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Archive for the ‘क्रिकेट’ Category

समाचार एवं सूचना साइट रेडिफ ने हाल ही में अपने कलेवर की झाड-पोंछ की है। हालांकि मेक-अप, पाउडर और लीपापोती ही ज्यादा है…कंटेंट के नाम पर अभी भी वही उलूल-लजुलूल स्लाइड शो होते हैं। पर मुखपृष्ठ पर अब ज्यादा भीड-भाड नही दिखाई देती, बस चुनिंदा आइकन और लिंक्स दिखाई देते हैं। हालांकि साइट में थोडा अन्दर जाने पर लगने लगता है कि ज्यादा काट-छांट के चक्कर में Nevigation थोडा मुश्किल हो गया है। मसलन आप अगर Movies वाले हिस्से में विचर रहे हैं तो वहां से News वाले हिस्से में पहुंचने के लिये आपको वापस मुख पृष्ठ पर आना पडेगा।

खैर , ये तो Designing का मामला है, पर यह देखिये कि अपने Sports वाले हिस्से को रेडिफ मात्र Cricket कहना पसन्द करता है। याने क्रिकेट सब सारों का सार हो गया है। अगर इस भाग में सिर्फ क्रिकेट से जुडी खबरें होती तो ठीक था, पर खबरें आपको यहां सभी खेलों से जुडी मिलेंगी, Url भी http://www.rediff.com/sports है, लेकिन इसे जाना क्रिकेट के नाम से जाना जाता है। सही है…हिन्दुस्तान में वैसे भी क्रिकेट के आगे बाकी सारे खेल पानी भरते हैं।

रेडिफ

और हाँ..कभी मन नही लग रहा हो और दिमाग का दही करने का मूड हो तो रेडिफ के लेखों के Discussion Board देखियेगा।  टाइमपास और सर खुजाने  के लिये अच्छी जगह है। 🙂

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जीत के मायने

बडे बूढे कह गये हैं..”सुख के सब साथी दुःख में ना कोय”। गलत नही कहा। ज्यादा दिन नही बीते हैं, जब महेन्द्र सिंह धोनी के निर्माणाधीन घर पर हमला हुआ था रांची में…।या विज्ञापन बाजार में खिलाडियों के भाव मिथुन दा के भाव से भी कम हो गये थे या पूरे T20 में पेप्सी ने किसी क्रिकेटर को लेकर कोई विज्ञापन नही बनाया/दिखाया। पर १५ दिन बहुत होते हैं ये सब बदलने के लिये। और हिन्दुस्तान की जनता के लिये तो खासकर…क्योंकि अपने यहाँ याददाश्त बहुत कमजोर होती है पब्लिक की। तो साहब और अब फिर से “अनहोनी हो गई होनी”..और बिना किन्ही अपेक्षाओं के गई अन्डरडाग्स की टीम ने कप उठा लिया….एक नाखून-कतर (बोले तो Nail Biting) फाइनल में। गिले शिकवे सब माफ।

चलिये ये देखा जाये के ये जीत क्या मायने रखती है विभिन्न Stakeholders के लिये।

BCCI– फिर तिजोरी भरने का मौका। वर्ल्ड कप में हार और ICL प्रकरण को देखकर ऐसा लग रहा था कि दिन बुरे चल रहे हैं..पर उस सब के ऊपर एक धुली हुई…साफ-सफेद चादर बिछा दी जाये…उस पर २ मिलियन डालर बिछाये जायें और फिर से लम्बी तान के सो जाया जाये…अगले झटके तक के लिये।

ICC – वेस्टइंडीज वर्ल्डकप बहुत घाटे का सौदा रहा था..और बहुत नीरस भी। T20 इनके लिये भी अमिताभ का KBC सिद्ध हुआ है। भारत पाकिस्तान के फाइनल में पहुंचने से जहाँ उपमहाद्वीप में फिर से दरवाजे खुले हैं…वहीं तीन घंटेय फार्मेट और चीयर डांसर्स के दम पर पश्चिम में फुटबाल को टक्कर देने की कोशिश रहेगी। T20 लीग भी शायद इसीलिये बनाई गयी है।

बाजार – भाई व्यापारी कभी घाटा नही खाता। खाता है, तो अगली बार दुगने वसूलता है। जीतने लगे हैं..फिर विज्ञापनों की दरें बढ जायेंगी…नये नये उत्पाद बेचे जायेंगे…Tata Sky की जो लाइफ झिंगालाला हुई थी मार्च अप्रेल में…उससे उबरने का मौका मिलेगा।

खिलाडी – Fast-Furious-Cool…ये तालमेल चाहिये यहाँ। जो ये कर गया…वो ले गया। जैसे गेम छोटा है…वैसे ही मुझे लगता है खिलाडियों की शेल्फ लाइफ भी छोटी रहेगी। शेल्फ लाइफ छॊटी होने का मतलब किसी एक खिलाडी का १५ साल तक दबदबा ना रहे…तो नये नये लोगों को मौके मिलेंगे..जो कि अच्छा ही है।

ICL – फिलहाल कुछ कहना मुश्किल, पर मुझे लगता है कि दीर्घावधी में ये ICL के लिये भी अच्छा ही होगा। T20 का भविष्य मुझे Club Football जैसा लग रहा है। समय कम, सो आयोजन में खर्च कम..और रोमांच अधिक। अगर डालमिया निकट भविष्य में ICL में आते हैं, तो वो इस संभावना का खूब सही दोहन कर पायेंगे।

भारतीय क्रिकेट के लिये – सबसे बडा फायदा…सचिन-द्रविड-गांगुली अपरिहार्य नही हैं।अच्छे खिलाडियों की अगली खेप तैयार है। वैसे, जैसे देश भगवान भरोसे चल रहा है, वैसे ही प्रतिभाएं भी भगवान भरोसे आ जाती हैं ऊपर तक…इसलिये ये तो ना ही माना जाये कि BCCI या क्रिकेट के कर्त्ताधर्ताओं की किसी सोंची समझी योजना/रणनीति के तहत ऐसा हुआ। १९९६ की इंगलैण्ड सीरीज में द्रविड-गांगुली मिल गये थे, २००२ में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध जहीर-युवराज मिले थे..ऐसे ही यहाँ रोहित शर्मा मिल गये। ये भी कोई जरूरी नही कि टीम के साथ कोई विशेषज्ञ कोच हो। बस आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं ना रखें, बोझ ना बनायें..और खेल को पूरी तरह से बाजार के हाथ में ना जाने दें।

क्रिकेट के लिये – परिवर्तन संसार का नियम है, और मेरा मानना है कि जिसने समय के साथ खुद को बदला, जो बार बार अपने को खोज कर अपने अंदर नयापन लाता रहा… वो ही लम्बे समय ता टिक सकता है।(बोले तो Innovation is the key)। वरना तो “यूनान मिस्र रोमां सब मिट गये जहाँ से”। क्रिकेट ने दूसरी बार ऐसा किया है- पहले टेस्ट क्रिकेट से एकदिवसीय, और अब एक दिवसीय से T20। जो पुराना है, उसका अपना स्थान है..पर जो नया है..वो अधिक रोमांचित करता है। दोनों का संतुलन बना रहे बस। बाकी अपना मानना है कि तीनों की तुलना करना उतना ही गैरजरूरी है जितना पाकिस्तानी कप्तान का मैच के बाद “मुस्लिम्स इन पाकिस्तान/आल ओवर वर्ल्ड” को थैंक यू/सारी, बजाय “फेन्स आल ओवर वर्ल्ड” के।

और आखिर में ..हमारे लिये-
भई अपन तो पब्लिक हैं। महीने भर बाद हारने लगे तो फिर गरियायेंगे,पत्थर उठा कर मारेंगे..तुम्हारे नाम कि फेयरनेस क्रीम और रेजर (और भी काफी कुछ) इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। जीतोगे..तो फिर पुचकार लेंगे..फिर गला फाड कर चिल्लायेंगे, फिर सिर चढायेंगे। क्या करें भाई..याददाश्त बडी कमजोर है। दिमाग की RAM बहुत कम है…जिन्दगी में और भी बहुत गम हैं 🙂

चलते चलते:

धोनी और उनकी टीम को एक शानदार जीत के लिये धन्यवाद..बधाई..साधुवाद।

मैच के बाद हर्ष भोगले, सुनील गावस्कर से पूंछ रहे थे..क्या T20 का भारत में समय आ गया है। भैया, दिल पर हाथ रख कर कहियेगा कसम से ..आप में से किस किस ने अपनी गली में, छत पर, बरामदे में, पार्किंग लाट में, बिल्डिंग के कारीडार में..यही फाइव-टेन-ट्वेन्टी-ट्वेन्टी नही खेला है?

ट्वेन्टी – ट्वेन्टी का हिन्दी नाम क्या होगा, सोंच रहा हूँ..बीस-बीस/चालीस/पन्द्रह-बीस-पच्चीस कहना अच्छा नही लगता..क्या (चार सौ) बीस क्रिकेट कहें?..सोंचियेगा 🙂 ।

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भारतीय क्रिकेट को संभालने के लिये, खिलाडियों को नौकरी देने वाली सोसाइटी (क्लब), BCCI की हाल ही में हुई बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व कप के पहले ही दौर में बाहर निकल जाने की मुख्य वजह ये थी कि खिलाडी एक समय में तीन से ज्यादा विज्ञापन कर रहे थे और एक एक विज्ञापन में २ से ज्यादा खिलाडी काम कर रहे थे। इनसे निपटने के लिये बैठक में कुछ ‘कठोर’ फैसले लिये गये हैं। विज्ञापनों के अलावा सिर्फ एक कोच का मौजूद रहना (वो भी विदेशी) भी एक बडी वजह बताया गया । ह्म्म, जरा सोंचिये, ग्रेग चैपल जैसे २-३ और होते तो क्या होता ? खैर, अब खिलाडियों को संभालने के लिये एक गेंदबाजी कोच, एक क्षेत्ररक्षण कोच और एक मेनेजर भी होंगे ।

ये तो वो है जो मीडिया के सामने आया, सुना है कुछ अन्य भर्तियों की भी संभावना है, जल्द आवेदन कीजिये

विज्ञापन कोच
– इनका काम खिलाडियों के विज्ञापन संभालना होगा, ये देखना कि कोई खिलाडी नियत संख्या से ज्यादा विज्ञापन तो नही कर रहा।

बयानबाजी कोच
– ये कोच खिलाडियों की बयानबाजी पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे, बयान क्या देना है, या क्या नही देना है, कब देना है, किसको कितना माप तौल कर देना है आदि आदि मह्त्त्वपूर्ण मुद्दे इनके क्षेत्राधिकार में होंगे । सुना है, पाकिस्तान को भी इस तरह के एक कोच की अवश्यकता है, जिनका इस्तेमाल वो अपने खिलाडियों पर कम और पूर्व खिलाडियों पर ज्यादा करेंगे । वजह यह कि आधे से ज्यादा को तो बोलना आता नही है, पर सरफराज नवाज को कैसे चुप करायें ये इनके लिये मुसीबत है उन्हे चुप कराने के लिये तालिबान के कमांडरों से भी संपर्क साधा जा रहा है ।

फुटवर्क कोच – खासतौर पर वीरेन्द्र सहवाग के लिये, ताकि लापा मारने के अलावा, वक्तेजरूरत अपने कदमों का इस्तेमाल भी कर लें। भरतनाट्यम जानने वालों के लिये अच्छी संभावनाएं ।

‘रनिंग बिटवीन द विकेट’ कोच
– वैसे तो ये काम क्षेत्ररक्षण कोच भी कर सकते हैं, लेकिन सौरव गांगुली का कहना है कि गेंद के पीछे भागने में और गेंद के साथ भागने में जमीन आसमान का अन्तर है, बिना कोचिंग के वे रन नही दौड पायेंगे ।

इन सबके अलावा, एक कोच चाहिये जो इन सभी कोच में आपस में सामंजस्य बिठा सके, ताकि एक समय में एक खिलाडी के सिर पर एक ही कोच बैठा हो ।वैसे भज्जी का कहना था कि अब बडे मजे रहेंगे, बालिंग वाला बुलायेगा तो कह देंगे फ़ील्डिंग वाले के पास जा रहे हैं, और vice versa 😀 .

वैसे मंशा ये थी कि कम से कम ११ कोच तो हों ही, अभी ७ ही हुए हैं , लेकिन स्कोप बहुत है । पाकिस्तानी बोर्ड एक डोपिंग कोच, एक सट्टेबाजी कोच और कोच-खिलाडी की हाथापाई सलटाने के लिये एक कोच पर भी ‘बुरी’ तरह से विचार कर रहा है। आंख और कान खुले रखिये 🙂

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वर्ल्ड कप में भारत की हार से थोडा-बहुत (ज्यादा नही) दुखी मैं भी हूँ, कल नाई की दुकान पर बैठा था तो एक गहन गंभीर चर्चा का मूक दर्शक भी बना, जो खिलाडियों, कोच और चयनकर्ताओं को तरह तरह के विशेषणों से नवाजते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर चूक हुई कहाँ, और कुछ भाई लोग अगले विश्व कप(जो कि भारत में ही होना है) की संभावित रणनीति पर भी चर्चा कर रहे थे। वैसे भारत में २०१० के कामनवेल्थ खेल भी होने हैं, पर उससे किसी को क्या सरोकार है| खेल तो बस क्रिकेट है।

तो इस विश्व कप की हार का गम गलत करने के   लिये सेट मेक्स और तमाम न्यूज चैनल छोड कर सोंचा कि फिल्म ही देखी जाये। अब जले पे नमक यह, कि बीच में आने वाले विज्ञापनों में दिखाई दिये इरफान पठान, जिलेट को अपनी सफलता का राज बताते हुए। पठान और सफल, ये तो २ साल पहले हुआ था जी, कहाँ हो आप?  ऐसा मैं आजकल तमाम चैनल्स पर देख रहा हूँ । भाई , माना कि तुमने विज्ञापन बना दिये हैं पहले ही, और दिखाना भी तुम्हारी मजबूरी है, लेकिन कुछ दिन तो रुक जाओ।  होता ये है, कि उधर धोनी का विकेट गिरा, और उधर धोनी सेवन अप के विज्ञापन में दिखाई दे गये।  ऐसा लगता है, नई नई विधवा को बन-ठन कर निकलते हुए देख लिया। यार, टाइमिंग का कुछ तो खयाल करो, ऐसे तो जो खरीदने वाला होगा, मारे गुस्से और चिढ के नही ही खरीदेगा।

चलते चलते: ये धोनी के सेवन-अप वाले विज्ञापन पर गौर करें। सेवन-अप पी कर धोनी लहराती जुल्फों में कहते हैं “…और मैं बन गया धोनी !!!” क्यों बेटा, इसे पीने के पहले धोनी नही थे क्या, कुछ और थे? तुम्हारे पापा सुनेंगे तो बहुत मारेंगे 😉

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किसकी तैयारी…?

चैम्पियन्स ट्राफ़ी में आस्ट्रेलिया से हार कर बाहर होने के बाद एक बार फ़िर कयास और अटकलों का बाजार गरम है । सबसे बडा मुद्दा ये है कि क्या भारत की २००७ क्रिकेट विश्वकप के लिये की गई, और की जाने वाली तैयारी पर्याप्त है ? काफ़ी कुछ ठीकरा ग्रेग चैपल के सर भी फोडा जा रहा है, कि उन्होने जरूरत से ज्यादा प्रयोग कर लिये हैं और परिणाम नही दिखाई दे रहे हैं ।

लेकिन क्या वाकई विश्वकप में प्रदर्शन या मोटे तौर पर कहें तो एक दिवसीय क्रिकेट में ही प्रदर्शन किसी भी तैयारी या रणनीति पर निर्भर करता है? अपना तो मानना है कि नही…जो चल गया वही असल होता है यहाँ तो । बोले तो क्लिक करने की बात है ।

याद कीजिये, २००३ विश्वकप के ऐन पहले भारत न्यूजीलैण्ड में एक बुरी सीरीज खेल कर आया था और किसी को भी उम्मीद नही थी कि टीम फाइनल तक पहुँच जायेगी । और तो और, केन्या जैसी टीम सेमी फ़ाइनल खेल गयी थी । तो भई, टीम से जितनी नाउम्मीदी रहे उतना ही अच्छा, नही तो अपने कई दिन पिछले रविवार जैसे बीतते हैं ।

वैसे अगर तैयारी ही देखी जाये तो सबसे अच्छी रणनीति रही आस्ट्रेलिया कि…कौन सी रणनीति ? अजी ग्रेग चैपल को आस्ट्रेलिया से ही तो निर्यात किया गया  हैं…  😉

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