह बांये खडा था..और कोई काउन्सलिंग नही।

खैर, ये सवाल तो अपने आप से थे, सो जवाब दें, या ना दें..सब चलता था। लेकिन स्कूल आकर यह समस्या और बढ गई। मास्टर जी कक्षा में पूंछे, तो भी ये बडा भारी प्रश्न हुआ करता था। मास्टर जी कक्षा में आयेंगे…और सब बच्चे एक एक करके बतायेंगे कि वो बडे होकर क्या बनेंगे। टीचर जी को तो खुश रखना भी जरूरी था (ये काम हमें बचपन से आता था), तो अलग अलग समय पर, अलग अलग अध्यापक जी को ध्यान में रखते हुए हम तरह तरह के जवाब देते थे

  • सर, सबसे पहले तो मैं इस देश का एक अच्छा नागरिक बनना चाहूंगा। (तालियां-तालियां)
  • मैं तो अध्यापक बनूंगा..आप की तरह। (एक एक को मुर्गा बना दूंगा)
  • राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री बनूंगा- जी हाँ…कहने में अपना क्या जाता है।
  • डाक्टर-इंजीनियर-वैज्ञानिक, गणित अथवा विज्ञान की क्लासानुसार- ये जवाब थोडा बडे होने के बाद पकडे और फिर इन्हे ही पकडे रहे।

ये तो हुई बचपन की बात। लेकिन जरा गंभीर होकर सोंचे, तो क्या हम बडे होने के बावजूद भी कभी अपनी मर्जी यह तय कर पाते हैं कि हमें क्या बनना है अथवा क्या करना है? क्या यह सोंच लेने के बाद , कि मुझे यह करना है, हम वो सब कर पाते हैं। सोंचियेगा, क्या हम आज वही कर रहे हैं जो हमने हमेशा से करने का सोंचा था? (अगर सोंचा था तो)। या फिर हालात,परिस्थितियों से लडते भिडते आज जहां हैं वहां पहुंच गये हैं किसी तरह और बस जमें हुए हैं वहीं पर?

और हाँ, जो हम नही कर पाये, वो बच्चों सें अपेक्षा कर ही सकते हैं। अच्छा चिन्टू बेटा…अंकल को बताओ तो बडे होकर क्या बनोगे!!!

आजतक मैने सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम को लाइव देखा है…पलाश सेन का यूफोरिया बैण्ड। इंजिनियरिंग के समय कालेज में आया था और चार घंटे तक खडे खडे हम झूमते-नाचते-कूदते रहे थे। बस उसके बाद कोई मौका ही नही लगा। पिछले दो साल में यहां हैदराबाद में गुलाम अली साहब और जगजीत सिंह जी आकर अपनी प्रस्तुतियां देकर चले गये पर हम टिकट का इंतजाम नही कर पाये और उन्हे नही सुन पाये। ऐसे में जब हमें पंकज उधास जी के शो के टिकट, घर आफिस बैठे अनायास ही प्राप्त हो गये (Thanks to my Super-Boss) तो अपनी तो बल्ले बल्ले हो गई। हालांकि पसंदीदा गज़ल गायकों की सूचि में पंकज उधास बहुत बाद में आते हैं पर पहली बार किसी गज़ल गायक को लाइव सुनने का मौका तो नही छोडना था। वे यहां APTDC द्वारा आयोजित तीन दिवसीय “Golconda Festival” के आखिरी दिन की शाम बनाने आये थे। वैसे तो हमारे पास तीनों दिन की प्रस्तुतियों के टिकट थे जिनमें राहुल शर्मा (पं शिवकुमार शर्मा जी के सुपुत्र) का प्यूज़न संगीत और एक शास्त्रीय नृत्य की शाम भी शामिल थे, पर बदकिस्मती से, व्यस्तताओं के चलते..पहले दो दिन नही जा सके।

कार्यक्रम का स्थल था तारामती-बारादरी जो हैदराबाद से थोडा बाहर स्थित है। थोडा बारादरी के बारे में। तारामती बारादरी (तारामती की बारादरी), गोलकुंडा के सातवें सुल्तान अब्दुल कुतुब शाह ने बनावायी थी, अपनी प्रित नर्तकी तारामती के लिये। एक छोटी से पहाडी पर बनी इस इमारत में बारह दर (दरवाजे) है। यहां तारामती नृत्य करती थी और कहते हैं कि सुल्तान गोलकुण्डा के किले में बैठा उसे सुनता/देखता था (अगर देख पाता था तो वाकई नजर थी बन्दे की…गोलकुण्डा किला यहां से काफी दूर एक अन्य पहाडी पर है।)

तो यहाँ, तारामती-बारादरी में हमें २० अप्रेल की शाम को सवा दो-ढाई घंटे पंकज उधास की महफिल में गुजारने का मौका मिला। ओपन एयर थियेटर, हल्का सा ठंडा-गरम माहौल, आसमान में लगभग पूरा चांद और सामने पंकज उधास और उनकी टीम….भई अपनी तो शाम बन गई। लाइव गजल सुनने का यह पहला मौका था और हालांकि पंकज उधास की गाई ४-६ गजलें ही मुझे पसंद हैं….कार्यक्रम मुझे बहुत पसंद
आया। टिकट फोकट में मिल गये थे पर पैसा लगा कर जाते तो भी गम नही होता।

उस शाम को दो कार्यक्रम थे, एक नृत्य नाटिका और दूसरा शाम-ए-गजल। पहुँचने में थोडी देर हो गई थी। पहुंचे और घूम फिर कर, तीन बार जगह बदल कर (यहां से सही नही दिख रहा…, यहां आगे लम्बे लोग बैठे हैं…, यहां स्पीकर बहुत पास हैं…आदि आदि करके) अपनी सीट कब्जाई, तब तक नृत्य नाटिका काफी निकल चुकी थी। दूसरी बात…वो तेलुगू में थी। नृत्य चाव से देखा, नाटिका को समझने का प्रयास भी किया। शायद भगवान विष्णु-लक्ष्मी जी का विवाह और राजा कृष्ण्देव राय से संबंधित कोई प्रसंग था। राजा कृष्णदेव राय ने तेलुगु साहित्य को बढावा देने में बहुत योगदान दिया है। एक और पहला वाकया। इसके पहले कोई नृत्य नाटिका भी नही देखी थी न लाइव ना रिकार्डेड ;)

(नृत्य नाटिका की समाप्ति, बीच में लक्ष्मी-नारायण खडे हैं, ब्रह्मा जी भी पहचान में आ रहे हैं)

चूंकि पंकज उधास थे, सो होश, मदहोश, साकी, शराब तो होने ही थे। कार्यक्रम की शुरुआत उन्होने की इस गजल से “ये अलग बात है साथी, कि मुझे होश नही..” पहली बार सुनी थी और गज़ल में रवानगी होने के बावजूद बहुत जमी नही। शायद माहौल बनाने की को्शिश कर रहे थे। अगली गजल थी “दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है…”।बहुत समय बाद ये गजल सुनी और खूब पसंद आई। इसके पहले पता नही मैने कहां सुना था इसे…और मुझे ये भी पता नही थी कि इसे पंकज उधास ने भी/ही गाया है।

अगली गजल उन्होने ली कुछ समय पहले आये उनके अल्बम जश्न से । बोल “दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना…”। एक बेहतरीन गजल। बहुत सुन्दर बोल। यह मैने इससे पहले कभी नही सुनी थी और अगर इस शाम में नही आता तो शायद सुन भी नही पाता। ये गजल मुझे इस शाम की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति लगी (जी हाँ, ‘चिट्ठी आई है..’ भी थी, पर उससे भी अच्छी)। गजल चार पीढियों की तुलना करती है..हमारे दादा, पिताजी, हम खुद और आने वाली नस्लें। शुरुआत होती है दादाजी के जमाने से जब सुख दुःख मिल बांत कर बिताये जाते थे चाहे वो अपना हो या बेगाना और फिर अपने साथ बहाती ले जाती है। इस गजल को मेरे मित्र मुरली अपने मोबाइल में रिकार्ड नही कर पाये पर हमने मैने इसे नेट पर ढूढने की कोशिश की और ढूंढ भी लिया। मुश्किल यह है कि ई स्निप से यहां वर्डप्रेस पर गाना शायद चिपकता नही है। और कोई तरीका सूझ भी नही रहा। फिलहाल इसे यहां से सुनें (गाना नं 8)। कोशिश करूंगा कि इसके बोल भी टाइप करके यहां चिपका सकूं। एक और पहला वाकया। इससे पहले आजतक मैने अपने ब्लाग पर कोई गीत भी नही सुनावाया। :)

अब तक पब्लिक थोडी अधीर हो चुकी थी और शायद आगे की पंक्ति से एक सज्जन “चिट्ठी आई है..” चिल्लाये (बाद में लगा कि शायद काफी पब्लिक यही सुनने आयी थी)। पंकज बोले..”साहब चिट्ठी भी आयेगी..जरा सब्र कीजिये। आजकल ई-मेल का जमाना है, कोई सब्र ही नही करता।” आखिरकार चिट्ठी ४-५ गज़लों के बाद चिट्ठी भी आई। इस बीच उन्होने अपनी लोकप्रिय गजलें “चांदी जैसा रंग है तेरा…”, “थोडे आहिस्ता कीजिये बातें..”, “जियें तो जियें कैसे…” पेश की। साथ ही कुछ अनसुनी और अत्यंत मद्धम गजलें भी (जिनके बोल याद नही रहे)। पर जब चिट्ठी आई तो उसमें इतना मजा नही आया। दरअसल उन्होने इसे शुरू किया शेर “मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार से…”। मैं
इसे भांप नही पाया। मुरली ने कहा..वही है? रिकार्ड करें? मैं बोला नही..शायद कोई और है। और फिर अचानक शुरू हो गये। मुझे लगा था कि इसे पहले थोडा सा खींचेंगे…आलाप लेंगे, लेकिन उन्होने अचानक शुरू कर दिया। बीच में भी जहां लगा कि थोडा रुक कर खींचेंगे…पर ऐसा हुआ नही। शायद इस गाने से अपेक्षाएं ज्यादा थीं..सो उतना मजा नही आया।

करीब सवा दस-साढे दस बजे तक कार्यक्रम चला। इस दरमियान कुछ और लोकप्रिय गज़लें और कुछ के सिर्फ मुखडे मसलन- “ऐ गमे जिन्दगी कुछ तो दे मशविरा…”, “हुई मंहगी बहुत शराब..”,”आदि सुनाये। कार्यक्रम की समाप्ति उन्होने की “मोहे आई न जग से लाज, मैं इतना जोर से नाची आज…कि घुंघरू टूट गये” से। इसे मैने पहले अनूप जलोटा की आवाज में सुना था। सोंच सकते हैं कितना अलग लगा होगा।

एक बात जो मैने महसूस की वो ये कि मुझे लगता है कि अगर गजल गायक, अथवा कोई भी गयाक बीच बीच बीच में सामने बैठी जनता से संवाद स्थापित करता रहे तो कार्यक्रम और दिलचस्प लगेगा। पंकज एक-दो बार बतियाये , चांदी जैसा रंग है तेरा के पहले एक चुटुकला भी सुनाया पर बाकी समय शुक्रिया-Thank You तक सीमित रहे। इसके अलावा …अगर कहीं कहीं पर पब्लिक को भी गाने अथवा ताली की थाप में साथ ले ले तो मजा दोबाला हो जाये। हालांकि ये प्रक्रिया पब्लिक की तरफ से शुरू होनी चाहिये और हैदराबाद की पब्लिक से में यह अपेक्षा नही करता। यहां तो ज्यादातर लोग पिच्चर हाल में भी सीटी भी नही बजाते। बहुत डीसेंट पब्लिक है।


(हमारी सीट से मंच का दृश्य। पृष्ठभूमि में ऊपर जो रोशनी में इमारत दिख रही है, वो तारामती की बारादरी है।)

और हां, अगले शनिवार को (२६ अप्रेल) यहीं तारामती बारादारी में मरहूम शायर मखदूम मोहिउद्दीन साहब की कविताएं/गज़लें तीन विभिन्न विधाओं अभिनय, नृत्य और संगीत के द्वारा प्रस्तुत की जायेंगी। (पम्फलेट के अनुसार “Renowned Poet Late Maqdoom Mohiuddin’s poetry interpreted in three different performing art forms, by an Actor, a Dancer and a Musician”). मखदूम साहब से अपना थोडा सा परिचय मात्र यूनुस भाई के ब्लाग के जरिये है…देखते हैं जा पाते हैं क्या शनिवार को।

हैदराबाद आये दो साल पूरे होने को आये पर आंध्रप्रदेश की कोई जगह देखने का मौका नही मिला था अब तक, सिवाय विशाखापट्टम के जहां किस्मत से २००६ में एक दोपहर बिताने का मौका मिला था। हैदराबाद को नही गिन रहा हूं यहां। २-३ बार कार्यक्रम बनाने की सोंची…पर सोंचते ही रहे गये। वो कार्यक्रम किसी नई पोस्ट के विचार की तरह अथवा ड्राफ्ट पोस्ट्स की तरह दिल अन्दर ही दबे रह गये, पब्लिश नही हो पाये। सो इस हफ्ते जब सोमवार को तेलगु नववर्ष (उगाधी) होने की वजह से शनि-रवि-सोम, ३ तीन की लगातार छुट्टी हुई और काम का बोझ भी कम था तो फिर सोंचा कि इस बार तो कहीं जाकर आया ही जाये। पहला दिन पूरा होते होते लग रहा था कि ये छुट्टियां भी अन्य छुट्टियों की तरह ना बीत जायें। लेकिन शाम होते होते मित्र रामा की सक्रियता के चलते लगा कि इस बार तो कहीं जाने का कार्यक्रम बन ही जायेगा।

२ दिन अभी भी बाकी थे। रामा ने, जो बेचारा छुट्टी के दिन भी आफिस में काम निपटा रहा था,शाम को फोन किया कि हम कल श्री सैलम चलेंगे,सुबह साढे पांच की डीलक्स बस के टिकट करवा लिये हैं। हम ने कहा अति उत्तम। लेकिन २-४ सेंट्स ..बोले तो अपनी सलाहे भी दे डालीं। यार गाडी किराये पर लेकर चलते हैं…मोटरसाइकिल से भी चल सकते हैं…रास्ता बडा अच्छा है …गाडी होगी तो मजा आयेगा आदि आदि । रामा ने अपना रामबाण फेंका…तो फिर गाडी का इंतजाम तुम करो। मैने कहा..नही यार बस ही ठीक है..सस्ती,सुन्दर,टिकाऊ और आरामदायक :)

सुबह साढे पाँच बजे कोई बस/ट्रेन पकडे बरस बीत गये..पर इस दिन सुबह ४ बजे उठे…सवा पांच बजे बस अड्डे भी पहुँच गये और शुरू हुआ साढे पाँच की डीलक्स बस का इंतजार। ५.४०/ ५.४५ तक जब बस नही आई तो चिन्ता होने लगी कि हम कहीं गलत जगह,गलत बस का इंतजार तो नही कर रहे। पूंछताछ करने पर पता चला कि जिस बस का हम इंतजार कर रहे थे वो रात को आते समय कहीं फंस गई थी और आने वाली नही थी। उसकी सवारियों को दूसरी बस में बिठाया जा रहा था हालांकि इस आशय की कोई घोषणा करने की कोई जहमत नही उठाई जा रही थी। अब जिस बस में बिठाया जा रहा था वो किसी भी एंगल से डीलक्स नही थी। इसमें बैठकर पता चला कि यह बस तो अपने समय पर ही चलेगी। किसी तरह ६.३० बजे बस हिली और अपना सफर शुरू हुआ। एक घंटा लेट हम चलने के पहले ही हो चुके थे और बस को देखते हुए लग रहा था कि ६ घंटे से पहले तो यह किसी हालत में नही पहुँचायेगी। शुरुआत इतनी प्यारी हुई थी। आगे आगे देखना था होना था क्या।

इसके अलावा, चूंकि हडबडी में सारा कार्यक्रम बना था सो ना तो यह पता था कि वहां देखने के लिये क्या क्या है,रुकने की क्या व्यवस्था है, रास्ते में अगर देखने लायक कोई जगह है तो उसके लिये कहां उतरना है …बोले तो कोई जानकारी नही थी। हालांकि इस तरह कही जाने का अपना अलग मजा है। आप झोला उठाइये और जिधर मन आये चल दीजिये। यह सोंचकर, कि जो होगा वो देखा जायेगा।

अब थोडा श्रीसैलम के बारे में। हिन्दुस्तान में बारह ज्योतिर्लिंग हैं जिनमे से एक श्रीसैलम में है। शिवजी के स्वरूप को यहाँ श्री मल्लिकार्जुन स्वामी कहा जाता है।  साथ ही यहां शक्तिपीठ भी है जहाँ देवी भ्रमरंभा (Bhramaramba) की उपासना की जाती है। इस लिहाज से यह भारत का एक मात्र तीर्थ स्थल है जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ एक ही स्थान पर है। काफी दूर दूर  से श्रृद्धालू यहां आते हैं जिनमें आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और माहाराष्ट्र से आने वाले श्रृद्धालू प्रमुख हैं। यह स्थान करनूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्रीसैलम पहाडी पर बसा है। पास में कृष्णा नदी है जो जंगलों और पहाडों के बीच से होकर निकलती है और जिस पर श्रीसैलम के पास में ही एक बांध बनाया गया है। श्री सैलम हैदराबाद से सडक मार्ग से करीब २३२ किलोमीटर दूर है। करीब १२५ किलोमीटर का  रास्ता  साधारण है लेकिन एक बार आप पहाडी और जंगल का रास्ता शुरू होने के बाद रास्ता देखते ही बनता है। करीब ८०-१०० किलोमीटर का यह रास्ता अत्यंत सुन्दर है। बीच में सडक से थोडा अन्दर जाकर देखने के लिये कुछ जगहे हैं, मसल एक झरना और जंगल के बीच ट्रेकिंग का रास्ता लेकिन खुद का वाहन ना होने की वजह से इन सब जगहों पर रुकना और देखना संभव न हो सका। जाने का समय भी शायद बरसात और उसकी बाद का बेहतर होगा जब जंगल पूरे शबाब पर होता होगा। करीब ५० किलोमीटर पहले से बांध क्षेत्र शुरू हो जाता है और नजारों की नजाकत बढती जाती है। पहाडी के बीच से नदी निकल रही है और यहीं बांध बनाया हुआ है। बस पहाडी के एक तरफ से ढलान से नीचे उतरना शुरू होती है और जगह जगह पर मोड आते हैं जहां बांध आपसे आंख मिचौली करता रहता है। बस में होने के कारण सिर्फ खिडकी में से ही नजारे देख सके और फोटो लिये गये..अन्यथा थोडा समय बिताने के लिये अच्छी जगह है। पहाडी के एक तरफसे उतर कर एक छोटे (बांध की तुलना में छोटे) पुल को पार करके फिर पूरी घांटी चढनी होती है। इसके बाद श्रीसैलम ज्यादा दूर नही रह जाता।

खैर,हम किसी तरह १२:३० बजे के आसपास श्री सैलम पहुँचे। यहां पहुँच कर भीड का जो नजारा देखा, भगवान के दर्शन करने के लिये जो मशक्कत की और आसपास क्या क्या देखा…वो अगली पोस्ट में। आप तब तक रस्ते के फोटू सस्ते में देखिये।

कृष्णा नदी- पहाडी के ऊपर से। तस्वीर में लम्बी घुमावदार सडक देख सकते हैं।

नदी पर करने के बाद, पहाडी के ऊपर से कृष्णा नदी। सामने की तरफ लम्बी घुमावदार सडक देख सकते हैं।

बांध- कृष्णा पर बने पुल के ऊपर से

कृष्णा पर बने पुल से बांध का दृश्य। नदी के पेटे में लोग तो दिख ही रहे हैं बडी संख्या में चौपहिया वाहन भी खडे थे (फोटो में नही दिख रहे।)


चलते चलते- *श्रीसैलम को अंग्रेजी में Sri Sailam लिखा जाता है। हिन्दी में नाम लिखा हुआ मैने केवल एक जगह देखा जहां श्रीशैलम लिखा हुआ था। लेकिन उच्चरण जो मैने आजतक लोगों से सुने हैं वो या तो स्रीसैलम सुना है या श्रीसैलम। मैं निश्चय नही कर पाया कि सही क्या है। अपन फिलहाल श्रीसैलम से काम चला रहे हैं।

झूले में बैठने का मन है? आइये आपको हैदराबाद में “राजस्थानी हवाई झुल्ला” में सैर करवाते हैं।

Rajasthani Hawai Jhulla

गेट पर लिखा हुआ है “शराब पिके झुले पर बैठना मना है।” यार शराब पिके  झूले पे कोई क्यों पैसा बरबाद करेगा… पीकर तो आदमी का दिल, दिमाग ,जिस्म सभी कुछ झूमता और झूलता ही रहता है :) । ऐसा लिखना चाहिये, “या तो झूले पर बैठो, नही तो शराब पियो” :D |

jhoola

और ये झूले के एकदम ऊपर से मेले का दृश्य (दांयी ओर मौत का कुआ दिख रहा है, बांयी और जो नही दिख रहा वहां अन्य प्रकार के झूले, गाडियां आदि थीं)

View from top

बचपन में झूले में बैठने में बहुत डर लगता था। अब नही लगता। सच्ची :) । इस समय हमारे गांव में भी मेला लगता है। महाशिवरात्रि से शुरू होता है, अभी चल ही रहा होगा। ये लोहे के बडे झूले तो बाद में देखे, शुरुआती यादें लकडी के झूलों की हैं जिन्हे आदमीं खींचा करते थे। चकडोलर कहते हैं हमारे यहां उन्हे।चर्र चर्र आवाज करते थे चलते समय। टाकिज भी आता था है मेले में पर मैने आज तक नही देखा। सच्ची।

chanaa masala

और ये है “नींबू, कैरी, धनिया, पुदीना, टमाटर एवं अन्य मसालों” से भरपूर, चना मसाला। खाया नही, बस फोटो लिया। गांव में मेले की फेमस चीज गोंद के पापड हुआ करती थी, अभी भी चांस लग जाये तो नसीब हो जाते हैं। कल गये थे मेले में घूमने। यहां नेकलेस रोड पर। आप भी फोटो देख कर खुश हो लीजिये। :)

टी वी पर समाचार देख/सुन रहे थे कल। समाचार वाचक सुन्दरी ने मौसम का हाल बताते हुए , मुस्कुराते हुए अंग्रेजी में जो कहा उसका आशय कुछ ऐसा था “दिल्ली और उत्तरप्रदेश के लोग राहत की सांस ले सकते हैं क्योंकि यहां बारिश की संभावनाएं हैं” (चैनल का नाम ध्यान नही) । पता नही उनका सामान्य ज्ञान कैसा था…या फिर उनके लिये लोगों से मतलब सिर्फ शहरों में रहने वाले, नौकरीपेशा लोग होते  होंगे (गांव में कौन अंग्रेजी चैनल देखता है)…लेकिन  साल के इस समय हिन्दुस्तान भर के खेतों की फसल कट कर खलिहानों में रखी होती है और हल्की सी बरसात उसकी गुणवत्ता बिगाड सकती है। ज्यादा हो जाये तो भगवान ही मालिक है। तो बारिश इस समय राहत की सांस नही होती…गले की फांस हो जाती है। फसल के सही पैसे आये तो ही पुराने कर्जे चुकेंगे, बच्चों की शादियां निपटेंगीं और अगली फसल की तैयारी हो पायेगी। बहुत उम्मीदें बंधी होती हैं। शायद टी वी सुन्दरी को इस बात की जानकारी हो।

मौसम कुछ ऐसा बिगड रहा है कि मेरे गृह जिले झालावाड और उसके आसपास भी मौसम खराब हो रहा है और यहां १५०० किलेमीटर दूर हैदराबाद में भी पिछला सप्ताह गीला बीता..आज सुबह भी मौसम बेइमान हो रहा था। सिर्फ किसान ही नही..आइसक्रीम बेचने वाला मेरा  FlatMate भी  मौसम के मिजाज से दुखी है…अप्रेल का महीना आ गया और बेचारे की बिक्री अभी तक परवान नही चढी।

पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा था जिन्हें अब याद करके भी हँसी आती है। टिप्पणियों में एक-दो टोटके और पता चले…शायद ‘जनरेशन गेप’ के चलते हमारे बचपन तक वो विलुप्त हो चुके थे :)। सोंचते सोंचते कुछ और बाते ध्यान आ गईं। इस बार वो चीजें जिनकी बचपन में शिद्दत से ख्वाहिश होती थी। कुछ ऐसी चीजें जिनको पा लेनी की इच्छा कभी कभार सनक की हद तक होती थी..लेकिन अपना बस नही चलता था। ना मिलने पर मन मसोस कर रह जाते थे..और सोंचते थे कि बडे होकर ये सब चीजें जरूर हासिल करेंगे। बडे तो हुए…पर ख्वाहिशें भी उम्र के साथ साथ बदल गईं।

हर बच्चे की तरह कामिक्स अपनी भी फेवरेट हुआ करती थी। पर मांग और आपूर्ती का अनुपात जरा गडबड था। पापाजी कामिक्स के सख्त खिलाफ। सो घर पर कामिक्स यदा कदा ही उपलब्ध होती थी। हास्टल जाने के बाद वहां किसी तरह कुछ मिल जाया करती थी..। पर गर्मी की छुट्टियों में एक-एक कामिक्स किराये पर लाने के लिये बहुत जिद और चिरोरी करनी पडती थी। कभी कभार ही सफल होते थे और अठन्नी मिल भी गई तो उससे मिली कामिक्स १५ मिनट में खतम। हम सोंचते..क्यों हमारी कपडे की दुकान हैं…काश हमारी भी कामिक्स की दुकान होती। जिसकी कोई कामिक्स की दुकान होती या जिन बच्चों के घर वाले उन्हे आसानी से कामिक्स दिला देते वे हमारी ईर्ष्या के पात्र हुआ करते थे। । हां,बाल पत्रिकाएं चंपक,नंदन और बालहंस कभी कभार मिल जाया करती थीं..पापा बाहर जाते तो जरूर लाते थे और गीता प्रेस के साहित्य का तो भंडार आज भी है घर में। इसके अलावा नवोदय विद्यालय में हमारे पुस्तकालय में अमर चित्रकथाएं भी खूब सारी थीं।

कामिक्स जैसी ही हालत अपनी पतंग के मामले में थी। पतंगे हमारे यहां गर्मियों की शामों में उडाई जाती हैं और बजाय मैदानों के, अपने घर की छत से उडाई जाती हैं। और हमें कभी पतंग नही दिलवाई जाती। गिर जाओगे छत से..बस। हां, अगर कोई पतंग कट कर छत पर आ गई तो ठीक..पर मंजा कहां से लाओगे? अपना सपना हुआ करता था कि काश घर की छत पर खूब सारी पतंगे कट कर गिरें (जितनी भी पतंगें कटें.. हमारी ही छत पर गिरें)। पतंग उडाना कभी नही आया, आज भी नही आता। :(

एक और चीज जिसकी बचपन में जब्बरजस्त ख्वाहिश हुआ करती थी वो थी कोई जादूई शक्ति। कुच्छ भी मिल जाये। कोई गायब कर देने वाली जादुई टोपी,या करामाती कोट,या कोई घडी। या कोई ऐसा यंत्र जिससे हम दूसरों के मन की बात पढ लें। ये तो नही बताऊंगा कि गायब होकर क्या क्या कर सकने के ख्वाब देखा करते थे :) …पर ये जिन्दगी में सब कुछ पा लेने जैसा था। इनसे संबंधित कई सीरियल /फिल्में उस समय दूरदर्शन पर देखीं जिनमें किसी बच्चे को कोई जादुई शक्ति मिल जाती थी। सोनी टी वी के शुरुआती दिनों में I Dream of Jeanie नामक एक अंग्रेजी टू हिन्दी डब्ड सीरियल आया करता था,जिसमें जीनी पलक झपकते ही कुछ भी कर देती थी…आज भी ये धारावाहिक बहुत याद आता है।

खेलने की चीजें अन्य चीजें थी गेंद,चपटे पत्थर, चूडियों के टुकडे और भी पता नही क्या क्या। चपटे पत्थरों से हम पव्वा खेलते थे…अलग अलग जगहों पर इस खेल अलग अलग नाम हैं…जमीन पर छः सात खांचे बना कर खेला जाता है। (वैसे ज्यादातर लडकियां खेलती हैं)। चूडियों के टुकडों से भी हम एक खेल खेलते थे जिसमें जमीन पर चाक से बनाये एक गोल घेरे में चूडियों के छोटे छोटे टुकडे डाल दिये जाते थे और इन्हे एक बडे टुकडे की सहायता से निकालना होता था। जब एक टुकडा निकालें तो वो किसी अन्य टुकडे को छूना नही चाहिये। यहां लिखना में इतना रोमंचक नही लगता लेकिन खेलते वक्त शानदार होता था। इसके अलावा गर्मी की छुट्टियों में इमली के बीज इकट्ठे करने का भी बहुत शौक हुआ करता था। इमली के बीजों को हमारे यहां कोमचे कहते हैं। इनसे चंगा-पो नामक खेल खेला जाता था। इमली के बीज को बीच में से फोडेंगे तो ये बराबर दो भागों में बंट जायेगा। बस चंगा-पो की सामग्री तैयार। चाक/बुत्ती से जमीन पर कुछ लाइने बनानी हैं। दो कोमचे फोडे और शुरू। इन कोमचों की पूरी डिब्बी हुआ करती था अपने पास। इनहे खा भी सकते थे..पर सावधान..ज्यादा खा लिये तो द्स्त बन्द हो जायेंगे :)।

बुत्ती की बात किये बिना शायद ये पोस्ट अधूरी रहेगी। स्लेट पर लिखना बुत्ती का Secondary Function हुआ करता था…असल काम तो इसका खाने में और तोड कर खोने में किया जाता था। बत्ती और चाक का स्वाद आज भी बहुत अच्छा लगता है। शायद रोजाना स्कूल जाते समय एक बुत्ती मिला करते थी। पूरी नही खाते थे लिखते भी थे..पर टूटना…गुम होना भी चलता रहता था। हाँ…ये धमकी मिलती रहती थी कि बुत्ती खाओगे तो पेट में कीडे पड जायेंगे….पर कौन कम्बख्त कीडों की परवाह करता है।(वैसे..ये कीडे परेशान बहुत करते थे :) )

आपकी भी कुछ ख्वाहिशें हों तो कह डालिये….।

मान्यता से मतलब संजूबाबा वाली मान्यता से ना लगाइयेगा। मैं बात कर रहा हूं छुटपन की अपने कुछ धारणाओं/विश्वासों की, जो पता नही कब,कहां से मन में बैठी थीं और कब धी्रे-धीरे बडे होते हुए, दिमाग से निकल भी गईं। ये छोटे बच्चों के आपस की बाते हैं…शायद आपको समझ में ना भी आएं…पर पढने में तो कोई हर्ज नही। :)

  • बारिश के दिनों में बगीचे में नमी वाली जगह पर चटक लाल रंग का एक कीडा निकलता है, छोटा सा, जिसकी पीठ एकदम मखमली होती है। हमारे यहां इसे सावन की डोकरी कहा जाता था। हमारा विश्वास था कि सावन की डोकरी को अगर काँच की शीशी में कुछ दिन बंद कर दें तो वो पाँच पैसे के सिक्के (इतना ही लेवल था अपना) में बदल जाती है। काफी फायदे का सौदा था…पर कभी फलीभूत नही हुआ। ऐसे प्रयोग कुछ और कीडों के साथ भी किये गये, डिब्बियां भी बदल कर देखीं…कांच की जगह प्लास्टिक की डिब्बी रख कर देखी…क्या क्या नही किया पाँच/दस पैसों के लिये…पर सब बेकार! :(
  • अगर रेल की पटरी पर पचास पैसे या एक रुपये का सिक्का रख दें और उसके ऊपर से रेल निकल जाये तो वो चुम्बक में बदल जाता है। चुम्बक बचपन की सबसे प्रिय चीजों में थी और उसके छोते छोते तुकडे भी संभाल कर रखे जाते थे। लेकिन यह प्रयोग कर नही पाते थे, सिर्फ सुना था, इसके बारे में। क्योंकि गांव तो क्या…हमारे जिला मुख्यलय तक आजतक रेल नही पहुँची। और फिर एक रुपये का सिक्का इस तरह तो कुर्बान नही किया जा सकता ना?
  • जिस बेर या अमरूद में मिट्ठू ने चोंच मारी हो वो और ज्यादा मीठा हो जाता है। ऐसे फल को हम मिट्ठूकट कहते थे…। सच तो ये है कि उसे किसी भी पक्षी ने काटा हो…अपने लिये वो मिट्ठूकट ही होता था। और सच में…मीठा भी होता था।
  • एक पेड हुआ करता था जिस पर एक अजीब सी चीज लगती थी जिसे हम “बन्दर की रोटी” कहा करते थे। ना तो मुझे उस पेड का अन्य कोई नाम मालूम है ना उसके पत्तों,तने की शकल। नेट पर भी नही ढूंढ पाया। एक रुपये के सिक्के जैसा फल होता था वो, जिसमें एक मींजी हुआ करती थी, जो खाने में बडी स्वादिष्ट लगती थी। बंदर से उसका क्या संबंध था ये आज तक नही मालूम। (अगर किसी को उस पेड के बारे में पता हो बतायें प्लीSSSज।)
  • एक और अंधविश्वास ये था कि अगर खजूर अथवा बेर खाते समय गुठली निगल गये तो पेट में उसका पेड उग जायेगा। या मीठी गोली (बोले तो टाफ़ी) खाते समय भी गलती से ऐसा हादसा हो गया, तो पेट में उसका पेड उग जायेगा। संतरे की गोली आती थी २० पैसे की एक। अब ऐसा नही था कि पेड से हमें कोई आपत्ती थी ..भई पेड होगा तो फलों की बहुतायत हो जायेगी ना फोकट में। पर अपने को प्रेक्टिकल प्राब्लम्स का डर रहता था। पेड उगा तो निकलेगा किधर से(!)…जडें किधर(!) फैलेंगी..हम कुछ और कैसे निगलेंगे/निकालेंगे आदि आदि :) । कई बार ऐसा हुआ कि गोली चूसते चूसते या बेर खाते हुए गुठली निगल गये, और फिर कितनी देर तक डर सताता रहा कि पेड न उग जाये।
  • एक पौधा होता था,जिसका नाम होता था विद्या। हमारा ऐसा मानना था कि इसकी पत्ती किताबों में रखने से ‘विद्या’ आती है, बोले तो ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्ति का ये जिन्दगी में आजतक का सबसे सरल एवं सुगम मार्ग है। आप क्या सोंच रहे थे…इतना ज्ञान हम ऐसे ही झाड रहे हैं इत्ती देर से? :)

आप बताइये…आप भी सोंचा करते थे बचपन में ऐसा कुछ?

तब- सखी, जब बागों में भंवरे गुंजार करने लगें, खेतों में सरसों के पीले फूलों की बहार भरने लगे,समझो बसंत आ गया।
अब- जब बागों में शिवसैनिक-बजरंगी हुंकार भरने लगें, जोडे भी ठुक-पिट कर ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगें, समझो वेलेन्टाइन बसंत आ गया

तब- बाजार में गुड मूंगफली की गजक दिखने लगे, चौपालों पर आग-अलाव जलने लगें तो समझो सर्दियां आ गई।
अब- टी वी पर बिवाई न फटने/रूखी त्वचा से बचाने के विज्ञापन आने लगें और सारे चैनल कोहरे के कारण फ्लाइट/रेल देर होने का रोना रोने लगें तो समझो सर्दी आ गई।

तब- “रेनी डे” के कारण स्कूल से छुट्टी मिल जाये, छपाक-छपाक नाली में नाव चलायें, घर के बगीचे में नये पेड लगायें…आहा बरसात आ गई।
अब- अपार्टमेन्ट का पहला तल्ला पानी में डूब जाये, सडकों पर घुटने घुटने पानी भरा हो और गड्ढों की भरमार हो समझो बारिश आ गई।

तब- बरसात लगभग बन्द हो जाये, त्यौहारों का मौसम शुरू होने को हो, नौ दिन जप तप ध्यान व्रत में बीतें ओहो  नवरात्रा चल रहे हैं…दशहरा आने वाला है।
अब- गल्ली मुहल्ले में डांडिया चले, बच्चे देर रात को घर लौटें, शहरों में गर्भनिरोधक की बिक्री बढ जाये- नवरात्रा आ गये हैं।

तब-नाना-मामा के यहां जाने को मिले, ढेर सारे आम खाने को मिलें, कामिक्स पढने को मिले, दुपहरी में सोने को मिले…आहा चुन्नू गर्मियां आ गई।
अब-सच तो ये है कि गर्मी की छुट्टियों में बच्चे क्या करते हैं..मुझे भी नही पता। लेकिन ये मालूम है कि नाना-मामा के यहां जाना बहुत कम हो गया है। शायद वीडियो गेम्स खेलते हों या अगले सत्र की कोचिंग करते हों???

रोजमर्रा की भगादौडी, काम धाम, डेडलाइन पर डेडलाइन…कितना कम समय निकल पाता है कि बैठ कर अपने आप से ही बातें की जायें? या कुछ भी नही किया जाये। कब हुआ था आखिरी बार, जब फालतू बैठे और कुछ नही किया? जी हाँ, कुछ नही। मतलब टी वी भी चालू नही थी, कोई अखबार-पत्रिका भी हाथ में नही थी…एकदम खाली? …एकदम आराम…Total Hibernation! ऐसा नही है कि काम बहुत होता है..पर ये जो मन है ना मन…। जब काम नही कर रहे होते..तो भी कुछ ना कुछ सोंच ही रहे होते हैं। घर जल्दी भी पहुँच गये तो टी वी से चिपक लिये, इतनी सारी किताबें अधूरी पडी हैं…वो उठा ली। दिमाग को आराम नही। ये बेचारा , Information Overload का मारा।
ऐसे में ट्रेन का १६-१८ घंटे का सफर बडा सुकून देता है। पिछले हफ्ते घर जाकर आया तो दो बार मौका लगा। हालांकि हाथ में कोई किताब रहती है लेकिन कुछ समय के लिये ही..उसे परे रखा जा सकता है। निर्विकार होकर बैठे रहें। खिडकी के बाहर देखें…देखते रहें।आसपास बैठे लोगों की शक्लें देखें। कितने सारे लोग…अलग अलग जगह से..अलग अलग जगह पर…अलग अलग प्रायोजनों से। हम सब को यहीं आकर मिलना था? हर इंसान की अपनी कहानी, अपनी जिन्दगी। धत्त तेरे की…फिर सोंचने लगे।

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जाते वक्त स्लीपर डब्बे में ऊपर की बर्थ थी। मेरे सामने नीचे की बर्थ पर एक व्यक्ति लेपटाप पर कुछ गिटपिटा रहा था…साइड लोअर बर्थ पर एक अन्य। एक लेपटाप मेरे बैग में । Randomly छाँटे हुई आठ लोगों में से तीन के पास लेपटाप…क्या Penetration है भाई। काश लालूजी अपने बजट में रेल के डिब्बों में एक अदद चार्जर भी लगवा देते। मोबाइल तक चार्ज करने में बहुत परेशानी होती है सर।

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बैठे बैठे ये सब लिखने का खयाल आया, बैग से कागज पेन निकाल लिया। २-४ लाइन लिखने के बाद महसूस हुआ कि हिन्दी में लिखना (हस्तलेखन) पिछले काफी समय से एकदम छूट सा गया है। अंग्रेजी में तो फिर भी आफिस में नोट्स वगैरह लिख लेते हैं…पर हिन्दी में कागज पेन लेकर आखिरी बार कब लिखा था ध्यान नही आ रहा (शायद कालेज में हिन्दी पखवाडे पर आयोजित प्रतियोगिताओं में)। ऊपर से हस्तलेखन भी
माशाअल्लाह हो गया है। खुद का लिखा खुद पढ लूं , यही काफी है। लगता है इमला लिखना शुरू करना पडेगा।

ये सब ट्रेन में कागज पर लिखा था। स्केन करके यहां चिपकाने की सोंच रहा था…लेकिन हस्तलेख देख कर शर्म आ गई :)। कहते हैं हस्तलेख व्यक्तित्व का आइना होता है। यहाँ चिपका दिया तो पोल खुल जायेगी :)

कुछ वक्तव्य (बोले तो…Statement) होते हैं..जो चुनिन्दा जगहों पर, चुनिन्दा परिस्थितियों में,छँटे हुए चुनिन्दा लोगों से अपेक्षित होते हैं। अक्सर ये वक्तव्य टेलिविजन कैमरे के सामने दिये जाने के लिये होते हैं…नेता, अभिनेता, क्रिकेटर ,अफसर…हर कोई इनका इस्तेमाल अपने हिसाब से करता है। इनमे नया कुछ नही होता, इनका कोई कैसा भी मतलब निकाल सकता है। अक्सर ये वक्तव्य सुनने वाले की जानकारी में कोई इजाफा नही करते और इनमें वही बात दुहराई जाती है जो सुनने वाले और बोलने वाले , दोनो को पता होती है। चूंकि कुछ दुनिया में रहना है और कुछ न कुछ कहना तो है ही…सो कह देते हैं। नीचे कुछ नमूने दे रहा हूं…नोट कर लीजिये..वैसे तो, राम करे आपको इनकी जरूरत न पडे…पर पड जाये तो ये न कहियेगा कि पहले बताया नही था। चाहें तो धन्यवाद भी टिका सकते हैं :)

क्रिकेट
-pitch was good and ball was coming on to bat
-Boys played well
-It was a team effort

नेतागिरी
-यह नीति जन विरोधी हैं हम इसका विरोध करते हैं (जब खुद सत्ता में थे..तब तुम्ही ने लागू की थी भाई)
-मुझे फँसाया जा रहा है
-हम चाहते हैं कि मामले की जाँच सी.बी.आई. को सौंप दी जाये (ताकि हमारे स्वर्ग सिधारने तक भी जाँच पूरी ना होने पाये)
-मैं अदालत के फैसले का सम्मान करता हूँ

मीडिया
-Exclusive: हम आपको बता दें यह खबर सिर्फ हमारे चैनल पर दिखाई जा रही है (दरअसल, सिर्फ हमारे रिपोर्टर पेड पर चढकर गिलहरी के अंडे गिनने के लिये विशेष रूप से प्रशिक्षित हैं)

-क्या आप हमें सुन सकते हैं…लगता है सम्पर्क टूट गया है (सम्पर्क नही टूटा..पेड की डाल टूट गई)

-मीडिया समाज का आईना है। मीडिया सिर्फ वो दिखाता है जो जनता देखना चाहती है (और जनता बेचारी चैनल पर चैनल बदल कर सिर्फ वो देखती रहती है नो मीडिया दिखाता जा रहा है।)

फिल