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Archive for August, 2008

हरिओम पवांर को मैने पहली बार १९९६-९७ के आसपास सुना था। वे वीर रस के कवि हैं। हम ११-१२ वीं कक्षा में थे और हमारे अंग्रेजी के अध्यापक श्री ए पी सिंह के पास इनकी गाई हुई कविताओं की कैसेट थी। “मैं घायल घाटी के दिल की धडकन गाने निकला हूँ”।
१२ वीं के बाद स्कूल [...]

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सच है कि जिन्दगी शतरंज की बिसात नही जहाँ हर कदम चलने से पहले आगे और पीछे की सौ संभावित चालों के बारे में सोंचा जाये…लेकिन जिन्दगी कटी पतंग भी तो नही कि बस हवाओं से सहारे उडे और किसी पेड पर उलझ जाये?
- २/३ साल पहले IIFM में सुने एक व्याख्यान से

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