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Archive for the ‘बकर’ Category

अपनी रोज की पठन खुराक –

अखबार – टाइम्स आफ इंडिया – कागजी प्रारूप-  पूरा नही पढा जाता- सरसरी निगाह ही डाल पाते है।

गूगल रीडर पर चुनिन्दा हिन्दी-अंग्रेजी चिट्ठे जिनकी फीड सदस्यता मैने ले रखी है।

दैनिक भास्कर- इंटरनेट संस्करण- विशेष रूप से जय प्रकाश चौकसे का कालम परदे के पीछे

राजस्थान पत्रिका – इंटरनेट संस्करण – विशेष रूप से मेरे गृह जिले झालावाड की खबरें ।

कभी कभार देसी पंडित से चुनिन्दा अंग्रेजी चिट्ठे ।

रेडिफ पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरें – हाल ही में कलेवर बदल देने के बाद से पठनीयता कम हो गई है। विकल्प की तलाश है।

ब्लागवाणी पर एक सरसरी निगाह डालते हुए कुछ चिट्ठे ।

पुस्तकें पढना आजकल खत्म सा हो गया है। पुनः शुरु करने के प्रयास जारी हैं। कई पुस्तकें बाट जोह रही हैं।

आप रोज क्या पढते हैं?

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पिछली दो पोस्ट्स में मैने बचपन की कुछ बातें लिखी थीं..मसलन बचपन के टोटके और बचपन की तमन्नाएं। एक और चीज़ जिस पर मैं लिखना चाहता था वो थे..बचपन के डर और चिन्ताएं। पर लिखते लिखते रह गया। कारण यह, कि अगर सबको पता चला जाता कि मैं बचपन में रात में अकेले घर की छत पर या बगीचे में  जाने से डरता था या रात को पापाजी पान लाने भेजते थे तो मुहल्ले की अंधेरी गली, एक सांस में फर्राटे से दौडते हुए पार करता था तो कितनी इन्सल्ट होती ना मेरी। बहादुर बच्चे भी भला कहीं डरते हैं? नही ना। इसीलिये मैने किसी को नही बताया। खैर…डर नही, लेकिन बचपन की एक बडी चिन्ता आपके साथ बांटते हैं, वो ये ..कि बेटा बडे होकर क्या करेंगे?

बडे होकर क्या करेंगे/बनेंगे…ये अपने लिये सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय हुआ करता था। एक समय था, शायद ७-८ साल की उम्र में, जब में अपने आसपास लोगों को काम करते देखता और बस यह तुलना किया करता था कि मैं यह काम कर पाऊंगा या नही। जो काम करते हुए देखता था वहां अपने आप को फिट करता था..और पता चलता था कि इनमें से शायद कोई भी काम नही कर पाऊंगा। कुछेक बानगी…

  • सब्जी वाला नही बन सकता…मुझे तराजू से तौलना नही आता।
  • दर्जी नही बन सकता…नाप लेना नही आता, सिलना भी नही आता।
  • ड्राइवर नही बन सकता…गाडी तो क्या साइकिल भी नही चला पाता। और मुझे तो रास्ता भी याद नही रहता।
  • अपनी कपडे दुकान पर भी नही बैठ सकता…ना तो मुझे कपडा नापना और काटना आता..और ना ही इतने सारे कपडों के दाम याद रहते।
  • कारीगर नही बन सकता…प्लास्तर करना और पत्थर काटना नही आता।
  • नाई की दुकान नही खोल सकता..बाल काटना भी नही आता।

बोले तो, हर जगह असफलता। सोंचिये…कैरियर का कित्ता बडा सवाल मेरे आगे मुँह बांये खडा था..और कोई काउन्सलिंग नही।

खैर, ये सवाल तो अपने आप से थे, सो जवाब दें, या ना दें..सब चलता था। लेकिन स्कूल आकर यह समस्या और बढ गई। मास्टर जी कक्षा में पूंछे, तो भी ये बडा भारी प्रश्न हुआ करता था। मास्टर जी कक्षा में आयेंगे…और सब बच्चे एक एक करके बतायेंगे कि वो बडे होकर क्या बनेंगे। टीचर जी को तो खुश रखना भी जरूरी था (ये काम हमें बचपन से आता था), तो अलग अलग समय पर, अलग अलग अध्यापक जी को ध्यान में रखते हुए हम तरह तरह के जवाब देते थे

  • सर, सबसे पहले तो मैं इस देश का एक अच्छा नागरिक बनना चाहूंगा। (तालियां-तालियां)
  • मैं तो अध्यापक बनूंगा..आप की तरह। (एक एक को मुर्गा बना दूंगा)
  • राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री बनूंगा- जी हाँ…कहने में अपना क्या जाता है।
  • डाक्टर-इंजीनियर-वैज्ञानिक, गणित अथवा विज्ञान की क्लासानुसार– ये जवाब थोडा बडे होने के बाद पकडे और फिर इन्हे ही पकडे रहे।

ये तो हुई बचपन की बात। लेकिन जरा गंभीर होकर सोंचे, तो क्या हम बडे होने के बावजूद भी कभी अपनी मर्जी यह तय कर पाते हैं कि हमें क्या बनना है अथवा क्या करना है? क्या यह सोंच लेने के बाद , कि मुझे यह करना है, हम वो सब कर पाते हैं। सोंचियेगा, क्या हम आज वही कर रहे हैं जो हमने हमेशा से करने का सोंचा था? (अगर सोंचा था तो)। या फिर हालात,परिस्थितियों से लडते भिडते आज जहां हैं वहां पहुंच गये हैं किसी तरह और बस जमें हुए हैं वहीं पर?

और हाँ, जो हम नही कर पाये, वो बच्चों सें अपेक्षा कर ही सकते हैं। अच्छा चिन्टू बेटा…अंकल को बताओ तो बडे होकर क्या बनोगे!!!

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तब और अब

तब- सखी, जब बागों में भंवरे गुंजार करने लगें, खेतों में सरसों के पीले फूलों की बहार भरने लगे,समझो बसंत आ गया।
अब- जब बागों में शिवसैनिक-बजरंगी हुंकार भरने लगें, जोडे भी ठुक-पिट कर ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगें, समझो वेलेन्टाइन बसंत आ गया

तब- बाजार में गुड मूंगफली की गजक दिखने लगे, चौपालों पर आग-अलाव जलने लगें तो समझो सर्दियां आ गई।
अब- टी वी पर बिवाई न फटने/रूखी त्वचा से बचाने के विज्ञापन आने लगें और सारे चैनल कोहरे के कारण फ्लाइट/रेल देर होने का रोना रोने लगें तो समझो सर्दी आ गई।

तब- “रेनी डे” के कारण स्कूल से छुट्टी मिल जाये, छपाक-छपाक नाली में नाव चलायें, घर के बगीचे में नये पेड लगायें…आहा बरसात आ गई।
अब- अपार्टमेन्ट का पहला तल्ला पानी में डूब जाये, सडकों पर घुटने घुटने पानी भरा हो और गड्ढों की भरमार हो समझो बारिश आ गई।

तब- बरसात लगभग बन्द हो जाये, त्यौहारों का मौसम शुरू होने को हो, नौ दिन जप तप ध्यान व्रत में बीतें ओहो  नवरात्रा चल रहे हैं…दशहरा आने वाला है।
अब- गल्ली मुहल्ले में डांडिया चले, बच्चे देर रात को घर लौटें, शहरों में गर्भनिरोधक की बिक्री बढ जाये- नवरात्रा आ गये हैं।

तब-नाना-मामा के यहां जाने को मिले, ढेर सारे आम खाने को मिलें, कामिक्स पढने को मिले, दुपहरी में सोने को मिले…आहा चुन्नू गर्मियां आ गई।
अब-सच तो ये है कि गर्मी की छुट्टियों में बच्चे क्या करते हैं..मुझे भी नही पता। लेकिन ये मालूम है कि नाना-मामा के यहां जाना बहुत कम हो गया है। शायद वीडियो गेम्स खेलते हों या अगले सत्र की कोचिंग करते हों???

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कुछ वक्तव्य (बोले तो…Statement) होते हैं..जो चुनिन्दा जगहों पर, चुनिन्दा परिस्थितियों में,छँटे हुए चुनिन्दा लोगों से अपेक्षित होते हैं। अक्सर ये वक्तव्य टेलिविजन कैमरे के सामने दिये जाने के लिये होते हैं…नेता, अभिनेता, क्रिकेटर ,अफसर…हर कोई इनका इस्तेमाल अपने हिसाब से करता है। इनमे नया कुछ नही होता, इनका कोई कैसा भी मतलब निकाल सकता है। अक्सर ये वक्तव्य सुनने वाले की जानकारी में कोई इजाफा नही करते और इनमें वही बात दुहराई जाती है जो सुनने वाले और बोलने वाले , दोनो को पता होती है। चूंकि कुछ दुनिया में रहना है और कुछ न कुछ कहना तो है ही…सो कह देते हैं। नीचे कुछ नमूने दे रहा हूं…नोट कर लीजिये..वैसे तो, राम करे आपको इनकी जरूरत न पडे…पर पड जाये तो ये न कहियेगा कि पहले बताया नही था। चाहें तो धन्यवाद भी टिका सकते हैं 🙂

क्रिकेट
-pitch was good and ball was coming on to bat
-Boys played well
-It was a team effort

नेतागिरी
-यह नीति जन विरोधी हैं हम इसका विरोध करते हैं (जब खुद सत्ता में थे..तब तुम्ही ने लागू की थी भाई)
-मुझे फँसाया जा रहा है
-हम चाहते हैं कि मामले की जाँच सी.बी.आई. को सौंप दी जाये (ताकि हमारे स्वर्ग सिधारने तक भी जाँच पूरी ना होने पाये)
-मैं अदालत के फैसले का सम्मान करता हूँ

मीडिया
-Exclusive: हम आपको बता दें यह खबर सिर्फ हमारे चैनल पर दिखाई जा रही है (दरअसल, सिर्फ हमारे रिपोर्टर पेड पर चढकर गिलहरी के अंडे गिनने के लिये विशेष रूप से प्रशिक्षित हैं)

-क्या आप हमें सुन सकते हैं…लगता है सम्पर्क टूट गया है (सम्पर्क नही टूटा..पेड की डाल टूट गई)

-मीडिया समाज का आईना है। मीडिया सिर्फ वो दिखाता है जो जनता देखना चाहती है (और जनता बेचारी चैनल पर चैनल बदल कर सिर्फ वो देखती रहती है नो मीडिया दिखाता जा रहा है।)

फिल्म जगत
-हम बस अच्छे दोस्त हैं
-अभी तो हमें अपने कैरियर पर ध्यान देना है (..बे पिछले ७ साल से क्या कर रहे हो?)
-यह दृश्य कहानी की मांग थी
-यह फिल्म एकदम हटके है

पुलिस

-हमें कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र मिले हैं, तफ्तीश जारी है, अभी कुछ भी बताने से मामले की जाँच पर असर पड सकता है (दरअसल अभी खुद हमें ही कुछ नही मालूम)
-दुर्घटना की जाँच के लिये कमेटी बनाई गई है (यह किसी भी मामले को लम्बा लटकाने का रामबाण तरीका है)
-शामिल कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है (दो महीने बाद वापस बहाल कर देंगे ये खबर कहीं नही छपती)

शेयर बाजार
-बाजार गिर सकता है…उठ भी सकता है
-…But the market fundamentals are strong

अगर कभी कुछ गलत कह कर फँस जायें…
-“मेरे वक्तव्य को तोड मरोड कर पेश किया गया…मैने ऐसा तो नही कहा था” 🙂

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Driving Force

न्यूटन बाबा कह गये हैं कि कोई वस्तु, जिस अवस्था में है..उसी में रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाहरी दबाव ना डाला जाय। अगर रुकी है, तो रुकी रहेगी और अगर चलायमान है…तो चलती ही जायेगी, उसी गति से..बिना किसी घट बढ के। बाबा वैज्ञानिक तो थे, पर मनोवैज्ञानिक भी थे, ये पता नही। देखिये ना, मानव मन पर ये बात कितनी सटीक बैठती है। हर किसी को, कहीं न कहीं से दबाव चाहिये ही। आफिस में अधिकारी का,स्कूल में शिक्षक का, भक्त पर भगवान का, नेता जी पर आलाकमान का (जनता का नही), अभिनेता पर भाई का, शेयर मार्केट पर एफ.आई.आई. का,भारतीय क्रिकेट टीम पर बी.सी.सी.आई. का …सबको कहीं न कहीं से दबाव चाहिये। नही तो समझिये काम हुआ ठप। थोडी आदत भी ऐसी हो गई है, कि जब तक प्रेशर ना बने, काम ढंग से नही होता। और जैसे ही डेडलाइन का प्रेशर बना, चीजें खुद-ब-खुद हो जाती हैं।

लेकिन हाँ, कई गुणी लोग होते हैं, जिनमे ये प्रेशर अंदर से आता है। अंदर बोले तो..अंतरात्मा। ये जो अंदर से प्रेशर बनता है, ये कई बार बडी खुराफात कर जाता है….लेकिन सच मानिये, तो दुनिया को बडी बडी चीजें इसी प्रेशर की बदौलत मिली हैं। मेरे खयाल में, दुनिया में जो लोग टाप पर पहुँचते हैं…उनके अन्दर से प्रेशर बनता है, बोले तो ये Self Driven होते हैं…ये लोग होते गिने चुने हैं…लेकिन शायद इनके अंदर का प्रेशर ही सारी दुनिया के लिये Driving Force का काम करता है।

चलते चलते गुणीजनों के लिये एक सवाल, आदम Self Driven था, या उस पर सेब के द्वारा दबाव डाला गया? लीजिये, न्यूटन बाबा से बात शुरू हुई थी, और सेब तक जा पहुँची…उनका Driving Force तो सेब ही था 🙂

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आपने कभी किसी को हाथ दिखाया है?

नही भाईसाहब, माफ कीजिये, थप्पड-घूंसे वाला हाथ नही, गलती हो गई। ( वो आपका बेलन/चिमटे/झाडू वाला भी नही आंटी जी )। हाथ बोले तो हथेली…जिसमें होती है रेखाएं जिन्हे कि बाज लोग पढ कर आपका आगापीछा बता सकते हैं। वैसे कई लोग इसे मानते हैं कई नही मानते, व्यक्तिगत मामला है, आखिर डेमोक्रेसी है। ‘डायमंड पाकेट बुक्स’ वाले जरूर मानते होंगे..क्योंकि उन्होने खूब किताबें बेची हैं हस्तरेखा पर।

तो इन किताबों के फलस्वरूप मेरे कई मित्र (महिला मित्र नही…सिर्फ मित्र 😦 ) ऐसे रहे जो थोडा बहुत हाथ देखना जानते थे…और हमने खूब हाथ दिखाये इनको। जहाँ अटकते थे…मैं कहता था..कोई बात नही..बाद में पढ कर बता देना..फिर थोडे दिन बाद वही किस्सा। ये अलग बात है कि आज तक कभी किसी को दक्षिणा नही दी हाथ दिखा कर। ऐसा भी नही है कि अपनी हथेली में हर बार कोई नई थीसिस या खोज निकल कर आती थी…हर बार घुमाफिरा कर एक जैसी बातें…चाहे आप कितने भी हथियारों (हाथ देखने वाला यार) को दिखा लो।

तो साहबान…पेश-ए-खिदमत है ऐसे १० ब्रह्मवाक्य जिन्हे आप भी किसी के भी ‘हाथ पर फेंक सकते हैं’…बन्दा आपकी हाँ में हाँ मिलाता चला जायेगा (अगर बन्दी हुई तो कहना ही क्या…किस्मत आपकी) 🙂

१) . ह्म्म…तेरे पास अक्सर पैसे नही होते है..पर तुझे कभी पैसों की कमी भी महसूस नही होती| (अबे तेरे जैसे दोस्त होंगे तो पैसे कहाँ बचेंगे…और कमी तो पिताजी महसूस नही होने देते)

२). तू बहुत आगे जायेगा| (तुझ जैसे दोस्त ऐसे ही धक्के मारते रहेंगे तो आगे ही जाऊँगा)

३). तेरी फलाँ रेखा…फलाँ जगह पर झुकी हुई है..हो ना हो..तू दिल से सोंचता है। (इसीलिये तू मुझे बेवकूफ बनाता रहता है शायद)

४). तेरी उँगलियाँ बहुत लम्बी हैं…तू कला के क्षेत्र में अच्छा कर सकता है..चित्रकारी या लेखन में ट्राई कर। (मजे लेता है साले..इतनी बार ब्लाग का लिंक भेज चुका हूँ…आज तक कभी पढा है तूने?)

५) लडकियों के मामले में तेरी किस्मत इतनी अच्छी नही है।(नई बात बता..ये तो सबको पता है…और तू कौन सा तीसमार खाँ है इसमें)

६) तेरी हस्त रेखाएं बहुत आडी तिरछी हैं..एकदम उलझी हुई।(मुझे भी दिख रहा है)..इसीलिये तू हमेशा कन्फ्यूज रहता है। (अबे इस उमर में कौन नही रहता)

७). ये देख..ये लाइन यहाँ कट रही है ना…या तो तेरा एक भयानक एक्सीडेंट हुआ है …या फिर होगा। (अच्छा मुन्ना…या तो तू मेरा हाथ देख रहा है…या नही देख रहा)

८) तू कम से कम ७० साल तो जियेगा। (तुझे गलत साबित करने के लिये मैं जल्दी तो मरने से रहा और जल्दी मर गया तो कौन सा तेरा गला पकडने आ रहा हूं मरने के बाद)

९) दो बच्चे। (उसके ऊपर वैसे भी मनाही है आजकल…डेमोक्रेसी गई तेल लेने)

१०) एक शादी होगी।  (वाह वाह क्या बात बताई है..तेरे मुंह में घी शक्कर…

अब चुप हो जा…मोहे सरम आ रही है 😀 )

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पोस्ट का आइडिया...छोटे भाई से

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“हाँ…तो बोलो बच्चों अजूबा क्या है?”- मास्टर जी ने छडी घुमाते हुए गुटखे की जुगाली की और कक्षा में बैठे छात्रों से पूँछा ।
एक अतिउत्साही बालक बोला- गुरुजी, अजूबा अमिताभ बच्चन की एक पिच्चर है, जिसमें ऋषि कपूर भी है…और डिम्पल कपाडिया और सोनम भी। लडाई-मारधाड और कामेडी से भरपूर ये फिल्म कल रात को आठ बजे स्टार गोल्ड पर आने वाली है।
“हट बुडबक” कह कर मास्टर जी ने एक दूसरे छात्र की तरफ निगाह दौडाई जिसके चेहरा पहले छात्र का जवाब गलत सिद्ध किये जाने से निखर उठा था ।
“मास्टर जी, अजूबा एक जगत प्रसिद्ध तेल है जो हर रविवार को सपना टाकिज के पीछे वाली गली में बैठने वाले खानदानी हकीम हवाबाज-कारस्तान लोगों को बांटते हैं और जो लाख मर्जों की एक दवा है।”
तेल का नाम सुनते ही मास्टर जी के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव आये जिन्हे उन्होने बडी मेहनत से जब्त किया और अपने छात्रों की नादानी पर सर ठोकते हुए गुटखा थूकने कक्षा से बाहर चल दिये।

ये तो थी भूमिका, पर मैं सोंच रहा था, कि यक्ष ने अगर युधिष्ठिर से यही सवाल किया होता….या बेताल ने विक्रम को सर के टुकडे टुकडे वाली धमकी देकर ये पूँछा होता तो उनके क्या जवाब होते।

ये रहे फटाफट सोंचे गये सात नमूने अजूबे….

१) एक मूर्खता भरे सवाल के लिये…या एक नमूने को दूसरे नमूने से बेहतर साबित करने के लिये लोग ६ रुपये का एस. एम. एस. करने से भी नही हिचकते।
२) एक तरफ टी. वी./मोबाइल/इन्टरनेट के प्रयोक्ता बढ रहे हैं..तकनीक विकसित हो रही है….पर शायद उसी अनुपात में बढ रहे हैं टी. वी. चैनल्स पर आने वाले भूत/चुडैल/बाबानुमा कार्यक्रम ।
३) मुंबई को शंघाई बनाने का दावा करने वाले मुंबई की सडकों से बरसात का पानी तक नही निकलवा पाते ।
४) मनमोहन सिंह २०-२२ घंटे काम करने वाले CEOs को कम वेतन लेने की सलाह देते हैं…पर अपने सहकर्मियों (नेताओं) को मिलने वाले वेतन, भत्ते और खर्चे पर उनका कोई ध्यान नही जाता जिसका कि कोई हिसाब भी नही है, जिस पर कोई टेक्स भी नही लगता । क्या ये भी उन्हें मेडम बतायेंगी?
५) हिमेश रेशमिया की हर कोई बुराई करता है, पर उसके अधिकतर गाने हिट होते हैं और तो और उसकी पहली फिल्म सुपरहिट हो जाती हैं और उसकी सीक्वेल बनाने की योजना बन जाती है
६) सैंकडों गांधीवादी बरसों से जिन बापू को लोगों के दिमाग में घुसाने की कोशिश करते रहे, उन्हे अपने ऊपर बम कांड का मुकदमा झेल रहा एक शख्स एक फिल्म के माध्यम से अच्छी पब्लिसिटी दिला देता है मार्केटिंग और पैकेजिंग के दम पर । गाँधीवाद को गाँधीगिरी में बदल कर। पता नही स्वर्ग में बैठे गांधी मुस्कुराये होंगे या रोये होंगे…।
७) बुश उवाच – “आतंकवाद के खिलाफ लडाई में पाकिस्तान का योगदान सराहनीय है ”

वैसे नमू्नों अजूबों पर किसी का जोर थोडे ही है….एक ढूंढो हजार मिलते हैं…आप भी दिमाग लगाइये और बताइये कुछ।

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