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Archive for the ‘आपबीती’ Category

कुछ दिन पहले सफर की कतरनें लिखते समय भारतीय रेले के स्लीपर क्लास डब्बों में साइड में तीसरी बर्थ घुसा देने से हुई परेशानी पर लिखा था…। कुछ अन्य लोगों ने भी इससे हुई परेशानी का जिक्र किया था। सागर भाई ने भी अपनी एक पोस्ट में इसका जिक्र किया था।

रेलवे की साइट पर हाल ही में एक opinion poll डाला गया है जिसमें इस असु्विधा सुविधा पर यात्रियों से प्रतिक्रिया माँगी गयी है। अन्य लोगों ने भी हाल में रेल यात्रा करते समय इससे होने वाली दिक्कतें भुगती होंगी मसलन सामान रखने के लिये कम जगह, बैठेने  और लेटने के लिये के लिये कम जगह ( दिसम्बर में इन्दौर से मथुरा जा रहा था..साइड ऊपर के बर्थ पर लाख कोशिश के बाद भी खुद को फिट नही कर पाया..आखिरकार सीट बदलनी पडी)

Opinion Poll में भाग लेने के लिये यहाँ चपत लगायें।

फार्म के साथ के एक दिक्कत है कि आपकी यात्रा का सारा विवरण मांगता है., जो जरूरी नही की सबने संभाल कर रखा हो (PNR No., यात्रा तारीख, कोच एवं सीट न. आदि)

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“यू आर ए वेजीतेरीयन!!!”

“ओ याsss”

“वेजीतेरियन विथ फिश?”

“नो…डोन्ट टेक फिश आल्सो.”(भाई, ये कैसा वेजीटेरियन होता है?)

“वेजीतेरियन वोथ एग..???”

“नो नो…डोन्ट टेक एग आइदर.“(नही जी…अन्डे का ही तो मुर्गा बनता है)

“ओsss.. यू दोन्त तेक मिल्क…?”

“फाइन विथ मिल्क एन्ड मिल्क प्राडक्ट्स..”

“यू आल्सो डान्ट ईट फ्लावर्स? ”

व्हाट?????

बहुत मुश्किल है भाई…कैसे समझाऊं!

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कैसा महसूस होता है जब कोई धीरे धीरे इतना करीब आ जाता है कि पता भी नही चलता और वो जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है।

अजनबी, कल जब तुम मेरी जिन्दगी में आये थे, तो तुम्हारे लिये मैं और मेरे लिये तुम कितने नये नये थे।…अनेक आशंकाओं, पर उत्साह से मन भरा हुआ था। उत्साह आज भी है, पर आशंकाएं विश्वास में बदल चुकी हैं। और साथ में हैं, तुम्हारे संग बिताये पल, चाहे वो सिनेमाघरों की अंधेरी सीटे हों या बिडला मंदिर के प्रांगण से दिखता विहंगम दृश्य। ट्रेफिक में फँसा हुआ आटो अथवा रविवार को अबिड्स में पटरी लगने वाली की दुकानों पर किताबों को देखते हुए चहलकदमी। हर समय, हर जगह तुम मेरे साथ थे और तुमसे अपनेपन का रिश्ता जुडता गया ।

अब इससे पहले कि आप मुझे तरह तरह की बधाइयां देने लगें और मेरी पिछली पोस्ट की तरह कुछ गलतफहमियां पैदा हो जायें, मैं स्पष्ट कर दूं कि ये पंक्तियाँ समर्पित हैं, इस प्यारे से शहर हैदराबाद को जहाँ रहते हुए मुझे हाल ही में एक साल बीत गया|  ऐसा भी नही है कि एक साल में मैने इस शहर की खूब खाक छानी है या खूब घूमा हूँ, कुछ परिचित रास्तों को छोड दें, तो ज्यादतर हिस्से से वाकिफ भी नही हूँ, पर फिर भी…बात है भाई।

बावजूद इसके कि मैं अब भी तेलुगु के २-४ वाक्य भी ठीक से नही बोल पाता, आज तक एक भी तेलुगु फिल्म नही देखी, तेलुगु का कोई गाना ठीक से नही गा पाता और सानिया मिर्जा के अलावा किसी हैदराबादी लडकी को नही जानता। बावजूद इसके कि अभी तक चारमीनार नही देख पाया हूँ  ना ही गोलकुंडा का किला और मारडपल्ली, कूकटपल्ली और चीकटपल्ली(ये सब जगहों के नाम हैं) भी मेरे पल्ले नही पडते । बावजूद इसके कि इन १२ महीनों में से नौ महीने अनगिनत होटलों की चौखटों पर सर  पटक पटक कर नाक भौं सिकोडते हुए रसम चावल इडली डोसे खाये हैं,  पिछले एक साल में ये शहर इतना करीब आ गया कि अब अपना दूसरा घर जैसा लगने लगा है।

अजनबी..तुम वाकई जाने पहचाने से लगने लगे हो यार !

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भुज और सूरत के बाद अपनी अगली मंजिल थी अहमदाबाद । दो बार अहमदाबाद होकर गुजर चुका था, भुज जाते वक्त और सूरत जाते वक्त लेकिन रुकना नही हुआ था । हाँ भुज जाते वक्त पंकज जी को फोन लगाया था और अगली बार आने का वादा किया था, दो-तीन बार चैट पर भी ।

पहुंचने के दूसरे दिन(शनिवार को) सोंचा कि रविवार(११ फरवरी) को ये शिखर वार्ता संपन्न कर ही दी जाये । पहले सोंचा कि क्या पता भाई लोग रविवार को अपना कोई कार्यक्रम बनाये बैठे हों और हम दाल भात में मूसलचंद पहुंच जायें, शनिवार को ही पंकज जी को फोन किया और पूँछा कि आफिस खोलते हैं या नही रविवार को, उन्होने फोन पे स्वागत किया, लंच के पहले आफिस में होंगे बताया, और घर पे खाने का निमंत्रण हाथ के हाथ सरका दिया, जिसके लिये हमने फोन पर ही थोडी ना नुकुर भी कर दी । रविवार को फिर फोन लगाया, पता लिया तथा कैसे पहुंचना है पूँछा । उन्होने हमे हमारे होटल से ‘उठा’ लेने का (बोले तो पिक करने का) प्रस्ताव रखा, जिसे हमने हमारे ‘शर्मीले’ स्वभाव की वजह से मना कर दिया । वैस इतना शर्माता नही हूँ…बस सोंचा कि अकेले जायेंगे तो इसी बहाने अहमदाबद देख लिया जायेगा थोडा ।

रविवार को होटल से निकला, पहले सोंचा बस से चलते हैं…बैठा, दो स्टाप आगे जाकर जाने क्यों, फिर उतर गया और आटो ले लिया । बाद में लगा, अच्छा किया, नही तो लंच नही, चाय के समय आफिस पहुँच पाता। खैर ढूंढ-ढांढ कर आफिस पहुंचे, संजय जी बगलगीर होकर मिले, आसन(कुर्सी) ग्रहण करवाया गया, पंकज जी मिले, खुशी जी और अभिजीत जी से मिला ।

बातचीत शुरू हुई, संजय जी मेरे बारे में नेट पर थोडा खंगाल चुके थे, पर ज्यादा कुछ मिला नही था, फोटो भी नही, सो अपना परिचय दिया, क्या करता हूं, क्यों करता हूं, कहाँ करता हूं टाइप । मैं पिछले २० दिन से बाहर था सो ब्लागजगत की हलचलों से बेखबर था बताया गया कि बडा हल्ला हो रहा है आजकल और कई पत्रकार बंधु कूदे हुए हैं ब्लागिंग के मैदान पर । तभी सागर जी गूगल टाक पर दिखे, जिन्होने की इसका नामकरण किया, “ब्लागर मीट इन कर्णावती” और बैंगानी बंधुओं से ताकीद की कि हमें क्या खिलाया-पिलाया जा रहा है।

फिर चर्चा ज्यादातर ब्लागिंग पर केन्द्रित रही, लोग क्या, क्यों, कैसा, कैसे लिखते हैं, कुछ लोग लिखते-लिखते क्यों इतना सेन्टिया जाते हैं और कुछ सेन्टी होकर क्यों लिखते हैं, जो चिट्ठाकार लडते हैं वो कैसे दोस्त बन जाते हैं, जब लडते हैं तो चिट्ठे से लडते हैं या चिट्ठाकार से । सुनील दीपक जी कितना घूमते हैं, रवि जी कैसे किसी को भी कुछ लिखने से मना नही करते , जीतू जी कैसे कैसे आइडिये फेंकते रहते हैं, फुरसतिया जी इतना लम्बा कैसे लिख लेते हैं, एडसेन्स से कमाई कैसे संभव है, या क्या दिक्कत है , परिचर्चा पर जाना आजकल कम क्यों हो गया है आदि आदि।

क्रिकेट मैच भी था उस दिन सो हमे नेट पर लाइव मेच भी दिखाया गया, निरंतर का नया अंक आ गया है ये बताया गया । ये भी पता चला कि आज संजय पंकज जी की शादी की सालगिरह भी है, सो हमने उसकी भी बधाई टिकाई (ये भी सोंचा कि खाली हाथ आ गये, कुछ लेकर आना था) ।फिर लंच का आफर, मैने फिर थोडी ना ना की, पर मैं एक अकेली जान और इधर और ये दो-दो, चलने नही दी गई । वास्ता दिया गया कि घर पर खाना बन गया है, दिन में बासी बचा तो शाम को इन्हे ही खिलाया जायेगा और हमें गाडी में डाल दिया गया । निकलने के पहले फोटो सेशन हुआ, जिसमे कि पंकज जी इतने गमगीन क्यों नजर आ रहे हैं हम बता देते हैं । दरअसल इनकी चिंता ये थी कि दिल्ली ब्लागर मीट में भी इन्होने यही शर्ट पहनी थी जो आज पहनी हुई थी, और ये कह रहे थे कि लोग क्या कहेंगे, पंकज हमेशा एक ही शर्ट में फोटो क्यों खिंचाता है । बडे भैया के खूब समझाने पर राजी हुए फोटू खिंचवाने को 🙂

nitin.jpg

घर पहुंचे, भाभियों से मिले, और परिवार के(या कहें हिन्दी के) सबसे छोटे ब्लागर से मिले । २० दिन बाद घर का खाना नसीब हुआ था, सो हम अब तक की लाज शरम छोड कर टूट पडे…। खाने के बाद की चर्चा महंगाई, राजनीति, क्रिकेट, समाचार, सूरत, असाम, चूरू होते हुए पता नही कहाँ कहाँ होकर निकली कि अचानक फोन टनटना गया । वैसे भी काफी वक्त हो गया था, सो हमने बैंगानी परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए विदा ली । लौटते में हमे आइ. आइ एम. अहमदाबाद दिखाया गया जहाँ से आटो पकड के हम ये जा वो जा हुए….।

इति श्री गुजरात यात्रा समाप्तम

फोटो साभार जोगलिखी

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सागर जी ने जब थोक में अपने शिकार बनाये थे तो मुझे भी लपेटे मे ले लिया था…८ सवाल पूँछे हैं जबकि चलन ५ का ही है । इंजिनियरिंग की परीक्षा में हमारे यहाँ ८ प्रश्न आते थे पेपर में, जिनमें से किन्ही ५ का उत्तर हमें देना होता था। प्रति प्रश्न २० नम्बर और उस १०० में से भी पास होने के लिये मात्र ३३ नम्बर की जरूरत होती थी । आदत कुछ-कुछ अभी भी वैसी ही पडी हुई है सो उसी हिसाब से प्रश्न पत्र हल करते हैं..३३ का लक्ष्य रख कर, इधर उधर ताका-झांकी करते हुए.. 🙂

पहला सवाल:  आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?

प्रश्नकर्ता के चिट्ठे से ही चेंपता हूं…

“इस  प्रश्न में दो की सीमाओं में बंधना मुझे मंजूर नहीं और वैसे भी दो का चयन करना बहुत मुश्किल है।”..डान की भाषा में कहूँ तो मुश्किल ही नही नामुमकिन भी है….काफी पहले पढने का शौक नाम से एक लेख लिखा था..उसकी दूसरी किस्त आज भी इंतजार कर रही है, लेकिन पास होने लायक जवाब वहाँ मिल ही जायेगा ।

फिर भी ये बता सकता हूँ कि किस तरह की पुस्तकें पढना पसंद करता हूँ । गीताप्रेस, गोरखपुर का तमाम साहित्य मुझे बहुत प्रिय है,  डोमेनिक लेपायर की सभी पुस्तकें जिनमें उन्होने ऐतिहासिक घटनाओं का काफी शोधपरक चित्रण किया है मुझे काफी अच्छी लगी (Freedom at Midnight, Paris is Burning, Oh!Jerusalam आदि)।  आत्मकथाएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं..(हाल ही में पढी स्टीव वा की “Out of My Comfort Zone”) , और सुरेन्द्र मोहन पाठक के तमाम जासूसी उपन्यास।

फिल्में….हल्की फुल्की फिल्में देखना पसंद करता हूँ..बहुत भारी ना हों..मनोरंजन करें..ना कि उदास कर दें…वैसे संजीव कुमार-जया भादुडी की “कोशिश” मुझे बहुत पसंद है..दोनो के अभिनय की वजह से….अमोल पालेकर-उत्पल दत्त की फिल्में, फारुख शेख दीप्ती नवल की २-३ फिल्में ।वैसे इस मुद्दे पर अनुगूंज में एक चर्चा हो चुकी है कि हम फिल्में क्यो देखते हैं । थोडे जवाब वहाँ भी मिल जायेंगे।

दूसरा  इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें – चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)

पहले चिट्ठा पढना – पढने का तो शौक है ना…और कुछ दिमाग चलाना भी नही होता, और इतनी अच्छी अच्छी सामग्री मिलती है ।

फ़िर टिप्पणी पढना। वजह ? किसी क्रिया की कितनी, और किस किस तरह की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जानने में बहुत मजा अता है, और मेरी सोंच-समझ के दायरे को बढाती है, दिमाग की खिडकियाँ खोलती हैं…

टिप्पणी करना – तीसरे नम्बर पर है…कई बार कई चिट्ठे बहुत अच्छे लगते हैं, पर समझ नही आता कि क्या लिखूँ, कई बार ऐसा हुआ है कि ’टिप्पणी करे” पर क्लिक किया, बहुत देर सोंचा कि क्या लिखूं, और फिर बन्द कर दिया । सोंचता हूं कि सिर्फ यह लिख देना कि “बहुत अच्छा लिखा”, लिखने वाले के साथ अन्याय होगा।

और फिर चिट्ठा लिखना, हाथ पैर हिलाने पडते हैं, दिमाग चलाना पडता है । समय भी निकालना पडता है । कई बार हुआ है कि घूमते फिरते कोई विचार आया है लिखने को, लेकिन शाम तक गायब । वैसे ये क्रम इसलिये भी ठीक ही है कि अपनी चिट्ठाकारी का भी यही क्रम रहा है, पहले चिट्ठे और टिप्पणियां पढना शुरू की, फिर टिप्पणी करना..और फिर खुद का चिट्ठा बनाया ।

तीसरा आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?

अगर समय इजाजत देता है तो लगभग हर चिट्ठा पढता हूँ, लेकिन पसंद पूँछी जाये तो पहले नम्बर पर संस्मरणात्मक चिट्ठे आते हैं । कई लोगों को पढ कर लगता है कि खुद की जिन्दगी पढ रहे हैं, ये तो अपने साथ भी हुआ था (या अपने साथ भी नही हुआ था 😉 ) या इस तरह की खामी/खूबी वाले सिर्फ हम ही नही हैं । उसके बाद हास्य व्यंग्य आते हैं । और साथ ही सम सामयिक मुद्दों पर लिखे चिट्ठे । भारी कविताएं बिल्कुल हजम नही होती…उलझ कर रह जाता हूँ । तकनीकी चिट्ठे कई बार कमाल की जानकारी दे जाते हैं ।

चौथा चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है?

व्यापार, व्यवसाय पर कोई फर्क नही लेकिन खुद पर बहुत फर्क पडा है । दुनिया को, घटनाओं को देखने का नजरिया बदला है । अपनी सोंच का दायरा बढा है । पहचान का दायरा बढा है । मुझे मालूम है कि हिन्दुस्तान/दुनिया के अनेक शहरों में मेरे जानने वाले रहते हैं…कभी मिला नही तो क्या हुआ। साथ ही यह भी कि जिन्दगी में बहुत कुछ देखना और करना बाकी है ।

अंतिम सवाल…. . आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?

सबसे मिलना चाहूँगा..क्योंकि ऐसा कोई भी नही है जिससे ना मिलना चाहूँ 🙂

सागर जी से हैदराबाद में और बैंगानी परिवार से अहमदाबाद में(विवरण लिखना बकाया है) मिल चुका हूँ । और भी जिन जिन शहरों में जाने का मौका मिलेगा वहाँ के चिट्ठाकारों से जरूर मिलूंगा । वैसे अभी हैदराबाद के ही सारे लोगों से नही मिल पाया हूँ …

तो सागर जी ..८ में से ५ के जवाब हमने दे दिये….पास हम हमेशा होते आये हैं..इस बार भी हो जायेंगे ये हमें अच्छे से मालूम है. टाप करने की अपनी कोई इच्छा है नही 🙂 कभी रही भी नही । और हाँ अगर पास ना किया…..तो जाओगे कहाँ..एक ही शहर के बाशिन्दे हैं.. निपट लेंगे.. 😀

मैं आगे किसी को टैग नही कर पा रहा हूँ क्योंकि मेरी जानकारी में लगभग सारे सक्रिय चिट्ठाकार लपेटे में आ चुके हैं और हम “शिकार का शिकार नही करेंगे 😀 ” 

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आप सब को होली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें…

आपकी होली  रंगीली, सजीली, छबीली, तडकीली- भडकीली, रसीली, लाल-गुलाबी-नीली-पीली, सूखी-गीली हो ऐसी हमारी कामना, मनोकामना, मंगलकामना है…

चलते चलते होली का एक रसिया (इस बार घर ना जा सकने की वजह से खुद ने मन ही मन गा लिये.. 

होरी खेलूँगी श्याम संग जाय,
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥१॥

फागुन आयो…फागुन आयो…फागुन आयो री
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री

वो भिजवे मेरी सुरंग चुनरिया,
मैं भिजवूं वाकी पाग ।
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥२॥

चोवा चंदन और अरगजा,
रंग की पडत फुहार ।
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥३॥

सास निगोडी रहे चाहे जावे,
मेरो हियडो भर्यो अनुराग ।
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥४॥

आनंद घन जेसो सुघर स्याम सों,
मेरो रहियो भाग सुहाग ।
सखी री बडे भाग से फागुन आयो री ॥५॥

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पिछले काफी समय से मेरा हिन्दी पुस्तकें पढना काफी कम होता जा रहा है । जब तक कालेज में थे,  कालेज लाइब्रेरी में काफी साहित्य था हिन्दी में और कभी कभार पढते भी  थी..पर उस अनुपात में नही जिसमें अंग्रेजी की पुस्तकें ।और खरीदी तो बिल्कुल भी नही ।एक कारण अनुपलब्धता भी है..अधिकांश जगहों पर आपको हिन्दी पुस्तकें ना के बराबर मिलेंगी, अखबारों में बामुश्किल किसी किताब का जिक्र/समीक्षा होती है । इंडिया टुडे/आउट्लुक वगैरा में जरूर नियमित समीक्षाएं छपती हैं पर उनमें से अधिकतर इतनी साहित्यिक होती हैं कि बस ।

सो काफी दिनों से में हिन्दी पुस्तकें पढने और खरीदने की सोंच रहा था । एक कारण विभिन्न चिट्ठों पर हिन्दी की कई पुस्तकों का जिक्र भी रहा…जिस भी पुस्तक का जिक्र होता…लगता, कि अरे ये तो पढी ही नही है । हिन्दी चिट्ठे पढने के बाद ही लगा कि मैने कितने कम हिन्दी लेखकों को पढा है । प्रेमचन्द, शरतचन्द्र आदि तो स्कूल में पढ लिये थे पर उनके बाद कुच्छ नही । (सिवाय सुरेन्द्र मोहन पाठक के जिन्हे इन्जिनीयरिंग के समय खूब पढा 🙂  )

सो इस बार गुजरात निकलते वक्त सोंचा हुआ था कि स्टेशन पर किसी बुक स्टाल से पुस्तकें जरूर लेनी है । अहमदाबाद के लिये निकलते समय रायपुर स्टेशन पर बहुत देर किताब की दुकान पर खडे रहने के बाद मनोहर श्याम जोशी की ‘कसप’ खरीदी । २४ घण्टॆ बाद अहमदाबाद उतरते समय किताब २० पृष्ठ और बाकी थी । वो भी अगले १-२ दिन में खत्म कर दिये । अगले २० दिन काफी व्यस्त रहे सो कुछ पता ही नही चला और एक बार फिर अपने आप को हैदराबाद में पाया । लग रहा था कि फिर थोडा इन्तजार करना पडेगा ।

लेकिन कहते हैं ना जहां चाह वहाँ राह।

हैदराबाद में हर रविवार को अबिड्स में पटरी(फुट्पाथ) पर पुरानी किताबों का बाजार लगता है, ठीक ठीक वैसा ही जैसा दरियागंज में लगता है । अधिकतर नई बेस्ट्सेलर्स के पायरेटेड संस्करण, भारी तादाद में पुराने अंग्रेजी उपन्यास..(इतना पल्प…२० रुपये में किताबों के सजिल्द संस्करण..पर ना कभी किताब का नाम सुना होगा ना लेखक का) , बच्चों की किताबें..पुरानी पत्रिकाएं..काफी कुछ मिल जाता है ।हर १-२ रविवार छोड कर, मुझे कुछ घन्टे यहाँ वक्त बिताने में काफी मजा आता है…चाहे अपने काम की किताब मिले या ना मिले अथवा कुछ खरीदी हो ना हो लेकिन सिर्फ घूमने, किताबों को उलटने पलटने में ही काफी अच्छा वक्त गुजर जाता है । पर हिन्दी पुस्तकें यहाँ भी नदारद …कई बार तलाश किया किया पर सिवाय रानू /राजभारती के पुराने सामाजिक उपन्यासों के सिवा कुछ नही मिलता ।

पिछले के पिछले रविवार कुछ हाथ आया..एक दुकान से गुजर रहा था कि कुछ किताबों पर नजर पडी, देखा …भीष्म साहनी, अचार्य चतुरसेन जैसे कुछ नाम लिखे हुए थे । रुका तो देखा उसके पास अधिकतर हिन्दी और उर्दू की पुस्तकें थीं । अगला आधा घंटा अपना वहीं बीता..और जब चले वापस तो ये १० किताबें अपने हाथ में थी

खामोशी के आंचल में – अमृता प्रीतम
वैशाली की नगरवधू – आचार्य चतुरसेन
बगुला के पंख – आचार्य चतुरसेन
श्री कांत – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
शेष प्रश्न –  शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
दो व्यंग नाटक – शरद जोशी
सुरंगमा – शिवानी
प्रेरक प्रसंग (दो भाग) – गीताप्रेस
वांड्चू एवं अन्य कहानियां – भीष्म साहनी

और जरा सोंचिये, कितने दाम चुकाये हमने इन किताबों के…? मात्र १००/- रुपये !!! अपना तो संडे वसूल हो गया भई…आजकल इन्हे ही पढ रहा हूं, अगला एक महीना बडे आराम से कटेगा । 🙂

पर किस्मत का ताला यहीं बन्द नही होता ना अपना, कूछ दिन पहले ओर्कुट पे घूमते हुए हिन्दी ई-पुस्तक समूह से ई-स्निप्स की ये कडी हाथ लग गयी , जिसके बारे में बाद में रवि रतलामी जी ने रचनाकार पर लिख ही दिया है , अतः और कुछ लिखने की जरूरत नही है । यहाँ भी छोटा मोटा खजाना ही रखा है । बस अगर आप कम्प्यूटर में आँख गडाये पढ सकते हों तो निश्चय ही मस्त जगह है ।

पुनश्च: – सागर जी, आपका दिया पर्चा हल करने में थोडी देर लगेगी, पर जल्द ही हाजिर होंगे जवाब लेकर 🙂

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भुज के बाद अपना अगला पडाव था सूरत । याने गुजरात के पश्चिमी कोने से हमें दक्षिणी छोर की ओर जाना था । सूरत भारत का हीरा कटिंग और कपडा उद्योग का केन्द्र माना जाता है, पर सूरत शहर हमारी मंजिल नही थी । हमें जाना था सूरत के आदिवासी इलाके में । सूरत जिले में कुल १४ तालुका (या मंडल) हैं जिनमें से १० आदिवासी बहुल हैं जिनकी कि जनसंख्या का करीबन ८५-९०% हिस्सा आदिवासी है । आदिवासी विकास विभाग के दो कार्यालय हैं इस इलाके में, मांडवी और सोनगढ जहां कि हमे जाना था ।

यूँ ही चला चल राही

(य़ूं ही चला चल राही – सूरत-मांडवी)

पहले मांडवी । सूरत से करीब ६० किलोमीटर दूर है, तापी नदी के किनारे बसा हुआ छोटा सा कस्बा है और तालुका मुख्यालय है। इस इलाके में शकर की करीबन १० मिलें हैं, और सूरत से लेकर मांडवी तक का पूरा रास्ता आपको गन्नों के खेतों से अटा हुआ दिखाई देगा । अब तक मैं यही समझता था कि गन्ना सिर्फ़ महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में ही होता है, पर यहाँ गन्ने की इतनी खेती देख कर अपने अज्ञानता का अहसास हुआ ।

गन्ना और मक्का

(गन्ने और मक्का की मिश्रित फसल । गन्ने का खेत अभी तैयार किया गया है, बडे पौधे मक्का के हैं जिसे चारे के लिये जल्द ही काट लिया जायेगा)

मांडवी के वन विभाग विश्राम गृह (जहां हम रुके थे) से काकरापाडा परमाणु बिजली घर की चिम्नियाँ दिखाई देती हैं, एवं थोडे ही ऊपर कांकरापाडा बांध बना हुआ है । इलाके की विसंगति ये है कि जहाँ जहाँ कांकरपाडा की नहर है, वहाँ खूब फसल होती है अर किसान समद्ध हैं, पर जहाँ नहर नही पहुँची, वहाँ किसानों को एक फसल के भी लाले हो जाते हैं..और ये अंतर आपको २०-२५ इलोमीटर के फासले पर ही मिल जायेगा । मेरे साथी मोहसिन जी इससे पहले दाहोद-पंचमहल के आदिवासी क्षेत्र का दौरा कर चुके थे, अतः दोनों जगहों की तुलना करने से अपने आपको नही रोक पा रहे थे । दाहोद की तुलना में ये इलाका काफी समृद्ध और विकसित है । चाहे वो कृषि हो, पशुधन या शिक्षा । गाँवों के स्कूलों की तारीफ़ करनी होगी, चहे कितना भी छोटा स्कूल क्यं ना हो, साफ सुथरा, पेड पौधों से सुसज्जित और सुंदर होगा ।

ज्यादातर गाँवों में हर परिवार से १-२ लोग सूरत जाते हैं…काम या तो हीरा कटिंग, या किसी मिल में मजदूरी । शकर मिलों में यहाँ के लोगों को नही रखते…बाहर से मजदूर बुलाये जाते हैं..लगभग यही समस्या हमने भुज में भी देखी थी । सूरत जाने वाले मजदूर ८-१५ दिन में घर आते हैं एक बार… । युवाओं में शिक्षा का स्तर कमोबेश ठीक ही है, लेकिन समस्या ये है कि पढे लिखे लडके, याने जवान पीढी खेती/पशुपालन नही करना चाहती ।गाँव में जाइये..किसी भी युवा लडके से पूँछिये..
“भाई, क्या करते हो ?…”
“कुछ नही ।”
“अरे..कुछ तो करते होंगे…”
“हाँ ,खेती करते हैं ।”

यह वार्तालाप एक दो नही हर जगह पर हुआ । मुख्य फसलें, जहाँ पानी है वहाँ गन्ना और चावल, जहाँ पानी नही वहाँ ज्वार । थोडी बहुत तुवर, मूंगफली, मक्का आदि भी होती है ।कुछ जगहों पर सब्जी भी उगाई जाती है । व्यारा तालुका के अंतापुर गाँव की तस्वीर है । जानकर आश्चर्य हुआ के ये भिंडी निर्यात के लिये छाँटी जा रही है…

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अपनी जिन्दगी का अहला विस्थापित गाँव हमने देखा, निजर तालुका में, जो कि सोनगढ में आता है । गाँव का नाम, हाथनूर । विस्थापित हुए, उकाई बाँध के चलते । उकाई बाँध तापी नदी पर ही बना है और महाराष्ट्र गुजरात की सीमा तक फ़ैला हुआ है । करीबन सन ७० में यह बाँध बना था, जिसके चलते ये लोग विस्थापित हुए । ३७ साल बाद भी लोग इस बात को भूले नही है । हाथनूर पहले महाराष्ट्र में आता था, और १९६० में, बाँध निर्माण की योजना के समय गुजरात में चला गया । आज भी लोगों से पूंछिये ‘काम करने कहाँ जाते हो’..जवाब मिलेगा गुजरात ।आधा आधा किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए गाँव, बोली में हल्का सा मराठी का घालमेल । समस्या ये कि बाँध तो बना, पर बाँध का फायदा इन्हे नही मिला, नहरें तो सारी निचले इलाके में हैं । उकाई बाँध पर बिजली संयंत्र भी है। और पास ही में एक कागज मिल भी है ।

और आखिर में बात दूध डेरियों की । इनके बिना गुजरात का वर्णन अधूरा ही होगा ना । हर गाँव में आपको दूध मंडली मिल जायेगी, जिसे की दूध सहकारी भी बोला जाता है । पूरे गाँव का दूध यह मंडली इकट्ठा करती है, इसका अपना भवन एवं कार्यालय होता है । यह दूध इकट्ठा करके निकटतम प्रशीतन केन्द्र पर भिजवा दिया जाता है । हर किसान की अपनी एक डायरी होती है जिसमे कि दूध की मात्रा व वसा के हिसाब से रोज का भुगतान दर्ज किया जाता है, जो महीने के आखिर में मिलता है । हालांकि अधिकतर जगहों पर हमें वसा नापने के यंत्र नही मिले…इस स्थिती में यह नपाई प्रशीतन केन्द्र पर दूध पहँचाए जाने के समय होती है । प्रशीतन केन्द्र पर दिन में एक बार जिला दुग्ध सहकारी (District Milk Cooperative) की गाडी आती है (सूरत में सुमूल) और दूध ले जाती है । पशुधन किसी भी किसान की अर्थव्यस्था की रीढ होता है । लेकिन नस्ल (अधिकतर गाय भैंसों की) बहुत अच्छी नही थी । कहने को सब्सीडी मिलती है सरकार से (करीब ६०००/- की), भैंस खरीदने के लिये, लेकिन इसी सब्सीडी के चलते १५०००/- की भैस काश्तकार के २५ से ३० हजार में पड जाती है..इतने लोचा हो जाता है बीच में ।फिर भी कहूंगा कि कम से कम मेरे गृह राज्य राजस्थान से यहाँ पशु/दूध की स्थिति बहुत बेहतर है । बस यही बात समझने की कोशिश करता रहा कि ये सहकारी आंदोलन, जो गुजरात मे इतना सफल हुआ, भारत के अन्य राज्यों में क्यों नही चल पाया ?

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(तापी नदी के पीछे ढलता सूरज – चित्र मांडवी वन विश्राम गह के पास से, जहाँ अपन रुके थे | सभी चित्र – मोहसिन जी)

(अगली मंजिल – अहमदाबाद – तरकश टीम से मुलाकात….)

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