दिवाली पर ९ दिन के लिये घर जाना हुआ।
रिजर्वेशन कन्फर्म नही हो पाया था, सो जाते समय तो जनरल डब्बे में बैठ कर गया। बहुत सालों बाद ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठने का मौका लगा। हैदराबाद से भोपाल तक का रात भर का सफर था और ट्रेन में दिवाली की भीड का अंदाजा तो था…पर ये सोंच के चढ गये कि जाना तो है ही, किसी तरह आज की रात काटनी है बस। किस्मत से टिकने को जगह भी मिल गई…सो बैठ तो लिये ही।
१० व्यक्तियों के बैठने की जगह में ३० लोग फँसे हुए हों तो रात कैसी बीतनी है इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है पर मुझे ये समझ नही आता कि भारतीय रेलवे अपनी ट्रेनों में सामान्य श्रेणी के डब्बे क्यों नही बढाता। कालेज समय में कई बार जनरल बोगी में सफर करने का मौका लगा, अलवर-जयपुर-कोटा और मथुरा-कोटा के बीच, पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि सामान्य श्रेणी के डब्बे में, लोगों को कम से कम बैठने की सीटें पर्याप्त पड रही हों…हमेशा भंयकर धकापेल ही देखी है।
एक अन्य बात यह,कि आज तक कभी सामान्य श्रेणी के डब्बे में टिकट परिचालक नही देखा…(शायद कमाई का स्कोप कम होता है यहाँ) खैर..आजू-बाजू और सामने वालों पर झूलते हुए और सिर पर पैर रखते हुए, २-४ बार लाइव लडाई देखते हुए, किसी तरह रात कटी और सुबह भोपाल और फिर आगे घर पहुँचे।
लौटते वक्त मैने तीन टिकट करवाये थे, भोपाल-हैदराबाद, भोपाल-नागपुर और नागपुर हैदराबाद…ये सोंचकर कि इनमें से कोई २ भी कन्फर्म हो गये तो सफर कट जायेगा। लेकिन सिर्फ भोपाल-नागपुर ठीक हुआ जबकि कठिन सफर उसके आगे का था। किस्मत से मित्र अंशुल के कजिन मेरी ट्रेन के पहले वाली ट्रेन से हैदराबाद जा रहे थे…उन लोगों के टिकट कन्फर्म थे..बस जनरल टिकट लेकर उनके साथ लद लिये। संयोग देखिये…इस बार तो स्लीपर श्रेणी में भी टी टी साहब ने परेशान नही किया…एक बार उनके दर्शन हुए पर वो इतने व्यस्त थे कि टिकट चेक करने की फुरसत में नही दिखे।
पिछली सफर की कतरनों में मैने लेपटाप के Penetration और ट्रेन में मोबाइल चार्जिंग की परेशानी पर लिखा था। लेपटाप का penetration पहले से ३-४ गुना ज्यादा दिखा(कारण यह भी हो सकता है कि ट्रेन भारत की CyberCity) जा रही थी। और डब्बों में दो चार्जिंग पाइंट भी लगा दिये गये हैं। हालांकि ४ में एक ही डब्बे के पाइट काम कर रहे थे और ८१ लोगों के बीच ये बहुत कम है…पर नही मामा से काना मामा अच्छा। कुछ तो है। वैसे ये पाइंट, बाथरूम के बगल में, डब्बे के दरवाजे के एकदम पास लगाये गये हैं…मतलब उम्मीद ये की जाती है कि यात्री चलती ट्रेन में दरवाजे के पास खडा रहे। खैर, हो सकता है आने वाले समय में हर पंखे के स्विच के साथ एक चार्जिंग पाइंट भी उपलब्ध करवाया जायेगा।
एक करामात और…स्लीपर के डब्बों में साइड की शायिकाओं में जहाँ पहले दो ही लोगों की जगह होती थीं..अब एक शायिका और फंसा दी गई है। इसके फलस्वरूप दिन में तो उस एक बर्थ पर तीन लोगों को फँसना पडता है….और सोते समय ऐसा लगता है कि ताबूत में फँसा दिया है। एक यात्री और बढने एवं सीट के नीचे जगह कम होने से सामान रखने की जगह इतनी कम पडने लगी है कि लगभग हर जगह लोगों को सीटों के बीच में सामान रखने पड रहे थे। है तो ये कमाई बढाने की ट्रिक पर सवारियों की असुविधा का पूरा ध्यान रखा गया है इसे लागू करते समय।
चलते चलते - दिवाली का मौसम अपना इस बार थोडा स्पेशल रहा। जिन्दगी में कुछ उथल पुथल टाइप्स परिवर्तन हो रहे हैं। उम्मीद करता हूं आप सब की दिवाली मंगलमय रही होगी।


अच्छा वृतांत. हाँ रेलवे मे परेशानी तो बढ गई है.. पर खर्चे भी बढे हैं.
अच्छा इनपुट है मेरे व्यवसाय का।
कभी इस्तेमाल होगा आपकी दी गयी जानकारी का।
यात्रा विवरण सुन कर डर गए पिछली दीवाली पर पूर्वा का रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हुआ था पर वह स्लीपर मे चढ़ कर मुम्बई से कोटा पहुँच गई थी। कुछ परेशानी तो हुई ही। रेलवे के मुनाफे ऐसे ही बढ़ाए गए हैं। यात्रियों की सुविधाएं कम कर के। पर अधिक लोगों को यात्रा सुविधा हासिल हो गई है।
दीवाली की स्पेशलिटी और उथल-पुथल मुबारक मौके ले कर आएँ। दीपावली की बहुत बहूत शुभकामनाएँ।
bahut badia
बहुत बढ़िया लिखा जी आपने, रेल में ऐसी ही परेशानी हमें कुछ दिनों पहले हुई थी शायद आपने नहीं पढ़ा हो।
अहमदाबाद में एक यादगार दिन
I was expecting some details on home visit as well. Ek blog uspar bhi padne ko milta to achcha lagta.
Engagment ke subh Kamnaye… Special ka reason toh blog per bata diya kare bhai..
Increasing the number of seats on sides is really stupid step. Why not increase coaches!
Well, it was really bold step to travel in general compartment for such a long travel. And why not if something special is waiting!!
बिल्कुल सही कहा आप .. रेलवे का मुनाफा बढ़ने के लिए यात्रियों को कष्ट दिया जा रहा है… इस बार में भी दीवाली की छुट्टियों से वापस आते वक्त ऐसे ही साइड बिर्थ के बीच वाले सीट पे किसी तरफ़ फंस के आया था…
पंकज भाई, किनके खर्चों की बात कर रहे हैं? यात्रियों के या रेलवे के?

ज्ञानदत्त जी, अगर ये सब कुछ काम आया तो खुशी होगी।
दिनेश जी-धन्यवाद
राजीव जी- शुक्रिया
सागर भाई-आपका लेख पढा था पहले ही।
मुकुल-वो सब लिखना ठीक नही लगता यहाँ। विवरण के लिये अलग से मिलना
अनुराग- धन्यवाद। स्पेशल का कारण तो आपको मालूम है ही…
अखंड – डब्बे बढाना कारगर कदम हो सकता है, पर उसमें खर्चा हो जयेगा ना लालू जी का
कृष्णा- टिप्पणी के लिये शुक्रिया। तुम्हारे पास सीट तो थी..हमारे पास वो भी नही थी।
Mitra,
Jeevan ki naye adhyay ke liye lakh lajh badhayian!
Alok
आप बड़े हिम्मती है जरल डिब्बें में रात भर का सफर ! महात्मा जी की परम्परा को जीवंत बनाए रखने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं !
[...] 31, 2009 by Nitin Bagla कुछ दिन पहले सफर की कतरनें लिखते समय भारतीय रेले के स्लीपर क्लास [...]