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Archive for the ‘चिट्ठा’ Category

अपनी रोज की पठन खुराक –

अखबार – टाइम्स आफ इंडिया – कागजी प्रारूप-  पूरा नही पढा जाता- सरसरी निगाह ही डाल पाते है।

गूगल रीडर पर चुनिन्दा हिन्दी-अंग्रेजी चिट्ठे जिनकी फीड सदस्यता मैने ले रखी है।

दैनिक भास्कर- इंटरनेट संस्करण- विशेष रूप से जय प्रकाश चौकसे का कालम परदे के पीछे

राजस्थान पत्रिका – इंटरनेट संस्करण – विशेष रूप से मेरे गृह जिले झालावाड की खबरें ।

कभी कभार देसी पंडित से चुनिन्दा अंग्रेजी चिट्ठे ।

रेडिफ पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरें – हाल ही में कलेवर बदल देने के बाद से पठनीयता कम हो गई है। विकल्प की तलाश है।

ब्लागवाणी पर एक सरसरी निगाह डालते हुए कुछ चिट्ठे ।

पुस्तकें पढना आजकल खत्म सा हो गया है। पुनः शुरु करने के प्रयास जारी हैं। कई पुस्तकें बाट जोह रही हैं।

आप रोज क्या पढते हैं?

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चार साल

सुबह से दिमाग में कुछ खटक रहा था कि आज कुछ विशेष दिन है, पर समझ नही आ रहा था क्या?

अभी ऐसे ही वर्डप्रेस खोल लिया तो ध्यान आया कि आज अपने इस चिट्ठे की चौथी सालगिरह है। लिखने के हिसाब से यह साल काफी सुस्त बीता है। हालांकि कई अन्य मोर्चों पर काफी क्रांतिकारी भी रहा। पिछले एक साल में मात्र ७ पोस्ट लिख पाया हूं। हालांकि लिखने लायक काफी कुछ हुआ इस दरमियान लेकिन प्राथमिकताएं कुछ और रहीं।  पुस्तकें पढना भी बहुत कम हुआ इस साल, पर ब्लाग पढना बदस्तूर जारी रहा है।

पिछले कुछ दिनों से सोंच रहा था कि ब्लाग को पुनर्जीवित करना है। इस चौथी सालगिरह ने एक अच्छा बहाना दे दिया। अब देखते हैं यह कब तक हो पाता है।

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलंबरदार NDTV और उनकी एक प्रिय चेहरे की एक हरकत की खबर अभी हाल ही में अंग्रेजी ब्लागमंडल में घूमते हुए मिली जहाँ एक ब्लागर को कानूनी कार्यवाही के सम्मन के जरिये अपनी पोस्ट हटाने और सार्वजनिक रूप से माफीनामा लिखने के लिये मजबूर किया गया।

ब्लागर चैतन्य कुंटे ने अपने ब्लाग पर मुम्बई धमाकों के दौरान हुई मीडिया कवरेज को आडे हाथों लेते हुए इस चैनल और इसके रिपोर्टर पर एक पोस्ट लिखा थी। (पोस्ट अब हटा दी गई है…पर जय हो गूगल Cache की, इंटरनेट पर तो सब कुछ मौजूद रहता ही है, इस पेज पर सबसे नीचे वाला आलेख देखें)। उसके बाद NDTV ने उन पर कानूनी कार्यवाही का सम्मन भेजा (इस पेज पर दूसरा संदेश देखें)। चैतन्य ने अपनी वो पोस्ट हटा ली और यह माफीनामा अपने ब्लाग पर डाला।

और जानकारी एवं अन्य अंग्रेजी चिट्ठाकारों के विचार यहाँ पढें।

यह है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों की हकीकत। इन्हे अपनी आलोचना बिल्कुल बर्दाश्त नही। सवाल यह नही है कि ब्लागर ने जो लिखा था वो कितना सही या गलत था…लेकिन अगर इसी प्रकार का नोटिस कोई नेता किसी टी वी चैनल को थमा दे तो कितना हल्ला मचाया जायेगा? याने आप  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ सबको पढाओ लेकिने खुद अपने बारे में एक शब्द सुनने को तैयार नही…।

क्या किसी ब्लागर से उसकी पोस्ट डिलीट करवाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटना नही माना जायेगा? और क्या दुनिया भर की आलोचना करने वाले समाचार चैनल और इनके कर्णधार आलोचनाओं से परे हैं?

मुझे ताज्जुब है कि हिन्दी ब्लागमंडल में इस घटना पर अब तक कोई चर्चा नही हुई है (या शायद मेरी नजर नही पडी)। गुजारिश करूंगा की अगर आपको ये गलत लगता है तो इसके विरोध में अपने ब्लाग पर एक पोस्ट जरूर लिखें।

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मौसम– अप्रेल अंत और मई शुरू को छोड दें…तो पूरा साल मौसम सन्ट रहता है एकदम…खूब सर्राटेदार हवा चलती है। ना ज्यादा गर्मी..न ज्यादा ठंड…और अच्छी बरसात।

खाना– खाने की परेशानी पर अपने शुरुआती दिनों में लिख चुका हूँ, बेचलर्स को ज्यादा समस्या होती है। लेकिन फिर भी, ’सिर्फ शाकाहारी’ होटल खूब मिल जायेंगे…

किताबें – क्या कहने। अबिड्स पर हर रविवार को पुरानी किताबें बिकती हैं…पटरी पर..खूब सारी। किताबों की पारखी नजर होनी चाहिये..और ढूंढने के लिये समय और धैर्य। १५ दिन पहले जार्ज आर्वेल (George Orwell) की १९८४ (1984) मात्र रु. २५/- में खरीद कर लाया हूँ। कभी कभी हिन्दी किताबें भी मिल जाती हैं। इसके अलावा एक-दो अड्डे और हैं अच्छी किताबों के।

Cost of Living: दिल्ली और बैंगलोर जैसे महानगरों से कहीं कम। हालंकि शहर जिस ते्जी से बढ रहा है, उसे देखते हुए आने वाले समय में ऐसा रहेगा नही ज्यादा समय तक। कुछ इलाकों में एक-एक एकड जमीन करोडों में बिक रही है…लेकिन फिलहाल ४-६ हजार में २ BHK का ठीक ठाक फ्लेट मिल जाता है (पगडी मात्र २ महीने की….बैंगलोर वाले १० महीने की मांगते हैं)

आटो – चेन्नई और बैंगलोर (बंगलुरू) के आटो चालकों की करतूतों के इतने किस्से पढ रखे हैं कई अंग्रेजी चिट्ठों पर। लेकिन हैदराबाद के ९०% आटो चालक आपके साथ बेइमानी नही करेंगे, एकदम बेफिक्र रहिये। २८ रुपये होने पर २८/- ही लिये जाते हैं…२ रुपये छुट्टे वापस कर दिये जाते हैं…हर आटो वाला मीटर से चलता है…बिरला ही lumpsum राशि की मांग करता है

फिल्में – हैदराबाद से सस्ती फिल्में (नई) आप इस स्तर के शहर में पूरे हिन्दुस्तान में शायद ही कही देख पायें। मल्टीप्लेक्स कभी नही जाते । लेकिन जितने भी सिनेमाघर हैं…दरें १०/- से ५०/- के बीच ही मिलेंगी। हिन्दी फिल्में खूब देखी जाती हैं। कई फिल्में First Day देखीं हैं यहाँ। और हाँ, मेरे घर की २-३ किलोमीटर की परिधी में १०-१५ सिनेमाघर होंगे। 🙂

भाषा– बिल्कुल समस्या नही। सब लोग हिन्दी बोल समझ लेते हैं (हैदराबाद/सिकन्दराबाद में)। कई बार ऐसा हुआ है कि आटो वाले को सिर्फ हिन्दी ही आती थी, तेलुगु नही।..शायद यही वजह रही कि अब तक तेलुगू नही सीख पाया…जो खटकता है अक्सर।

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ये मेरी सौवीं पोस्ट है। चिट्ठाकारी करते हुए पिछले महीने २ साल पूरे किये। पच्चीस महीने में १०० का आँकडा। औसतन, महीने में चार पोस्ट। कोई तीर मारने वाला काम तो नही (बडे बुजुर्ग दो-तीन महीनों में लिख मारते हैं) पर मुझे जैसे आलसी के लिये यही बहुत है…कि किसी काम को लगातार २ साल करता रहा। ये विश्वास भी है कि विकेट पे डटे हुए हैं..चाहे धीरें खेलें..पर नाबाद हैं(बरबाद तो हैं ही…)।

कई लोगों की तरह..पहला हिन्दी ब्लाग रवि जी का देखा था, सुखद आश्चर्य हुआ था और अंग्रेजी में टिप्पणी छोडी थी। ३-४ महीने देखता रहा..उन लोगों के चिट्ठे..जिन्हे आजकल अनूप जी नोस्टाल्जियाते रहते हैं …थोडे दिन बाद खूद भी कूद पडा..हालाँकि खुद को भी पता नही था कि यहाँ क्या लिखूंगा… पहले ब्लागस्पाट पर, और पिछले साल वहाँ दिक्कत आने पर यहाँ वर्डप्रेस पर। बहुत बिट्स/बाइट्स बह गये दरिया में इस दरमियान।

थोडा लिखा…खूब पढा..क्या खूब पढा और खूब सीखा। नये लोगों से परिचय हुआ, सोंच का दायरा बढा…नये मित्र भी बने। सफर चल रहा है..और सफर का मजा भी आ रहा है। इस सफर में साथ देने के लिये आप सबका शुक्रिया….

अभी खयाल-ए-जिगर का गुबार राह में है,
बहार आ कर रहेगी, बहार राह में है,
बढे चलो के वो मंजिल अभी आई नही,
ये वो मुकाम है जिसका शुमार राह में है।

(ये पंक्तियां पापा ने ३-४ साल पहले CAT की परीक्षा के समय भेजी थीं, हास्टल मे….शायर का नाम मालूम नही है)

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