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हरिओम पवांर को मैने पहली बार १९९६-९७ के आसपास सुना था। वे वीर रस के कवि हैं। हम ११-१२ वीं कक्षा में थे और हमारे अंग्रेजी के अध्यापक श्री ए पी सिंह के पास इनकी गाई हुई कविताओं की कैसेट थी। “मैं घायल घाटी के दिल की धडकन गाने निकला हूँ”।
१२ वीं के बाद स्कूल से निकल गये, लेकिन उनकी कुछ कविताओं के बोल जबान पर थे। बाद में छोटे भाई ने भी उनकी कुछ कविताएं अपनी डायरी में लिखी थीं,जिनमें मुशर्रफ की आगरा यात्रा और  कंधार अपहरण के ऊपर कविताएं थी भी थीं। शायद एकाध बार कोटा दशहरा मेले में भी आये हों।
इन्टरनेट से परिचय के बाद से मैं उनकी कविताएं ढूंढने की कोशिश कर रहा था…पर असफल रहा। कल परसों घूमते हुए यू ट्यूब पर उनका यह वीडियो मिल गया। वीडियो हालांकि साफ नही है पर आवाज एकदम साफ है। हरि ओम पंवार साहब के बारे में ज्यादा जानकारी हालांकि अब भी नही मिली।
प्रसारण शायद फरवरी २००८ का है..पर यही कविता मैने १९९६-९७ में भी सुनी थी। गौर कीजियेगा,कश्मीर की हालत जैसे १० साल पहले थे…आज भी उससे जुदा नही हैं (हाल की घटनाओं के बाद तो और बिगडे हैं।)

सुनिये, “मैं घायल घाटी के दिल की धडकन गाने निकला हूं।”

अद्यतन (६ जनवरी २०१०) : दो और वीडियो

“कैसे कोई गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के”

शहीदों को सलाम करती एक अन्य प्रस्तुति

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Food for Thought – दिमाग (का) खाना

सच है कि जिन्दगी शतरंज की बिसात नही जहाँ हर कदम चलने से पहले आगे और पीछे की सौ संभावित चालों के बारे में सोंचा जाये…लेकिन जिन्दगी कटी पतंग भी तो नही कि बस हवाओं से सहारे उडे और किसी पेड पर उलझ जाये?

२/३ साल पहले IIFM में सुने एक व्याख्यान से

किताबों का भविष्य!

कल उन्मुक्त जी की इस चिट्ठी पर बडी दिलचस्प चर्चा पढने को मिली। एक तो वो दिल्ली में उनकी पसंदीदा किताबों की दुकान बुकवार्म बन्द होने से दुःखी थे और दूसरे अन्य किताबों की दुकानों पर सही माहौल ना होने को लेकर भी व्यथित थे। पढने का चलन कम होने के अलावा,टिप्पणियों में इस बात को लेकर चर्चा थी कि शायद निकट भविष्य में किताबें और अखबार छपना ही बन्द हो जायेंगे। सब कुछ electronic प्रारुप में मौजूद होगा।

पढने का चलन कम हो गया है इस बात से मैं इत्तेफाक नही रखता। चाहे वो किताबें हों या अखबार…अपने मूल रूप में (e-प्रारूप नही)। टी वी के आगमन को भी पढने के युग का खात्म बताया गया था। न्यूज चैनल अखबारों को खा जायेंगे,ऐसे कयास भी लगाये गये थे लेकिन ऐसा हुआ नही। पिछले १५ सालों के ट्रेन्ड पर नज़र डाली जाये,तो अखबारों ने अपनी प्रसार संख्या में जिस स्तर पर वृद्धि इस दौरान की है, उतनी शायद पहले कभी नही हुई। चाहे वो अंग्रेजी का टाइम्स आफ इण्डिया हो, अथवा हिन्दी के दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण। हाँ, यह जरूर है कि इन लोगों की मार्केटिंग जबरदस्त रही इस दौरान। वहीं किताबों में भी हैरी पाटर जैसी पुस्तक ने अपार सफलता इसी दौर में अर्जित की है। किताबों की दुकानों की श्रृंखलाएं मसलन क्रासवर्ड और लैण्डमार्क भी इसी समय अस्तित्त्व में आए हैं..हाँ उनका प्रारूप और माहौल चर्चा का मुद्दा हो सकता है।

कागज की अनुपलब्धता और मंहगाई, नेट पर सस्ते में अथवा मुफ्त में ई पुस्तकों की मौजूदगी आदि अपनी जगह हैं लेकिन मुझे नही लगता कि निकट भविष्य में ये कारण छपी किताबों का अस्तित्त्व खतम कर देंगे। और फिर जो मजा किताब के पन्नों की गंध में है वो भला कम्प्यूटर स्क्रीन के पिक्सेल्स और रेजोल्यूशन में कहां?

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इंडियन एक्सप्रेस में मार्च में छपा ये लेख बताता है कि वर्तमान में सुरेन्द्र मोहन पाठक के नये उपन्यास के पहले संस्करण की ५०,००० प्रतिया छपती हैं। जिन्होने सुरेन्द्र मोहन पाठक का नाम नही सुना उनके लिये- पाठक साहब हिन्दी जासूसी उपन्यास लिखते हैं, जिन्हे पाकेट बुक्स कहा जाता है और वे आज के दौर में इस श्रेणी के टाप के लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साल में ४-५ उपन्यास निकलते हैं उनके, कीमत ४० रुपये के करीब। लुगदी कागज पर छपने वाले ये उपन्यास आपको उत्तर भारत के किसी भी शहर (विशेषकर रेलवे स्टेशन और बस अड्डे)में उपलब्ध हो जायेंगे। (हाल में खबर आई है कि जल्द ही ये उपन्यास सफेद कागज पर भी आने वाले हैं)|

अपने हर उपन्यास के पहले संस्करण की पचास हजार प्रतियां शायद किसी भी हिन्दी लेखक के लिये सपना हो। कितना भी रोना रो लिया जाये कि हिन्दी पढने वाले पाठक तो हैं ही नही, हिन्दी में तो कोई किताब खरीदना पसन्द करता ही नही,पर यह सवाल भी अपने जगह पर है कि एक आम आदमी को आसानी से समझ आने वाला और विशुद्ध मनोरंजन करने वाला लेखन हिन्दी में होता कितना है?  “हिन्दी के कर्त्ता धर्त्ता ” शायद इन उपन्यासों को देख कर नाक भौ सिकोडें और इन्हे दोयम दर्जे का मानें, लेकिन  एक आम पाठक, जिसे विशुद्ध टाइमपास और मनोरंजन चाहिये, की पठन पिपासा यही उपन्यास शान्त करते हैं। इनके पाठक वर्ग में पढे लिखे वकील और प्रोफेसर से लेकर रात को गली में जागरण करने वाला चौकीदार तक होता है।

यह पाठक वर्ग बिना किसी मार्केटिंग के पिछले २०-२५ सालों में बना है…पर ये इस संभावना को जरूर इशारा करता है कि हिन्दी का कितना बडा पाठक वर्ग मौजूद है और हिन्दी में किताब लिखने की कितनी संभावनाएं है…जैसा कि मैने अपने पिछले लेख में लिखा था।

अभी हाल ही में चेतन भगत की नयी पुस्तक “Three Mistakes of My Life” पढी। एक टाइमपास किताब…बिना दिमाग लगाये पढने बैठिये, कुछ पात्र और घटनाएं आपको अपने आसपास की नजर आयेंगी…थोडा बहुत उनसे रिलेट करिये और ३-४ घंटे में खत्म करके अपने काम पर लगिये। यह पोस्ट “Three Mistakes of My Life” के बारे में नही है।

चेतन भगत की पहली किताब “Five Point Someone…”, IIT के छात्रों की जिन्दगी पर आधारित थी। देश में हर साल करीब २ लाख इंजिनीयर निकलते हैं और हर इंजीनीयर ने, प्रवेश परीक्षा की तैयारी के समय IIT का सपना जरूर देखा होता है। इस हिसाब से किताब एक बहुत बडे मार्केट को टार्गेट करती थी। किताब अच्छी बिकी। इस किताब ने एक नया ट्रेन्ड स्थापित किया और फिर कई नये-नये लेखकों की IIT, IIM और अन्य कालेजों की जिन्दगी पर आधारित कई पुस्तकें आई। कुछ पढी भी गईं, कुछ ऐसे ही निकल गईं..पर “पाँच दशमलव…” एक बेन्चमार्क बन गई।

खैर,यहां लिखने का मूल मकसद चेतन भगत पर चर्चा करना भी नही है, पर इस प्रक्रिया पर चर्चा करना है। हल्का फुल्का लेखन, युवाओं पर केन्द्रित, मध्यवर्ग पर केन्द्रित जिसमें बहुत भारी भरकम कथानक होने की बजाय आसपास की जिन्दगी के कुछ पात्र हों। थोडी सी मार्केटिंग और ब्रांडिंग। जेब को सूट करती कीमत। एक फार्मूले जैसा। (“Three Mistakes of My Life” ९९ रुपये की है..हालांकि कीमत कम करने के चक्कर में किताब की छपाई और बाइंडिंग एकदम घटिया कर दी गई)।

पिछले कुछ दिनों से सोंच रहा हूं कि हिन्दी में अगर इस तरह की किताबें आने लगें, तो उन्हे कितना पडा पाठक वर्ग मिल सकता है। कितना बडा बाजार है? क्या इस तरह का लेखन हिन्दी में अभी होता भी है?

मुझे लगता है कि हिन्दी में इस तरह की किताबों का बडा बाजार होगा। हिन्दी के २-३ अखबार अपनी-अपनी पाठक संख्या १ करोड से ऊपर बताते हैं। क्या इन पाठकों में से एक प्रतिशत भी हिन्दी में हल्के फुल्के लेखन को नही पढाना चाहेंगे। पिछली जुलाई में हैरी पाटर की सातवीं किताब रिलीज होने के समय हिन्दी में उसकी पांचवी किताब का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ था और हाथों-हाथ ५००० प्रतियां बिक गईं थी थी। हैरी पाटर पुस्तकों की पहली पाँच किताबों के हिन्दी अनुवादों की अब तक १ लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, जिनकी कीमत २००/- से ३५०/- तक थी। खबर यहां पढें। इन्हे प्रकाशित करने वाले मंजुल पब्लिशिंग हाउस एवं हिन्दी के अन्य प्रकाशक इन प्रक्रिया को किस तरह देखते हैं, पता नही…लेकिन अगर वो थोडी रुचि लें तो शायद अच्छा खासा मार्केट बन सकता है कई नये लेखक उभर सकते हैं। (हिन्दी के वर्तमान लेखकों की अपनी जानकारी बहुत अच्छी नही है।)

पिछले कुछ दिनों से मैं कमलेश्वर की “कितने पाकिस्तान” भी पढने की कोशिश कर रहा हूं। इस पुस्तक का काफी नाम सुना था और बहुत समय से पढने की इच्छा थी। मई अंत में नागपुर स्टेशन पर खरीदी, पर अभी तक आधी ही पढ पाया हूं। दिक्कत ये है कि एक बार में ३-४ पेज से ज्यादा नही पढ पाता। क्योंकि पढ कर उसे सोंचना पडता है, मनन करना पडता है और फिर पचाना पडता है। चेतन भगत नुमा पुस्तकों में आपको प्रोसेसिंग कुछ नही करनी पडती और हम जैसे कम समझ लोगों को भी आसानी से समझ आ जाती हैं…नतीजा टारगेट मार्केट में बढोतरी। अंग्रेजी पुस्तकों में रुचि रखने वाले भारतीय युवाओं से ही पूंछ लीजिये, कितने लोगों ने चेतन भगत को पढा है …और कितने लोग विक्रम सेठ को।…अन्तर पता चल जायेगा।

अब आते हैं इस पोस्ट के मूल मकसद पर। मुझे लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारों से में कई लोगों में इस तरह का लिख पाने की संभवनाएं हैं। जिनकी भाषा और मुद्दे बहुत भारी नही होते, पढने-समझने में आसान होते हैं , आसपास की ज़िन्दगी से जुडे होते हैं। कई चिट्ठाकारों की कई पोस्ट्स इतनी बेहतरीन हैं कि उन्ही का संकलन कर के एक किताब छपवाई जा सकती है। तो बताइये, कैसा आइडिया है, और आप कब किताब लिखना शुरू कर रहे हैं।

सबक

  • कई काम दूर से बहुत कठिन दिखते हैं,लेकिन एक बार शुरू कर दें तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं।
  • असंभव कुछ नही होता। बस थोडे से अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होती है।
  • There is always scope for improvement.
  • प्राथमिकताएं तय करना बहुत जरूरी है, अन्यथा काफी समय उन कार्यों में नष्ट हो जाता है, जिनकी जरूरत नही थी ।
  • कब क्या किसे कह रहे हैं, इस बारे में बहुत सावधान रहना चाहिय। ना जाने कब कौन सी बात उलटी पड जाये ।
  • Never React, Always Respond. तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिये। समय लेकर ठंडे दिमाग से सोंच कर अपनी बात कहनी चाहिये। (‘चक दे इंडिया’ में एक संवाद था, ‘हर लडाई उसी समय नही लडी जाती, कुछ बाद के लिये भी छोड देना चाहिये’।)
  • Nobody is indispensable. हमारे पहले भी दुनिया थी और हमारे बाद भी दुनिया चलेगी।
  • हर काम, छोटे सा छोटा, अथवा बडा से बडा, कुछ सीखने का अवसर देता है, बशर्ते हम सीखने को तैयार हों।
  • Never ever believe things which looks too obvious.
  • Never judge people, based on first impression or their looks. Take time.
  • COMMUNICATE. विवाद कितने भी हो जायें, संवाद बना रहना चाहिये। अक्सर एक फोन काल कई सारी गलतफहमियों को दूर करने के लिये काफी होती है।

इनमें से कुछ सबक खुद ठोकर खाकर सीखे हैं, कुछ दूसरों को देख कर। ये बात अलग है कि ये जानने और दिमाग में होने के बावजूद अक्सर गलतियां कर बैठते हैं। यहां लिख दिये हैं ताकि सनद रहे।

सुबह सुबह किसी बात पर मूड खराब हुआ तो यह “कूडे के ट्रक वाला सिद्धांत” याद आ गया। कुछ दिन पहले एक ई पत्र में प्राप्त हुआ था। सार कुछ इस तरह से है।

क्या आप एक खराब ड्राइवर, किसी अभद्र कर्मचारी, किसी बदमिजाज दुकानदार के चक्कर में अपना दिन खराब कर लेते हैं? सडक चलते आपसे किसी ने कुछ कह दिया, कोई दुकानदार बद्तमीजी से पेश आया, रेस्तरां में गये और सर्विस अच्छी नही हुई आदि आदि? एक अच्छे/सफल इन्सान का गुण यह है कि वह किस तरह से ऐसी गैरजरूरी बातों को नज़रअंदाज करके अपना ध्यान जरूरी कामों पर लगाये। कूडे के ट्रक का सिद्धांत कहता है कि –

“कई लोग कूडे से भरे ट्रक की तरह होते हैं। वे अपने साथ साथ क्रोध, भय, घृणा, नैराश्य का कचरा अन्दर में समेटे चलते हैं। जैसे जैसे यह कचरा उनके अन्दर भरता चला जाता है, उन्हे इसे कहीं फेंकने की जरूरत महसूस होती है। ठीक कचरे से भरे ट्रक की तरह। हो सकता है बदकिस्मती से आज आप उनके रास्ते में आ गये और उन्होने इसे आपके ऊपर फेंक दिया।

तो अबकी बार कोई अपना कचरा आपके ऊपर इस तरह फेंके, तो इसे दिल पर मत लीजिये। सामने वाले पर तरस खाइये। मुस्कुराकर उसे नजरंदाज कीजिये और खुश रहिये। आप ज्यादा अच्छा और प्रसन्न महसूस करेंगे। और हाँ, ये भी देखें कि कितनी बार हम अपना गुस्सा दूसरों पर उतारते हैं और कचरे के ट्रक की तरह बर्ताव करते हैं।”

ई मेल में इसके रचियता का नाम था, David J Polly. थोडा गूगल किया तो पता चला कि “The Law of Garbage Truck” डेविड साहब का ट्रेड मार्क है। वे एक ख्यातनाम वक्ता और लेखक हैं। कचरे के ट्रक वाली कहानी विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं, अंग्रेजी में। इस पर एक वेबसाइट भी है। यहाँ और यहाँ डेविड साहब के ब्लाग भी हैं।

सिद्धांत सुनने में अच्छा लगता है ना। भारतीय दर्शन पर नज़र डालेंगे तो हमारे यहां इस तरह का दृष्टांत भगवान बुद्ध के प्रेरक प्रसंगों में मिलता है। जब एक व्यक्ति बुद्ध को खूब गालियां देता है पर वो जरा भी विचलित नही होते। शिष्य के पूंछने पर उसे समझाते हैं कि भई जब वो गालियां मैने स्वीकार ही नहीं कीं तो वो तो उसी के पास रही ना। मुझे लगी ही नही। मुझे उससे क्या फर्क पडता है।

सो नया तो कुछ भी नही है, बचपन से पढते आ रहे हैं, जीवन में उतार सकें तो बात बने।

तेलुगु नव वर्ष (युगादि) पर दोस्तों के साथ श्रीसैलम जाने का मौका मिला जहाँ भारत के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक और शक्तिपीठ हैं। सुबह सवेरे की बस पकड कर छः घंटे के सफर के उपरांत श्री सैलम पहुँचे, ये आपने पिछली पोस्ट में पढा। अब आगे….

बस से उतर कर जो आगे का नजारा किया तो भीड देख कर भाई लोग भौंचक रह गये। कन्धे से कन्धा सटा कर चलते लोग। मुझे पूर्णिमा के आसपास गिरिराज जी(गोवर्धन, मथुरा) की परिक्रमा याद आ गई…वैसी ही भीड, रैले का रैला चलता हुआ..२१ किलोमीटर (सात कोस) तक। यहां फर्क ये था कि बस एक किलोमीटर आगे मंदिर तक जाना था…पर दिक्कत ये कि हमें कुछ पता नही था। मित्र रामा एक बार आया था पर इस भीड को देख कर उसका सारा दिशा ज्ञान धरा रह गया। भीड के रेले के साथ साथ चलते हुए मंदिर के पास तक पहुंछे तो बताया गया कि थोडा गलत आ गये हैं…कुछ पीछे से एक मोड मुडना था और दर्शन वाली लाइन उधर ही थी। घूमते फिरते उधर पहुँचे। अभी तक सडक पर चलती भीड देखी थी…अब दर्शन की लाइन देख कर सांस अटक गई। फ्री दर्शन की लाइन का तो कोई पार नही दिख रहा था और ५० रुपये वाले दर्शन में जो मारा मारी हो रही थे वो देखी नही गई। हार कर एक जगह लाइन में लगे जहां सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे बताये गये। सबसे बडी मुश्किल यह कि सूचना देने वाला कोई नही। लोग एक दूसरे से पूंछते और एक दूसरे को जवाब भी दे देते। थोडी देर बाद पता चला कि ये १०० रुपये वाली खिडकी तो बंद पडी है..और टिकट नही मिल रहे हैं। फिर भी खडे रहे। किसी तरह खिडकी तक पहुँचे तो बताया गया कि टिकट अब शाम को ६ बजे मिलेंगे।

३५० वाला…? शाम को।

६०० वाला….? शाम को।

१००० वाला…? ह्म्म्म आपको चाहिये?..मिल सकता है..। नही..शाम को!

मन किया कि आसपास घूम कर दर्शन किये बगैर की लौट जायें..पर नही..आये हैं तो इनसे मिल कर ही जायेंगे। हमें हैदराबाद के अपने पिच्चर हाल याद आये..जहां से हम कभी खाली हाथ नही लौटे चाहे ४० की टिकट ८० में खरीदी हो। अफसोस यहां कोई ब्लेक नही हो रही थी।

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(भीड का पहला नजारा)

मुझे समझ नही आ रहा कि क्या मन्दिर में पैसे देकर दर्शन वाली व्यवस्था होनी चाहिये? या सब एक समान हों और दर्शन की कोई बेहतर व्यवस्था हो। माना कि गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते लेकिन कम से कम इंतजाम तो ठीक किये जा सकते हैं? खडे रहने की व्यवस्था, छाया, सूचना एवं जानकारी आदि आधारभूत व्यवथाएं तो प्रशासन उपलब्ध करवा ही सकता है..या फिर सोंचा हुआ है कि राम जी की मरजी राम जी का खेत। भगवान का घर है..यहां हम क्या कर सकते हैं। खैर ये हमें बाद में पता चला कि युगादि का त्यौहार होने की वजह से उन २-३ दिनों में आम दिनों से २-३ गुनी भीड थी अन्यथा समान्यतः इतनी अव्यव्स्था नही होती। फिर भी चूंकि ये बात पहले से पता होती है सो बेहतर इनतजाम तो किये ही जा सकते हैं।

खैर..सोंचा गया कि भगवान से तो शाम को ही मिलेंगे..आसपास घूम लियी जाये। पहले मंदिर का एक चक्कर काटा, इस आस में कि बेकडोर एंट्री का कोई इंतजाम हो। असफल। मंदिर के पीछे प्रसाद वितरण काउंटर थे जहाँ से पाँच-पाँच रुपये के लड्डू खरीदे और स्वयं ने भोग लगाया। बहुत स्वादिष्ट। फिर होटल में खाना खाया और सोंचा कि रात को लौटने के लिये आखिरी बस में टिकट करवा लेते हैं।बस अड्डे पहुँचे तो वहां एक सूचना चिपकी हुई थी…फलां-फलां-फलां दिन बसों के अग्रिम आरक्षण बंद रहेंगे। अव्यवस्था का एक और नमूना। जिस समय सबसे ज्यादा भीड रहे, सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब सेवाएं बन्द कर दो। पब्लिक अपने आप निपटेगी।

खैर, अब आसपास घूमने निकलना था। घूमने के लिये २१० रुपये में एक आटो किया गया। तय हुआ कि वो हमें साक्षी गणपति, शिखरम एवं अन्य २-३ मंदिर दिखायेगा। हम इस मुगालते में थे कि आसपास ही कोई झरना भी है,जो कि इस २१० वाले पैकेज में शामिल है। तेलुगु में बात हुई थी सो रामा से कहा कि एक बार कनफर्म कर लो। उसने भी हाँ-हूँ करके टाल दिया। खैर, आटो में बैठकर चले। साक्षी गणपति और एक अन्य मंदिर तो २-३ किलोमीटर की दूरी पर ही निकले। हमें लगा कि बेटा आटो वाले ने ठग लिया। उसके बाद गये एक अन्य स्थल पर, जिसका नाम नही पता चला। वहां काफी नीचे सीढियां जाती थीं और नीचे पहाड में से पानी निकल रहा था। लोकेशन एक छोटे मोटे झरने जैसी ही थी,लेकिन सूखा हुआ। शायद बरसात में आते तो नजारा कुछ और होता। यहाँ खत्म करके पूंछा अब कहां..तो बोले शिखरम। यह इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी बताई जाती है। यहाँ सबसे ऊपर नंदी की मूर्ति स्थित है। और वहां से श्रीसैलम कस्बा और मुख्य मंदिर भी नजर आता है। नंदी के दोनों सींगों के बीच में से मंदिर को देखने की परंपरा है, शुभ माना जाता है।लोग देख रहे थे और हम लोगों को देख रहे थे। यहाँ से नीचे उतरे तो पता चला कि यह आटो डील का आखिरी पडाव था और अब वापस हमें श्रीसैलम कस्बा जाना था। झरने के बारे में पूंछा तो बताया गया कि वो तो यहाँ से ६०-७० किलोमीटर दूर है, वो इस डील का हिस्सा नही था!

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(शिखरम से शहर और कृष्णा नदी)

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(नंदी के इन दो सींगों के बीच में से मंदिर देखने की परंपरा है)

वापस पहुँचे करीब पाँच बजे। अभी छः बजने में एक घंटा था पर फिर भी टिकट मिलने के संभावित स्थल पर जाकर भीड में खडे हो लिये। इस बार भी किसी को पता नही था कि टिकट यहीं मिलेंगे अथवा नही। मिलेंगे तो कितने रुपये वाले मिलेंगे। पर हम डटे रहे। अभी सडक पर ही खडे थे और टिकट खिडकी तक पहुँचने वाली रेलिंग का दरवाजा नही खुला था। पौने छः के करीब वो दरवाजा खुला और जो भगदड मची कि अलवर में पिच्चर हाल के बार हुई धक्का मुक्की और बेल्टें याद आ गईं। कुदते फांदते लाइन में लगे और टिकट खिडकी खुलने का इंतजार करने लगे। आखिरकार खिडकी खुली और लाइन सरकना शुरू हुई। टिकट खिडकी के करीब पहुँचकर पता चला कि वहां मात्र साढे छः सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे थे ये “अभिषेकम” के टिकट थे। अन्य किसी टिकट के बारे में जानकारी नही थी और दर्शन तो आज ही करने थे तो टिकट खरीदे गये..जिसमें २ नारियल, एक गुलाबजल की शीशी और एक गमछा साथ में मिला। मंदिर के अंदर पहुँच कर ऐसा लगा कि आधा लडाई फतह हो गई है। पर यहां अन्दर जाकर कहां जाना है यह कोई जानकारी नही थी। हम अलग तरफ से घुसे थे, दर्शन की लाइन (फ्री और पचास रुपये वाले) अलग जा रही थी। एक जगह कुछ लोगों का झुण्ड दिखा जो हमारा वाला ही सामान लिये हुए थे ..उनसे पूंछा तो पता चला कि हमें भी यहीं बैठना था। यह जगह गर्भगृह से थोडा हट कर थी और यहां हमें भगवान का अभिषेक करना था। आखिरकार एक सज्जन आये और उन्होने लाइन लगवाई..सात सात के ग्रुप में अभिषेक करना था भगवान का। उसके पहले ऊपरी वस्त्र (शर्ट और बनियान ) उतारने का आदेश मिला। सो वो उतार कर साफी गले में डाल ली गई। हमें ये चिन्ता थी कि हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर पायेंगे या नही सो अभिषेक करवाने वाले सज्जन से ही पूंछा कि भाईसाहब, मुख्य मंदिर के दर्शन इस पैकेज में शामिल हैं या नहीं। उन्होने हाँ कहा तो तसल्ली हुई। यहां अपना नम्बर आया तो गुलाबजल से भगवान का अभिषेक किया गया, एक नारियल फोडा गया और चल दिये। दर्शन के लिये किधर से जाना है अभी भी यह पता नही थी। एक पुलिसवाले से पूंछा तो उन्होने शार्टकट बताया और हमने एक दरवाजा पार करके सीधे अपने आप को मुख्य मंदिर के अन्दर पाया। चूंकि मंदिर का अंदरूनी भाग बहुत छोटा था और पब्लिक बहुत ज्यादा, सो गर्मी औए उमस भयंकर थी। कुछ AC लगे हुए दिखे पर काम नही कर रहे थे। हमने सोंचा कि हमें तो यहां से चन्द पल में चल देना है, बेचारे भगवान जी का क्या हाल होता था, जो हमेशा यहीं रहते हैं। एकदम मुख्य गृह तो और भी बहुत छोटा था और अंधेरा भी। पंडित लोग खडे थे जो किसी को २ सेकेंड से ज्याद मत्था नही टेकने देते । आप सिर झुकाइये..पीछे से वो आपको झुकायेंगे और उठा देंगे। हमने सिर टिकाया और जो पीछे से धक्का लगा तो भट्ट से सिर टकराया शिवलिंग से। हमने शिवजी से माफी मांगी और निकल लिये। इसके बाद ज्यादा समय नही लगा, शक्तिपीठ के दर्शन किये और थोडी ही देर में हम मंदिर के बाहर थे। बाहर अभी भी भीड जोरदार थी सो हमने निश्चय किया कि अगर भीड में अलग अलग हो गये तो बस स्टेण्ड के पास मिलेंगे। हमें चिन्ता यह थी कि भीड की वजह से लौटती बस में जगह नही मिलेगी। पर ऐसा कुछ नही हुआ। जिस बस में लौटे वो लगभग खाली आई और हम सीट पर लम्बलेट होकर आये। शायद हैदराबाद में हमारे सिवा सबको पता था कि पर श्रीसैलम में कर्नाटक और महाराष्ट्र से आये हुए लोगों की भीड होती है सो अभी ना ही जाया जाये तो बेहतर।

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(शाम को दर्शन के समय भीड)

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पोस्ट कुछ ज्यादा लम्बी हो गई। इस पोस्ट को कुल तीन भागों में बांटने का विचार था पर महसूस कर रहा हूं कि पार्ट में पोस्ट ’कमिट’ तो कर देता हूं..पर एक भाग लिखने के बाद दूसरा भाग लिखना लम्बा खिंच जाता है (या बिल्कुल ही टल जाता है) जो कि गलत है। कम से कम दो पोस्ट्स के दूसरे भाग इस चिट्ठे पर आने की राह देख रहे हैं पर नही आ पा रहे। प्रयास रहेगा कि सीरियल पोस्ट के चक्कर में ना ही पडा जाये।