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Archive for the ‘यात्रा वृत्तांत’ Category

दिवाली पर ९ दिन के लिये घर जाना हुआ।

रिजर्वेशन कन्फर्म नही हो पाया था, सो जाते समय तो जनरल डब्बे में बैठ कर गया। बहुत सालों बाद ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठने का मौका लगा। हैदराबाद से भोपाल तक का रात भर का सफर था और ट्रेन में दिवाली की भीड का अंदाजा तो था…पर ये सोंच के चढ गये कि जाना तो है ही, किसी तरह आज की रात काटनी है बस। किस्मत से टिकने को जगह भी मिल गई…सो बैठ तो लिये ही।

१० व्यक्तियों के बैठने की जगह में ३० लोग फँसे हुए हों तो रात कैसी बीतनी है इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है पर मुझे ये समझ नही आता कि भारतीय रेलवे अपनी ट्रेनों में सामान्य श्रेणी के डब्बे क्यों नही बढाता। कालेज समय में कई बार जनरल बोगी में सफर करने का मौका लगा, अलवर-जयपुर-कोटा और मथुरा-कोटा के बीच, पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि सामान्य श्रेणी के डब्बे में, लोगों को कम से कम बैठने की सीटें पर्याप्त पड रही हों…हमेशा भंयकर धकापेल ही देखी है।

एक अन्य बात यह,कि आज तक कभी सामान्य श्रेणी के डब्बे में टिकट परिचालक नही देखा…(शायद कमाई का स्कोप कम होता है यहाँ) खैर..आजू-बाजू और सामने वालों पर झूलते हुए और सिर पर पैर रखते हुए, २-४ बार लाइव लडाई देखते हुए, किसी तरह रात कटी और सुबह भोपाल और फिर आगे घर पहुँचे।

लौटते वक्त मैने तीन टिकट करवाये थे, भोपाल-हैदराबाद, भोपाल-नागपुर और नागपुर हैदराबाद…ये सोंचकर कि इनमें से कोई २ भी कन्फर्म हो गये तो सफर कट जायेगा। लेकिन सिर्फ भोपाल-नागपुर ठीक हुआ जबकि कठिन सफर उसके आगे का था। किस्मत से मित्र अंशुल के कजिन मेरी ट्रेन के पहले वाली ट्रेन से हैदराबाद जा रहे थे…उन लोगों के टिकट कन्फर्म थे..बस जनरल टिकट लेकर उनके साथ लद लिये। संयोग देखिये…इस बार तो स्लीपर श्रेणी में भी टी टी साहब ने परेशान नही किया…एक बार उनके दर्शन हुए पर वो इतने व्यस्त थे कि टिकट चेक करने की फुरसत में नही दिखे।

पिछली सफर की कतरनों में मैने लेपटाप के Penetration और ट्रेन में मोबाइल चार्जिंग की परेशानी पर लिखा था। लेपटाप का penetration पहले से ३-४  गुना ज्यादा दिखा(कारण यह भी हो सकता है कि ट्रेन भारत की CyberCity) जा रही थी। और डब्बों में दो चार्जिंग पाइंट भी लगा दिये गये हैं। हालांकि ४ में एक ही डब्बे के पाइट काम कर रहे थे और ८१ लोगों के बीच ये बहुत कम है…पर नही मामा से काना मामा अच्छा। कुछ तो है। वैसे ये पाइंट, बाथरूम के बगल में, डब्बे के दरवाजे के एकदम पास लगाये गये हैं…मतलब उम्मीद ये की जाती है कि यात्री चलती ट्रेन में दरवाजे के पास खडा रहे। खैर, हो सकता है आने वाले समय में हर पंखे के स्विच के साथ एक चार्जिंग पाइंट भी उपलब्ध करवाया जायेगा।

एक करामात और…स्लीपर के डब्बों में साइड की शायिकाओं में जहाँ पहले दो ही लोगों की जगह होती थीं..अब एक शायिका और फंसा दी गई है। इसके फलस्वरूप दिन में तो उस एक बर्थ पर तीन लोगों को फँसना पडता है….और सोते समय ऐसा लगता है कि ताबूत में फँसा दिया है। एक यात्री और बढने एवं सीट के नीचे जगह कम होने से सामान रखने की जगह इतनी कम पडने लगी है कि लगभग हर जगह लोगों को सीटों के बीच में सामान रखने पड रहे थे। है तो ये कमाई बढाने की ट्रिक पर सवारियों की असुविधा का पूरा ध्यान रखा गया है इसे लागू करते समय।

चलते चलते – दिवाली का मौसम अपना इस बार थोडा स्पेशल रहा। जिन्दगी में कुछ उथल पुथल टाइप्स परिवर्तन हो रहे हैं। उम्मीद करता हूं आप सब की दिवाली मंगलमय रही होगी।

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तेलुगु नव वर्ष (युगादि) पर दोस्तों के साथ श्रीसैलम जाने का मौका मिला जहाँ भारत के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक और शक्तिपीठ हैं। सुबह सवेरे की बस पकड कर छः घंटे के सफर के उपरांत श्री सैलम पहुँचे, ये आपने पिछली पोस्ट में पढा। अब आगे….

बस से उतर कर जो आगे का नजारा किया तो भीड देख कर भाई लोग भौंचक रह गये। कन्धे से कन्धा सटा कर चलते लोग। मुझे पूर्णिमा के आसपास गिरिराज जी(गोवर्धन, मथुरा) की परिक्रमा याद आ गई…वैसी ही भीड, रैले का रैला चलता हुआ..२१ किलोमीटर (सात कोस) तक। यहां फर्क ये था कि बस एक किलोमीटर आगे मंदिर तक जाना था…पर दिक्कत ये कि हमें कुछ पता नही था। मित्र रामा एक बार आया था पर इस भीड को देख कर उसका सारा दिशा ज्ञान धरा रह गया। भीड के रेले के साथ साथ चलते हुए मंदिर के पास तक पहुंछे तो बताया गया कि थोडा गलत आ गये हैं…कुछ पीछे से एक मोड मुडना था और दर्शन वाली लाइन उधर ही थी। घूमते फिरते उधर पहुँचे। अभी तक सडक पर चलती भीड देखी थी…अब दर्शन की लाइन देख कर सांस अटक गई। फ्री दर्शन की लाइन का तो कोई पार नही दिख रहा था और ५० रुपये वाले दर्शन में जो मारा मारी हो रही थे वो देखी नही गई। हार कर एक जगह लाइन में लगे जहां सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे बताये गये। सबसे बडी मुश्किल यह कि सूचना देने वाला कोई नही। लोग एक दूसरे से पूंछते और एक दूसरे को जवाब भी दे देते। थोडी देर बाद पता चला कि ये १०० रुपये वाली खिडकी तो बंद पडी है..और टिकट नही मिल रहे हैं। फिर भी खडे रहे। किसी तरह खिडकी तक पहुँचे तो बताया गया कि टिकट अब शाम को ६ बजे मिलेंगे।

३५० वाला…? शाम को।

६०० वाला….? शाम को।

१००० वाला…? ह्म्म्म आपको चाहिये?..मिल सकता है..। नही..शाम को!

मन किया कि आसपास घूम कर दर्शन किये बगैर की लौट जायें..पर नही..आये हैं तो इनसे मिल कर ही जायेंगे। हमें हैदराबाद के अपने पिच्चर हाल याद आये..जहां से हम कभी खाली हाथ नही लौटे चाहे ४० की टिकट ८० में खरीदी हो। अफसोस यहां कोई ब्लेक नही हो रही थी।

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(भीड का पहला नजारा)

मुझे समझ नही आ रहा कि क्या मन्दिर में पैसे देकर दर्शन वाली व्यवस्था होनी चाहिये? या सब एक समान हों और दर्शन की कोई बेहतर व्यवस्था हो। माना कि गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते लेकिन कम से कम इंतजाम तो ठीक किये जा सकते हैं? खडे रहने की व्यवस्था, छाया, सूचना एवं जानकारी आदि आधारभूत व्यवथाएं तो प्रशासन उपलब्ध करवा ही सकता है..या फिर सोंचा हुआ है कि राम जी की मरजी राम जी का खेत। भगवान का घर है..यहां हम क्या कर सकते हैं। खैर ये हमें बाद में पता चला कि युगादि का त्यौहार होने की वजह से उन २-३ दिनों में आम दिनों से २-३ गुनी भीड थी अन्यथा समान्यतः इतनी अव्यव्स्था नही होती। फिर भी चूंकि ये बात पहले से पता होती है सो बेहतर इनतजाम तो किये ही जा सकते हैं।

खैर..सोंचा गया कि भगवान से तो शाम को ही मिलेंगे..आसपास घूम लियी जाये। पहले मंदिर का एक चक्कर काटा, इस आस में कि बेकडोर एंट्री का कोई इंतजाम हो। असफल। मंदिर के पीछे प्रसाद वितरण काउंटर थे जहाँ से पाँच-पाँच रुपये के लड्डू खरीदे और स्वयं ने भोग लगाया। बहुत स्वादिष्ट। फिर होटल में खाना खाया और सोंचा कि रात को लौटने के लिये आखिरी बस में टिकट करवा लेते हैं।बस अड्डे पहुँचे तो वहां एक सूचना चिपकी हुई थी…फलां-फलां-फलां दिन बसों के अग्रिम आरक्षण बंद रहेंगे। अव्यवस्था का एक और नमूना। जिस समय सबसे ज्यादा भीड रहे, सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब सेवाएं बन्द कर दो। पब्लिक अपने आप निपटेगी।

खैर, अब आसपास घूमने निकलना था। घूमने के लिये २१० रुपये में एक आटो किया गया। तय हुआ कि वो हमें साक्षी गणपति, शिखरम एवं अन्य २-३ मंदिर दिखायेगा। हम इस मुगालते में थे कि आसपास ही कोई झरना भी है,जो कि इस २१० वाले पैकेज में शामिल है। तेलुगु में बात हुई थी सो रामा से कहा कि एक बार कनफर्म कर लो। उसने भी हाँ-हूँ करके टाल दिया। खैर, आटो में बैठकर चले। साक्षी गणपति और एक अन्य मंदिर तो २-३ किलोमीटर की दूरी पर ही निकले। हमें लगा कि बेटा आटो वाले ने ठग लिया। उसके बाद गये एक अन्य स्थल पर, जिसका नाम नही पता चला। वहां काफी नीचे सीढियां जाती थीं और नीचे पहाड में से पानी निकल रहा था। लोकेशन एक छोटे मोटे झरने जैसी ही थी,लेकिन सूखा हुआ। शायद बरसात में आते तो नजारा कुछ और होता। यहाँ खत्म करके पूंछा अब कहां..तो बोले शिखरम। यह इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी बताई जाती है। यहाँ सबसे ऊपर नंदी की मूर्ति स्थित है। और वहां से श्रीसैलम कस्बा और मुख्य मंदिर भी नजर आता है। नंदी के दोनों सींगों के बीच में से मंदिर को देखने की परंपरा है, शुभ माना जाता है।लोग देख रहे थे और हम लोगों को देख रहे थे। यहाँ से नीचे उतरे तो पता चला कि यह आटो डील का आखिरी पडाव था और अब वापस हमें श्रीसैलम कस्बा जाना था। झरने के बारे में पूंछा तो बताया गया कि वो तो यहाँ से ६०-७० किलोमीटर दूर है, वो इस डील का हिस्सा नही था!

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(शिखरम से शहर और कृष्णा नदी)

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(नंदी के इन दो सींगों के बीच में से मंदिर देखने की परंपरा है)

वापस पहुँचे करीब पाँच बजे। अभी छः बजने में एक घंटा था पर फिर भी टिकट मिलने के संभावित स्थल पर जाकर भीड में खडे हो लिये। इस बार भी किसी को पता नही था कि टिकट यहीं मिलेंगे अथवा नही। मिलेंगे तो कितने रुपये वाले मिलेंगे। पर हम डटे रहे। अभी सडक पर ही खडे थे और टिकट खिडकी तक पहुँचने वाली रेलिंग का दरवाजा नही खुला था। पौने छः के करीब वो दरवाजा खुला और जो भगदड मची कि अलवर में पिच्चर हाल के बार हुई धक्का मुक्की और बेल्टें याद आ गईं। कुदते फांदते लाइन में लगे और टिकट खिडकी खुलने का इंतजार करने लगे। आखिरकार खिडकी खुली और लाइन सरकना शुरू हुई। टिकट खिडकी के करीब पहुँचकर पता चला कि वहां मात्र साढे छः सौ रुपये वाले टिकट मिल रहे थे ये “अभिषेकम” के टिकट थे। अन्य किसी टिकट के बारे में जानकारी नही थी और दर्शन तो आज ही करने थे तो टिकट खरीदे गये..जिसमें २ नारियल, एक गुलाबजल की शीशी और एक गमछा साथ में मिला। मंदिर के अंदर पहुँच कर ऐसा लगा कि आधा लडाई फतह हो गई है। पर यहां अन्दर जाकर कहां जाना है यह कोई जानकारी नही थी। हम अलग तरफ से घुसे थे, दर्शन की लाइन (फ्री और पचास रुपये वाले) अलग जा रही थी। एक जगह कुछ लोगों का झुण्ड दिखा जो हमारा वाला ही सामान लिये हुए थे ..उनसे पूंछा तो पता चला कि हमें भी यहीं बैठना था। यह जगह गर्भगृह से थोडा हट कर थी और यहां हमें भगवान का अभिषेक करना था। आखिरकार एक सज्जन आये और उन्होने लाइन लगवाई..सात सात के ग्रुप में अभिषेक करना था भगवान का। उसके पहले ऊपरी वस्त्र (शर्ट और बनियान ) उतारने का आदेश मिला। सो वो उतार कर साफी गले में डाल ली गई। हमें ये चिन्ता थी कि हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर पायेंगे या नही सो अभिषेक करवाने वाले सज्जन से ही पूंछा कि भाईसाहब, मुख्य मंदिर के दर्शन इस पैकेज में शामिल हैं या नहीं। उन्होने हाँ कहा तो तसल्ली हुई। यहां अपना नम्बर आया तो गुलाबजल से भगवान का अभिषेक किया गया, एक नारियल फोडा गया और चल दिये। दर्शन के लिये किधर से जाना है अभी भी यह पता नही थी। एक पुलिसवाले से पूंछा तो उन्होने शार्टकट बताया और हमने एक दरवाजा पार करके सीधे अपने आप को मुख्य मंदिर के अन्दर पाया। चूंकि मंदिर का अंदरूनी भाग बहुत छोटा था और पब्लिक बहुत ज्यादा, सो गर्मी औए उमस भयंकर थी। कुछ AC लगे हुए दिखे पर काम नही कर रहे थे। हमने सोंचा कि हमें तो यहां से चन्द पल में चल देना है, बेचारे भगवान जी का क्या हाल होता था, जो हमेशा यहीं रहते हैं। एकदम मुख्य गृह तो और भी बहुत छोटा था और अंधेरा भी। पंडित लोग खडे थे जो किसी को २ सेकेंड से ज्याद मत्था नही टेकने देते । आप सिर झुकाइये..पीछे से वो आपको झुकायेंगे और उठा देंगे। हमने सिर टिकाया और जो पीछे से धक्का लगा तो भट्ट से सिर टकराया शिवलिंग से। हमने शिवजी से माफी मांगी और निकल लिये। इसके बाद ज्यादा समय नही लगा, शक्तिपीठ के दर्शन किये और थोडी ही देर में हम मंदिर के बाहर थे। बाहर अभी भी भीड जोरदार थी सो हमने निश्चय किया कि अगर भीड में अलग अलग हो गये तो बस स्टेण्ड के पास मिलेंगे। हमें चिन्ता यह थी कि भीड की वजह से लौटती बस में जगह नही मिलेगी। पर ऐसा कुछ नही हुआ। जिस बस में लौटे वो लगभग खाली आई और हम सीट पर लम्बलेट होकर आये। शायद हैदराबाद में हमारे सिवा सबको पता था कि पर श्रीसैलम में कर्नाटक और महाराष्ट्र से आये हुए लोगों की भीड होती है सो अभी ना ही जाया जाये तो बेहतर।

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(शाम को दर्शन के समय भीड)

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पोस्ट कुछ ज्यादा लम्बी हो गई। इस पोस्ट को कुल तीन भागों में बांटने का विचार था पर महसूस कर रहा हूं कि पार्ट में पोस्ट ’कमिट’ तो कर देता हूं..पर एक भाग लिखने के बाद दूसरा भाग लिखना लम्बा खिंच जाता है (या बिल्कुल ही टल जाता है) जो कि गलत है। कम से कम दो पोस्ट्स के दूसरे भाग इस चिट्ठे पर आने की राह देख रहे हैं पर नही आ पा रहे। प्रयास रहेगा कि सीरियल पोस्ट के चक्कर में ना ही पडा जाये।

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हैदराबाद आये दो साल पूरे होने को आये पर आंध्रप्रदेश की कोई जगह देखने का मौका नही मिला था अब तक, सिवाय विशाखापट्टम के जहां किस्मत से २००६ में एक दोपहर बिताने का मौका मिला था। हैदराबाद को नही गिन रहा हूं यहां। २-३ बार कार्यक्रम बनाने की सोंची…पर सोंचते ही रहे गये। वो कार्यक्रम किसी नई पोस्ट के विचार की तरह अथवा ड्राफ्ट पोस्ट्स की तरह दिल अन्दर ही दबे रह गये, पब्लिश नही हो पाये। सो इस हफ्ते जब सोमवार को तेलगु नववर्ष (उगाधी) होने की वजह से शनि-रवि-सोम, ३ तीन की लगातार छुट्टी हुई और काम का बोझ भी कम था तो फिर सोंचा कि इस बार तो कहीं जाकर आया ही जाये। पहला दिन पूरा होते होते लग रहा था कि ये छुट्टियां भी अन्य छुट्टियों की तरह ना बीत जायें। लेकिन शाम होते होते मित्र रामा की सक्रियता के चलते लगा कि इस बार तो कहीं जाने का कार्यक्रम बन ही जायेगा।

२ दिन अभी भी बाकी थे। रामा ने, जो बेचारा छुट्टी के दिन भी आफिस में काम निपटा रहा था,शाम को फोन किया कि हम कल श्री सैलम चलेंगे,सुबह साढे पांच की डीलक्स बस के टिकट करवा लिये हैं। हम ने कहा अति उत्तम। लेकिन २-४ सेंट्स ..बोले तो अपनी सलाहे भी दे डालीं। यार गाडी किराये पर लेकर चलते हैं…मोटरसाइकिल से भी चल सकते हैं…रास्ता बडा अच्छा है …गाडी होगी तो मजा आयेगा आदि आदि । रामा ने अपना रामबाण फेंका…तो फिर गाडी का इंतजाम तुम करो। मैने कहा..नही यार बस ही ठीक है..सस्ती,सुन्दर,टिकाऊ और आरामदायक 🙂 ।

सुबह साढे पाँच बजे कोई बस/ट्रेन पकडे बरस बीत गये..पर इस दिन सुबह ४ बजे उठे…सवा पांच बजे बस अड्डे भी पहुँच गये और शुरू हुआ साढे पाँच की डीलक्स बस का इंतजार। ५.४०/ ५.४५ तक जब बस नही आई तो चिन्ता होने लगी कि हम कहीं गलत जगह,गलत बस का इंतजार तो नही कर रहे। पूंछताछ करने पर पता चला कि जिस बस का हम इंतजार कर रहे थे वो रात को आते समय कहीं फंस गई थी और आने वाली नही थी। उसकी सवारियों को दूसरी बस में बिठाया जा रहा था हालांकि इस आशय की कोई घोषणा करने की कोई जहमत नही उठाई जा रही थी। अब जिस बस में बिठाया जा रहा था वो किसी भी एंगल से डीलक्स नही थी। इसमें बैठकर पता चला कि यह बस तो अपने समय पर ही चलेगी। किसी तरह ६.३० बजे बस हिली और अपना सफर शुरू हुआ। एक घंटा लेट हम चलने के पहले ही हो चुके थे और बस को देखते हुए लग रहा था कि ६ घंटे से पहले तो यह किसी हालत में नही पहुँचायेगी। शुरुआत इतनी प्यारी हुई थी। आगे आगे देखना था होना था क्या।

इसके अलावा, चूंकि हडबडी में सारा कार्यक्रम बना था सो ना तो यह पता था कि वहां देखने के लिये क्या क्या है,रुकने की क्या व्यवस्था है, रास्ते में अगर देखने लायक कोई जगह है तो उसके लिये कहां उतरना है …बोले तो कोई जानकारी नही थी। हालांकि इस तरह कही जाने का अपना अलग मजा है। आप झोला उठाइये और जिधर मन आये चल दीजिये। यह सोंचकर, कि जो होगा वो देखा जायेगा।

अब थोडा श्रीसैलम के बारे में। हिन्दुस्तान में बारह ज्योतिर्लिंग हैं जिनमे से एक श्रीसैलम में है। शिवजी के स्वरूप को यहाँ श्री मल्लिकार्जुन स्वामी कहा जाता है।  साथ ही यहां शक्तिपीठ भी है जहाँ देवी भ्रमरंभा (Bhramaramba) की उपासना की जाती है। इस लिहाज से यह भारत का एक मात्र तीर्थ स्थल है जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ एक ही स्थान पर है। काफी दूर दूर  से श्रृद्धालू यहां आते हैं जिनमें आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और माहाराष्ट्र से आने वाले श्रृद्धालू प्रमुख हैं। यह स्थान करनूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्रीसैलम पहाडी पर बसा है। पास में कृष्णा नदी है जो जंगलों और पहाडों के बीच से होकर निकलती है और जिस पर श्रीसैलम के पास में ही एक बांध बनाया गया है। श्री सैलम हैदराबाद से सडक मार्ग से करीब २३२ किलोमीटर दूर है। करीब १२५ किलोमीटर का  रास्ता  साधारण है लेकिन एक बार आप पहाडी और जंगल का रास्ता शुरू होने के बाद रास्ता देखते ही बनता है। करीब ८०-१०० किलोमीटर का यह रास्ता अत्यंत सुन्दर है। बीच में सडक से थोडा अन्दर जाकर देखने के लिये कुछ जगहे हैं, मसल एक झरना और जंगल के बीच ट्रेकिंग का रास्ता लेकिन खुद का वाहन ना होने की वजह से इन सब जगहों पर रुकना और देखना संभव न हो सका। जाने का समय भी शायद बरसात और उसकी बाद का बेहतर होगा जब जंगल पूरे शबाब पर होता होगा। करीब ५० किलोमीटर पहले से बांध क्षेत्र शुरू हो जाता है और नजारों की नजाकत बढती जाती है। पहाडी के बीच से नदी निकल रही है और यहीं बांध बनाया हुआ है। बस पहाडी के एक तरफ से ढलान से नीचे उतरना शुरू होती है और जगह जगह पर मोड आते हैं जहां बांध आपसे आंख मिचौली करता रहता है। बस में होने के कारण सिर्फ खिडकी में से ही नजारे देख सके और फोटो लिये गये..अन्यथा थोडा समय बिताने के लिये अच्छी जगह है। पहाडी के एक तरफसे उतर कर एक छोटे (बांध की तुलना में छोटे) पुल को पार करके फिर पूरी घांटी चढनी होती है। इसके बाद श्रीसैलम ज्यादा दूर नही रह जाता।

खैर,हम किसी तरह १२:३० बजे के आसपास श्री सैलम पहुँचे। यहां पहुँच कर भीड का जो नजारा देखा, भगवान के दर्शन करने के लिये जो मशक्कत की और आसपास क्या क्या देखा…वो अगली पोस्ट में। आप तब तक रस्ते के फोटू सस्ते में देखिये।

कृष्णा नदी- पहाडी के ऊपर से। तस्वीर में लम्बी घुमावदार सडक देख सकते हैं।

नदी पर करने के बाद, पहाडी के ऊपर से कृष्णा नदी। सामने की तरफ लम्बी घुमावदार सडक देख सकते हैं।

बांध- कृष्णा पर बने पुल के ऊपर से

कृष्णा पर बने पुल से बांध का दृश्य। नदी के पेटे में लोग तो दिख ही रहे हैं बडी संख्या में चौपहिया वाहन भी खडे थे (फोटो में नही दिख रहे।)


चलते चलते- *श्रीसैलम को अंग्रेजी में Sri Sailam लिखा जाता है। हिन्दी में नाम लिखा हुआ मैने केवल एक जगह देखा जहां श्रीशैलम लिखा हुआ था। लेकिन उच्चरण जो मैने आजतक लोगों से सुने हैं वो या तो स्रीसैलम सुना है या श्रीसैलम। मैं निश्चय नही कर पाया कि सही क्या है। अपन फिलहाल श्रीसैलम से काम चला रहे हैं।

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भाग १- काँच की सडकें
भाग २- परदेस में खाना-पीनाeffile.jpg

कार्यक्रम इतना टाइट था, कि पेरिस घूमने के लिये लौटते वक्त मात्र शुक्रवार की दोपहर और शाम मेरे पास थी…शनिवार दिन में ११-१२ बजे वापसी थी। क्या देखें, क्या छोडें..और क्या खरीदें। मेरे साथ वन्दना जी और सुरीता जी थे जो फ्रांस में मेरी मुँह और कान थे (Interpreter को हिन्दी में क्या कहेंगे?) । ये लोग पेरिस के चप्पे चप्पे से वाकिफ थे सो इन्ही से मदद की गुहार लगाई गई। दो संभावनाएं थी या तो पूरा समय टेक्सी करके घूमा जाय..या एक जगह से दूसरी जगह मेट्रो में बदल बदल कर सफर किया जाये । अनुभवी जनों ने कहा कि मेट्रो से घूमेंगे तो थोडा अडवेन्चरस भी रहेगा और सस्ता भी। टेक्सी अगर कहीं ट्रेफिक वगैरह में फंस गई तो खडे ही रह जाओगे..कहीं जा नही पाओगे..और यहां की टेक्सी का मीटर जो घूमता है…देखते हीं चक्कर आने लगते हैं।

यहां के सबसे खास बात यह है कि आपको जगह जगह निः शुल्क नक्शे , जानकरी , पुस्तक आदि मिल जाते हैं सो परेशानी नही होती। उसके अलावा मेट्रो आदि स्टेशनों, मार्गों में दिशा निर्देश बहुत सपष्ट हैं। चूंकि मेट्रो में पहले नही बैठे थे पहले, तो ये अपने आपमें रोमांचक था। सो होटल से नक्शा उठाया गया..एक शहर का और एक मेट्रो का। सीमित समय में क्या क्या देखा जा सकता था और किन किन रास्तों से ताकि समय का अधिकाधिक उपयोग हो सके। चूंकि अपनी जानकारी बिल्कुल शून्य थी..हम कुछ नही बोले, सिवाय इसके कि एफिल टावर जरूर देखना है, इसके अलावा क्या दिखा सकें आपकी मर्जी। मेट्रो का नक्शा देख कर लगा कि बहुत जटिल सिस्टम है..लेकिन एक बार गौर किया और २ बार अलग अलग मेट्रो में बैठने के बाद इतना सरल लगने लगा कि आप एक नक्शा और जेब में पैसे देकर कहें भी छोड दीजिये, बिना किसी से कुछ भी पूंछे भी आराम से घूम सकते हैं।
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सबसे पहला पडाव था Sacré-Cœur Basilica (Basilica of the Sacred Heart)। ये एक पुरातन चर्च है जो कि एक पहाडी पर स्थित है। ऊपर चढने पर पूरा शहर दिखाई देता है। यह काफी पुराना इलाका है, आसपास छोटी छोटी गलियां हैं जहां कई बार, कैफ़े हाउस, रेस्त्रां इत्यादि हैं। इनमें कि रिनेंसा के समय चित्रकार, कवि, दार्श्निक इत्यादि बैठा करते थे। अभी भी फुटपाथ पर लाइन से चित्रकार बैठे रहते हैं..यहां घंटा-दो घंटा बैठिये, अपना पोर्ट्रेट बनावाइय। अपना फोटू बनवायें इतना समय नही था…सो थोडा घूमते फिरते, दुकाने टापते हुए फिर बढे मेट्रो स्टेशन की और…।

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अगली मंजिल थी Arc de Triomphe. हिन्दी में कहें तो विजय द्वार। यह अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में नेपोलियन युद्ध के समय शहीद हुए सैनिकों की याद में बनवाया गया था (दिखने में यह काफी कुछ अपने इंडिया गेट जैसा लगता है, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिकों की याद में बना है)। यहाँ से एक सडक शुरू होती है – Champs-Élysées । .इसे दुनिया की फैशन स्ट्रीट भी कह कते हैं…लम्बी-चौडी सडक..दोनों और बडे बडे ब्रान्ड्स के कपडों, गहनों और घडियों के शोरूम, सिनेमाघर, काफी हाउस इत्यादि। जेब में माल हो तो खरीदारी करने के लिये काफी कुछ। हमने बस बाहर से कीमतें देखीं। चूंकि ठंड बहुत थी…और बादल घिरे हुए थे..मेक्डानाल्ड्स में जाकर एक काफी पी..जो बिल्कुल भी अच्छी नही लगी। .रात को इस सडक बहुत अच्छी रोशनी होती है। यहाँ से एफिल टावर बहुत दूर नही है और समय होता तो पूरी सडक नापी जा सकती थी और ‘काफी कुछ’ देखा जा सकता था।
खैर…यहाँ से फिर मेट्रो में सवार हुए और पहुँचे एफिल टावर। एफिल टावर बोले तो फ्रांस का ट्रेड मार्क। ठीक वैसे ही जैसे भारत का ताजमहल। १८८९ में बना यह शिखर, अपने समय में दुनिया का बसे लम्बा मानव निर्मित ढांचा था। इसकी कुल लम्बाई ३२४ मीटर है। टिकट लेकर आप टावर में कुछ ऊपर तक चढ भी सकते हैं…मध्य भाग में एक रेस्त्रां भी है, और अंधेरा होने के बाद जब रोशनी होती है तो पूरा टावर जगमगा उठता है। किंतु चूंकि हमें खरीदारी भी करनी थी (दुकानें यहां १० बजे बन्द हो जाती हैं) और सुबह निकलना भी था, सो ज्यादा देरे नही रुके और फिर मेट्रो पकडी अपने होटल की ओर।

इति श्री पेरिस यात्रा समाप्तम…..

चलते चलते:
इन दिनों चिट्ठा-संसार में ‘खिचडी’ बनाम ‘स्पेशल डाइट’ पर चर्चा चल रही है। दरअसल खिचडी बनाने में बहुत आसान होती है..अपन जैसा अनाडी भी आराम से बना सकता है- नमकीन, मीठी, तीखी, फीकी कैसी भी बना लीजिये..ना ज्यादा मेहनत..ना ज्यादा कुशलता और काबिलियत। जल्दी बन जाती है और हाँ, पचने में भी आसान होती है। इसीलिये ये अपने को रास आती है। वैसे एक बात और है..’बुफे सिस्टम’ में हमने देखा है…छः तरह के पकवान एक थाली में जब आते हैं और जब गुलाबजामुन की चाशनी रायते से गठबंधन करती है…तो लोग कहते हैं..’अरे ये तो खिचडी हो गया’ (बोले तो..खिचडी की भी कई श्रेणियां हो सकती हैं) 🙂

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भाग १ से आगे

एक ना ‘पीने’ वाले शाकाहारी को परदेस में क्या दिक्कत हो सकती है, कोई मुझसे पूंछे। हालांकि जाने के पहले ही वहां ई-मेल द्वारा बता दिया था कि में विथाउट-एग-और-फिश वाला शाकाहारी हूं..पर कोई सुने तब ना। सो खाने की टेबल पर जब वहां वेटर को बताया जाता तो चेहरे पर ऐसे भावा आते मानो कोई अजूबा देख लिया हो। पेरिस में भारतीय होटल मिल जाते हैं, पर मैं चूंकि पेरिस से ३०-४० किमी बाहर था…वहां कुछ उपलब्ध नही था। तो अपना आसरा थी ब्रेड, उस पर मक्खन, नमक और कालीमिर्च। कालीमिर्च भी ऐसी कि कोई तीखापन नही..गनीमत है कि नमक खारा था। साथ में उबले हुई आलू, गोभी, पालक, बीन्स, गाजर आदि आदि। १-२ बार चावल भी मिले। हाँ जूस और फ्रूट खूब लिये..दिन में ३-४ सेब , २-३ गिलास जूस डकार जाते थे।

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( तले हुए आलू, उबली गोभी और पत्ता गोभी 😦 )

चूंकि मैं वहां ज्यादा खाता नही था सो साथी प्रतिभागी अफसोस जताते थे और ‘वेरी-सारी’ भी कहते थे, पर कोई चारा ना था और वैसे भी, मानसिक रूप से मैं ऐसी किसी परिस्थिति के लिये तैयार था। तो एक दिन हमारे लिये विशेष रूप से भारतीय खाना मंगवाया गया। तंदूरी रोटी, पुलाव, पालक पनीर, दाल, अचार, समोसे आदि आदि। साधु-साधु करते हुए खाया। 🙂
भोजन करने का फ्रेंच तरीका भी बताते चलें।(और भी कई चीजों के फ्रेंच तरीके होते हैं;) )। खाने के साथ पीने को जरूर होना। अक्सर रेड वाइन। अब हमें ना पीने का खामियाजा अपने कालेज में तो भुगतना पडता था…यहां भी वही हाल। हां उन्हे देख देख अपने पीने वाले मित्रों की जरूर याद आतीं। फ्रेंच भोजन के तीन चार चरण होते हैं। सबसे पहले शुरुआत होती है, स्टार्टर से। इसमें होते थे कुछ सलाद,उनके ऊपर क्रीम और कुछ ऐसी चीजें जिनका मैं नाम नही जानता (अधिकतर अंडे युक्त)। मैने सोंचा..सलाद बचा कर रख लिया जाये, जब भोजन आयेगा तो उसके साथ खायेंगे..तो बताया गया कि जब तक ये प्लेट तुम्हारे सामने से हट नही जाती..अगले प्लेट नही आयेगी, याने पहले स्टार्टर खत्म कर लें फिर खाना मिलेगा। खाना भी प्लेट में एक ही बार परोसा जाता है। मतलब एक बार में प्लेट में जो आ गया, सो आ गया..ना ज्यादा न कम। इसके अलावा, यहां खाने-पीने की हर चीज डिब्बाबंद होती है …चीनी, जैम, शहद, मक्खन सब चीजों की एक-एक खुराक के बराबर छोटे छोटे पैकेट। दही, छाछ, जूस आदि के साथ भी ऐसा ही।ऐसा नही होगा कि भगोनी में दही रख दें और कटोरी में अपने हिसाब से ले लें।

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यहाँ से जाते समय, मुम्बई से एयर इंडिया की उडान मात्र १० घंटे देरी से थी, सो सुबह के ७ बजे की जगह यहां से निकले शाम के ५ बजे। हालाँकि एयर इंडिया वालों ने होटल उपलब्ध करवाया था सो हाँ खास दिक्कत नही थी पर दूसरे छोर जहाँ हम दिन के १:३० बजे अपेक्षित थे, वहाँ हम पहुँचे राते के ११ बजे। परदेस में नन्ही सी जान, एक दम अकेली..और रात के ११ बजे..हाय दय्या। पूंछो ना कैसे मैने रैन बिताई।
खैर रात को किसी तरह गंतव्य पहुँचे, अपना कमरा मिला और सो लिये। सुबह जब अन्य लोगों से मिले, जो मिलता, मेरी देरी की वजह पूंछता। व्हिच एयरलाइन्स? एयर इंडिय? ओह्ह्ह। ये ओह्ह और नाक भौं सिकोडना इतना खला कि बस।लेकिन मन मसोस कर रह गये।
लेकिन मजा आया लौटते में। वापसी में जब टेक्सी पकडी, तो टेक्सी चालक कम्बोडिया का था। योरोप में किसी एशियाई से मिले, तो ऐसा लगा मद्रास में कोई राजस्थानी मिल गया :)।खैर रस्ते में वो भी पूंछ बैठा..व्हिच एयरलाइन्स। एयरइंडिया। देन इट्स ओके। एयर फ्रांस इस ओन स्ट्राइक सिन्स २-३ डेज़। अब खुश होने की बारी अपनी थी। एयरपोर्ट पहुँचा तो देखा..एयर फ्रांस की ८०% उडानें निरस्त। कुछ हिन्दुस्तानी मिले, जो एक दिन पहले निकलने वाले थे, पर उस हडताल की वजह से नही निकल पाये, और उनक टिकट एयरइंडिया में ट्रांसफर करवाया या था। साथ मिल कर दम भर एयर फ्रांस को गरियाये। और हाँ, अपनी एयर इंडिया..एक दम राइट टाइम थी उस दिन।दिल खुश कर दित्ता। (फ्रांस में आजकल हडतालों का मौसम चल रहा है, शायद वहाँ की सरकारी नीतियों की वजह से। अभी हाल ही में मेट्रो हडताल पर थी, और अन्य नागरिक सुविधाएं भी।)

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फ्रांस निवासी रिचड से मेरी मुलाकात २००२ में बैंगलोर में हुई थी, मात्र १ महीने के लिये। हम लोग एक ही इंस्टिट्यूट पर जाते थे। उसके बाद कभी कभार याहू मेसेन्जर पर हाय हलो होती रही। पेरिस आने का प्लान बना तो मैने उसे एक आफलाइन डाला..अपने आने की खबर देते हुए। समय की कमी के चलते हम वहाँ मिल तो नही पाये, पर फोन पर बतियाये। अंग्रेजी में बात करते करते अचानक वो पूंछ बैठा “तुम्हे हिन्दी आती है?”। मैं भौंचक। मैं बोला..”तुम्हे हिन्दी आती है?” बोला हाँ..मैं तो बैंगलोर समय भी थोडी बहुत बोलता था। और हिन्दी फिल्में भी खूब देखता हूँ..और मेरी बीवी पाकिस्तानी है। खालिस फ्रांसिसी बंदे के मुह से अपनी भाषा सुनकर बहुत अच्छा लगा । हिन्दी फिल्मों के मसाले को हम कितना भी गाली दे लें लेकिन दुनिया भर में बालिवुड ने अपनी एक पहचान तो कायम कर ही रखी है, और कई जगह अपना इंडिया इन्ही की वजह से पहचाना जाता है।

पेरिस शहर में क्या कुछ देख सके, वो अगली बार।

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पेरिस की सडकेंछुटपन में अपने दोस्तों के बीच की गपबाजी में एक बात बारबार सुनी थी…”पेरिस की सडकें कांच की होती हैं”। बहुत रोमांच हुआ करता था उस समय, कैसी होती होगी कांच की सडक, कैसे तो लोग चलते होंगे उन पर..चलते क्या होंगे…फिसलते होंगे…और गाडियां..क्या सरपट दौडती होंगी। एक और बात जो शायद सामान्य ज्ञान की किताब में भी था, कि “किस देश में मच्छर नही होते?”…फ्रांस। फ्रांस जाने का कार्यक्रम बनते समय जो बात सबसे पहले ध्यान में आई वो बचपन के ये किस्से थे। भई कांच की सडकें तो नही देखन मिलीं..हाँ जो थीं वो एकदम सपाट और साफ सुथरी थी। और मच्छर ..एक मच्छर तो मैने बरामद कर ही लिया वहां। फोटो लेने वाला था कि उड गया..लेकिन दिल को पता नही क्यों..अजीब से खुशी हुई। वैसे अगर बचपन में आ जाता तो कितना निराश होतामेरा बाल मन…जो मच्छर नही होना था, वो मिला, और कांच की सडक..नही मिली 🙂 |

(चित्र– Champs-Élysées – पेरिस की सबसे मंहगी सडक। इसके दोनो ओर मंहगे शोरूम, केफे, सिनेमाघर, फैशन हाउसेस आदि हैं। पृष्ठभूमि में Arc De Triomphe दिख रहा है। हिन्दी में विजय द्वार। इंडिया गेट का फ्रेंच संस्करण कह सकते हैं।)
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हवाईअड्डे से अपने गंतव्य तक कैसे पहुँचूंगा, इसकी बडी चिंता थी। अपने यहाँ मेहमानों को पिक अप उपलब्ध करवाते हैं ताकि कोई दिक्कत नही हो। लेकिन मुझे बताया गया था कि ऐसी कोई सुविधा वहां नही रहेगी। हवाई अड्डे से टेक्सी लेने का और निकल लेने का। पते का प्रिंट साथ लेकर चलने का और टेक्सी वाले को थमा देने का। मैने पूंछा..भाव-ताव। बिना किराये पर बहस कियें टेक्सी में कैसे बैठ जायेंगे :)। खैर, एयर इंडिया कि कृपा से विमान ८ घंटे लेट। सो जहाँ दिन के २ बजे मुझे मुझे पहुँच जाना था, पहुँचा रात १०:३० बजे। और चिंता हुई। अंजान शहर और भाषा भी नही आती। हवाई अड्डे से टेक्सी पकडी, टेक्सी वाला कुछ बोला तो बिना कुछ कहे प्रिंट उसे थमा दिया। रापचिक टेक्सी…जी. पी. एस. लगी हुई। मेरा गंतव्य शायद पेरिस के बाहर था..करीब एक घंटे की ड्राइव के बाद जिस जगह पहुँचना था उस उपनगर में तो पहुँच गये, लेकिन अपना वांछिता पता ना मिला। पहले तो गलती से एक घुडसाल में घुस गये, फिर बहुत देर गोल गोल चक्कर काटते रहे..ड्राइवर कुछ कहे फ्रेंच मिश्रित अंग्रेजी में और मैं कुछ कहूं अंग्रेजी में।अब अगर अपने देस में हों तो नुक्कड पर उतर कर किसी भी दुकान पे पूंछ लो, पर वहां ना दुकान, ना आदमी। बहुत देर बाद दिमाग की बिजली चमकी और मैने उसे अपने गंतव्य पर फोन करके पूंछने को कहा, जिसका कि नम्बर मेरे पास था। आखिरकार किसी तरह सही ठिकाने पहुंचे।
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केटरीना-मुम्बई में एक यूरो करीबन पचपन रुपये का होता है। ये अच्छे से याद था, पर लोगों भूल जाने की सलाह देकर भेजा था। चेतावनी मिली कि वहां कुछ भी ५५ से गुणा करके मत देखना नही तो जीना मुश्किल हो जायेगा। पर ऐसा कैसे हो सकता था। जब टेक्सी वाले को ७० यूरो चुकाये गये, तो मुझे हैदराबाद-मुम्बई-हैदाराबाद का हवाई किराया नजर आ रहा था…किसी तरह खुद को संभाला 😉 | पर बताया गया कि टेक्सी वाला लाया एकदम सही था।बिना किसी चीटिंग के।

(चित्र – केटरीना कैफ- मुम्बई हवाई अड्डे पर)

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अंग्रेजी और फ्रेंच की प्रतिद्वंदिता तो सब जानते हैं। आज जो स्थान दुनिया में अंग्रेजी का है, वो किसी समय फ्रेंच का हुआ करता था। लेकिन आज भी फ्रंसिसियों का अपनी भाषा के प्रति प्रेम लाजवाब है। बिना जरूरत कोई भी अंग्रेजी में बात नही करता। किसी शब्द को लेकर एक प्रतिभागी से बात हो रही थी जो अंग्रेजी और फ्रेंच में एक जैसा है। बातों बातों में मैने कहा “ओह दिस वर्ड कम्स फ़्रोम इंगलिश ओनली”..तुरंत प्रतिवाद हुआ..“नो नो..ईत गोज़ फ्राम फ्रेंच टू इंगलिश” (हालांकि दोनो लेटिन से आती हैं)।

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जहां ठहराया गया था वहां शाम ५ बजे बाद वायरलेस इंटरनेट बन्द हो जाता था, सो लेपटाप बेकार और सर्फिंग के लिये वहां रखे हुए कम्प्यूटर्स की शरण में जाना होता। वहां सारे एपल मेक (Apple Mach)लगे हुए। यहां तक तो ठीक, पर सब फ्रेंच में और की बोर्ड भी फ्रेंच वर्ज़न। अब एक तो आज तक एपल पे काम नही किया। वो तो फिर भी किसी तरह RnD करके चला लूं..पर फ्रेंच..? बहुत नाइंसाफी है। एक मेल लिखने में आधा घंट लग जाता। और हिन्दी तो पढ ही नही पाया..यूनिकोड में भी। भोमियो की उपियोगिता उसी दिन समझ में आई।
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मुम्बई हवाई अड्डानिकलते समय मुंबई एयरपोर्ट पर रातगुजारी काफी सही रही। पुरानी दिल्ली के रेल्वे स्टेशन जैसी भीड…बैठने को कोई जगह नही..ट्राली पर सामान रखो और पसर जाओ। पहले तो खबर आई कि आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम आने वाली है। अपन केमरा लेकर एकदम तैयार। T20 हार कर आई थी उस शाम को टीम और वो हार और शायद सीरिज के बीच हुआ “बंदर विवाद” खिलाडियों के चेहरों पर दिख रह था। सब के मुह सूजे हुए है थे। जैसे ही टीम बस आई..अच्छी खासी हलचल मच गई। हालांकि टी. वी. पर जिन चेहरों को देखते ही पहचान जाते हैं असलियत में उन्हे देखकर पहचानने में दिक्कत हुई। खैर जब तक ये निकले, बिना किसी चेतावनी के केटरीना आ गईं। भई अपनी तो शाम बन गई। फोटो तो लिये ही, ये भी पडताल की गई कि ये वाकई में खूबसूरत हैं या सिर्फ परदे पर दिखती हैं :)। (अगर आप कहीं जायें और लोग धडाधड आपकी तस्वीरें उतारना शुरू कर दें आपके चारों तरफ खडे हो जायें तो कितना असहज हो जाता है। ये शायद प्रसिद्ध होने की कीमत है। आप इत्मीनान से (अपनी) नाक में अंगुली भी नही डाल सकते…)

चित्र– मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रात को २ बजे। बैठने को पर्याप्त जगह तक नही।

खाने-पीने को लेकर इतना कुछ लिखना है, कि पूरी पोस्ट बन सकती है..सो वो अगली बार।

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