कल उन्मुक्त जी की इस चिट्ठी पर बडी दिलचस्प चर्चा पढने को मिली। एक तो वो दिल्ली में उनकी पसंदीदा किताबों की दुकान बुकवार्म बन्द होने से दुःखी थे और दूसरे अन्य किताबों की दुकानों पर सही माहौल ना होने को लेकर भी व्यथित थे। पढने का चलन कम होने के अलावा,टिप्पणियों में इस बात को लेकर चर्चा थी कि शायद निकट भविष्य में किताबें और अखबार छपना ही बन्द हो जायेंगे। सब कुछ electronic प्रारुप में मौजूद होगा।
पढने का चलन कम हो गया है इस बात से मैं इत्तेफाक नही रखता। चाहे वो किताबें हों या अखबार…अपने मूल रूप में (e-प्रारूप नही)। टी वी के आगमन को भी पढने के युग का खात्म बताया गया था। न्यूज चैनल अखबारों को खा जायेंगे,ऐसे कयास भी लगाये गये थे लेकिन ऐसा हुआ नही। पिछले १५ सालों के ट्रेन्ड पर नज़र डाली जाये,तो अखबारों ने अपनी प्रसार संख्या में जिस स्तर पर वृद्धि इस दौरान की है, उतनी शायद पहले कभी नही हुई। चाहे वो अंग्रेजी का टाइम्स आफ इण्डिया हो, अथवा हिन्दी के दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण। हाँ, यह जरूर है कि इन लोगों की मार्केटिंग जबरदस्त रही इस दौरान। वहीं किताबों में भी हैरी पाटर जैसी पुस्तक ने अपार सफलता इसी दौर में अर्जित की है। किताबों की दुकानों की श्रृंखलाएं मसलन क्रासवर्ड और लैण्डमार्क भी इसी समय अस्तित्त्व में आए हैं..हाँ उनका प्रारूप और माहौल चर्चा का मुद्दा हो सकता है।
कागज की अनुपलब्धता और मंहगाई, नेट पर सस्ते में अथवा मुफ्त में ई पुस्तकों की मौजूदगी आदि अपनी जगह हैं लेकिन मुझे नही लगता कि निकट भविष्य में ये कारण छपी किताबों का अस्तित्त्व खतम कर देंगे। और फिर जो मजा किताब के पन्नों की गंध में है वो भला कम्प्यूटर स्क्रीन के पिक्सेल्स और रेजोल्यूशन में कहां?
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इंडियन एक्सप्रेस में मार्च में छपा ये लेख बताता है कि वर्तमान में सुरेन्द्र मोहन पाठक के नये उपन्यास के पहले संस्करण की ५०,००० प्रतिया छपती हैं। जिन्होने सुरेन्द्र मोहन पाठक का नाम नही सुना उनके लिये- पाठक साहब हिन्दी जासूसी उपन्यास लिखते हैं, जिन्हे पाकेट बुक्स कहा जाता है और वे आज के दौर में इस श्रेणी के टाप के लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साल में ४-५ उपन्यास निकलते हैं उनके, कीमत ४० रुपये के करीब। लुगदी कागज पर छपने वाले ये उपन्यास आपको उत्तर भारत के किसी भी शहर (विशेषकर रेलवे स्टेशन और बस अड्डे)में उपलब्ध हो जायेंगे। (हाल में खबर आई है कि जल्द ही ये उपन्यास सफेद कागज पर भी आने वाले हैं)|
अपने हर उपन्यास के पहले संस्करण की पचास हजार प्रतियां शायद किसी भी हिन्दी लेखक के लिये सपना हो। कितना भी रोना रो लिया जाये कि हिन्दी पढने वाले पाठक तो हैं ही नही, हिन्दी में तो कोई किताब खरीदना पसन्द करता ही नही,पर यह सवाल भी अपने जगह पर है कि एक आम आदमी को आसानी से समझ आने वाला और विशुद्ध मनोरंजन करने वाला लेखन हिन्दी में होता कितना है? “हिन्दी के कर्त्ता धर्त्ता ” शायद इन उपन्यासों को देख कर नाक भौ सिकोडें और इन्हे दोयम दर्जे का मानें, लेकिन एक आम पाठक, जिसे विशुद्ध टाइमपास और मनोरंजन चाहिये, की पठन पिपासा यही उपन्यास शान्त करते हैं। इनके पाठक वर्ग में पढे लिखे वकील और प्रोफेसर से लेकर रात को गली में जागरण करने वाला चौकीदार तक होता है।
यह पाठक वर्ग बिना किसी मार्केटिंग के पिछले २०-२५ सालों में बना है…पर ये इस संभावना को जरूर इशारा करता है कि हिन्दी का कितना बडा पाठक वर्ग मौजूद है और हिन्दी में किताब लिखने की कितनी संभावनाएं है…जैसा कि मैने अपने पिछले लेख में लिखा था।


आपकी इस बात से सौ फीसदी सहमत हूं कि यदि हिंदी में भी कुछ हल्का-फुल्का मनोरंजक साहित्य लिखा जाए और अच्छी मार्केटिंग हो तो हिंदी के भी दिन फिर जाएं…..पर हिंदी के साहित्यकारों ने खुद को एक किले में कैद कर रखा है जिसके अंदर झांकना भी एक आम पाठक को बहुत मुश्किल नजर आता है….हिंदी को पाठक से दूर करने के लिए हिंदी साहित्यकार ही जिम्मेदार हैं…..वर्ना आज जहां हर जगह हिंदी पैर पसार रही है तो यही क्यों अपना रोना लिये बैठे रहते हैं
हमने तो अपने कालेज के टाईम में सबको पढने का प्रयास किया था कि कोई छूट न जाये । सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर रीमा भारती तक सब पढे लेकिन दिन अगर किसी ने जीता तो वो “वेद प्रकाश शर्मा” हैं । पहली बार उनका “मिस्टर चैलेन्ज” पढा और पढते ही रह गये ।
पिछली भारत यात्रा पर बडा अफ़सोस हुआ जब पूरे हजरत निजामुद्दीन पर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास नहीं मिला, और वेद प्रकाश शर्मा से मिलते जुलते नामों के घटिया उपन्यास बिक रहे थे ।
भाइओ मेरा प्रकाशित उपन्यास भी पढ़े !
http://hindibharat.wordpress.com/
पुरानी बातें है नितिन साहब. कोई ज़माना था जब सुरेन्द्र मोहन पाठक के साल में पांच उपन्यास छप जाते थे और हर उपन्यास का पहला प्रिन्ट रन 1 लाख से ऊपर होता था. किसी समय में इलाहाबाद में बैठे पब्लिशर के हिन्दी उपन्यास का पहला प्रिन्ट रन दो लाख पचास हजार होता था.
चार सौ पेज की किताब को चालीस रुपये में दे पाना बहुत मुश्किल है. प्रकाशक को 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक की छूट भी देनी होती है. मरता हुआ व्यवसाय है ये. कौन खरीदता है किताबें? थोड़ी सी किताबें सिर्फ रेलवे स्टेशनों पर बिक पाती है. बाकी दुकाने सब बन्द होती जा रहीं हैं. लुगदी कागज पर उपन्यास छापने का गढ मेरठ था लेकिन एक एक करके सब अपनी दुकान बढ़ा गये.
साल में चार पांच उपन्यास लिखने वाले सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब का इस साल अब तक सिर्फ एक उपन्यास “आठ दिन” आया है. दूसरा उपन्यास जो जून में आने वाला था अगस्त तक आ जाये तो बहुत समझिये. अब सिर्फ सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास बिक पाते हैं क्योंकि उनकी बहुत बड़ी फैन फोलोइंग है, बाकी के कितने बिकते हैं?
सुनने में बुरा लगता है लेकिन कागज पर छपी किताबों के दिन हवा हुये जा रहे हैं. कुछ सालों बाद जो इक्का दुक्का छपा करेंगी वो सिर्फ दिखाने के लिये होंगीं और उनकी जगह किसी पढवैया के घर में नहीं बल्कि दिखावट के लिये होगी.
यह मैथिली जी का कमेण्ट तो सुन्न करने वाला है। हम तो सोचते थे लुगदी साहित्य तो बिक रहा है धड़धड़। पर वहां भी गिरावट। लोग फिर कर क्या रहे हैं – रियाल्टी शो देख रहे हैं?
मैं अन्तरजाल पर छोटे मोटे लेख पढ़ लेता हूं पर पूरी किताब पढ़ने में मुश्किल होती है। शायद पुराने ज़माने का हूं। मैं तो किताबों पर ही निर्भर रहूंगा आने वाली पीढ़ी के बारे में नहीं कह सकता।
मैथिली जी की बात में दम है।
पुस्तकों के पाठकों की संख्या घटने के कई कारण हैं। जब हम बच्चे थे तो टीवी का चलन नहीं था, मनोरंजन या ज्ञानवर्धन के लिये पुस्तकें या पत्रिकाएं ही एकमात्र विकल्प थीं। पहले हर कस्बे में पुस्तकालय हुआ करते थे, अब ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे। आज के तथाकथित महान साहित्यकारों को पढ़ने का मतलब है कि पढ़ो भी गाली भी खाओ कि ठीक से समझा नहीं। इनका वश चले तो कबीर व प्रेमचंद जैसे कालजयी साहित्यकारों को भी अपनी जागीर बना डालें और मुनादी करा दें कि पढ़ने से पहले हमसे पात्रता का प्रमाणपत्र ले लो।
आज मैंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के विख्यात प्रहसन ‘अंधेर नगरी’ को फिर पढ़ा। है आज की कोई रचना उस टक्कर की?
मैथली जी द्वारा दिये गये आंकड़े चौंकाते हैं. मैं भी अब तक उसी भ्रम में पल रहा था जो आपका है. मुझे तो यह भी ज्ञात न था कि मैरठ से इस तरह के प्रकाशन विदा ले रहे हैं. कितने ही घोस्ट राईटर्स की रोजी रोटी वहीं से चला करती थी.
नेट पर नावेल पढ़ना अभी भी वो मजा नहीं देता जो किताब से पढ़ने में है. मैं अक्सर पीडीएफ में प्राप्त नावेल भी प्रिन्ट करके पढ़ता हूँ हालांकि यह पर्यावरण के प्रति अपराध है मगर न जाने क्यूँ, यह अपराध किये जा रहा हूँ.
ये नहीं कि आजकल पुस्तक पढ़ने वालों की इच्छा रखने वालों की संख्या कम हो गई है। पर आजकल इतने साधनों के बीच एक अच्छी पुस्तक के लिए समय दे पाना लोगों को कठिन हो गया है। लिहाजा हल्के फुल्के साहित्य का चलन ज्यादा हो रहा है जो वाजिब कीमत पर सही मनोरंजन दे पा रहे हैं।
I feel that people will not stop reading..only the channel of communication would vary (paper books, electronic versions, handwritten docs etc). people will start preferring more convenient mode of communication. As people are getting more accustomed to the electronic gadgets like comps, laptop,mobiles etc it is obvious for them to switch to electronic mode of communication. But it can never wipe of the paperback versin. For example: Theatres and cinema halls dont get closed because movies are available on cds and dvds. they innovated themselves in form of multiplexes, shopping malls, etc to cater to the today’s population. In the same way, printed formats of literature wud have to adapt themselves to the current requirements of masses to keep their existence float.
yaar hamein kuchh hindi ke lekhkon ke naam aur bata dijiye.. agar email kar sakein to bahut meherbani hogi.
विश्व में पुस्तकें पढ़ने वालों की संख्या घट ही रही हो ऐसा नहीं है । पर अपने देश की कथा ही कुछ और है । अपने यहां जो थोडा़ संमृद्ध हैं और अंग्रेजी लिख-पढ़ सकता हैं वे प्राथमिकता के आधार पर अंग्रेजी की पुस्तकें ही पढ़ते हैं । भला जो पेट भरने की जुगत भी न कर पा रहे हों वे किताबें क्या पढेंगे ! यह तो सुविख्यात है की स्तरीय शिक्षा अंग्रेजी स्कूलों में होती है । स्तरीय पुस्तकें अंग्रेजी में छपती हैं । यहां तक कि टीवी चैनलों पर स्तरीय परिचर्चायें भी अंग्रेजी में ही होती हैं, बस हा-हा हू-हू वाले कार्यक्रम भरतीय भाषाओं में रहते हैं । पढे़-लिखे लोगों के बीच भी सरकारी समीक्षा बैठकें अंग्रेजी में होती हैं । तब भला हिन्दी का सवाल कहां रह जाता है ? दुनिया के प्रमुख देशों में जहां अंग्रेजी के प्रति हमारी जैसी दीवनगी नहीं है वहां के लोग अपनी-अपनी भाषाओं में पुस्तकें पढ़्ते हैं और तब वहां लोग लिखते भी हैं । सोचिये, चीन में कितने लोग अंग्रेजी साहित्य रचते हैं, या फिर रूस में या फ़्रान्स में ? यह सब तो आप इसी से समझ सकते हैं कि सभी देशॊं में उपभोक्ता ओस्तुओं से संबंधित जानकारी वहीं की भाषाओं में छपी रहती है, इसराइल जैसे छोटे देश में भी जहां की आबादी ५० लाख भी नहीं । पर अपने यहां तो सब अंग्रेजी में ही चलता है । फिर पुस्तकों के मामले में कुछ और कैसे होगा ? — योगेन्द्र
भुवनेश जी, नीरज जी, विजय राज जी, मैथिली जी, ज्ञानदत्त जी, उन्मुक्त जी, अशोक जी, समीर जी, मनीष भाई, मुकुल, अनाम एवं योगेन्द्र जी – आप सबका टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आप लोगों के टिप्पणियों से और भी कई पहलुओं को जानने का मौका मिला।
मैथिली जी, पाठक साहब के उपन्यास का प्रिन्ट रन एक लाख होता था, ये जानकारी मेरे लिये नई है।शुक्रिया। लेकिन यह सवाल अब भी अपनी जगह है कि हिन्दी में ऐसे लेखक कितने हैं? लोग नही खरीदते कह देना आसान है पर ऐसा कुछ क्यों नही छपता, ऐसी मार्केटिंग क्यों नही होती जो लोगों को खरीदने पर मजबूर कर दें?
४० रुपये की किताब लोगों को महंगी लगती है…सिनेमाघर में पानी की बोतल के २५-३० रुपये वसूल लिये जाते हैं और लोग आराम से दे देते हैं…क्योंकि वो फैशन का हिस्सा बन गया है। हिन्दी किताबें फैशन का हिस्सा क्यों नही बन सकतीं और इन्हे ऐसा बनाने की कोशिश क्या कभी हुई है और अगर नही तो कौन करेगा…ये सवाल उठाना मेरा मूल मकसद था। फिर चाहे किताब कागज पर छपे या बिट्स और बाइट्स पर…
अशोक जी, आपक कहना सही है, किताबों की उपलब्धता भी एक बडा मुद्दा है। मुझे तो स्टेशन के A H Wheelers ही दिखाई देते हैं। हालांकि लैण्डमार्क और क्रासवर्ड की बात मैने अपने लेख में की है..पर वो हिन्दी पुस्तकें नही रखते।
मुकुल, योगेन्द्र जी- आप दोनों की सोंच से सहमत हूं।
अनाम जी- कुछ नाम/ई मेल छोड जाते तो शायद लोग कुछ मदद कर पाते आपकी। हिन्दी की कुछेक किताबें पी डी एफ प्रारूप में नेट पर मौजूद हैं। लिंक इस चिट्ठे के साइडबार से मिल जायेगा।
pata nahi kitna sahi hai ye sab..
par pichle 25 saalo se to mai pathal ji ko pad raha hoo.
nitin bagla ji kya aap wahi hai, jiska ki zikra patahak ji apne sampadkiya me karte rehte hai?
पाठक के पाठक तो बहुत हैं, लेकिन हिंदी के पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है. भारत के शीर्ष दस अखबारों में मात्र एक अंग्रेजी का है, वह भी दसवें स्थान पर,
हिंदी की पाठक संख्या करोड़ों में है.
रही सुरेन्द्र मोहन पाठक की बात, तो भाई, मैं भी उनका फैन हूं. उनसे एक बार मिला भी हूं, एक पत्रकार (क्राइम रिपोर्टर) होने के नाते अब कम समय मिलता है, लेकिन मिलता है तो उनकी किताब खोज कर जरूर पढ़ता हूं.
अन्य लेखक तो उनके आसपास नहीं ठहरते.
वेद शर्मा की एक-दो (सभी दिवाने दौलत के….) अच्छी थीं….
I do not agree the Hindi is dying. I myself a fan of SMP and we have a fan club with the name of Surendra Mohan Pathak on orkut.
The problem is that the quality is sying. Vardi Wala Gunda of Ved Prakash sharma was the first novel which crossed 1 million mark in first print but after that the quality is going down and down just because more no of Novels in a year.
So I prefer to read the Novel of a writer who writes less but writes unique. I do not know if you all are aware , the last three Novels of Surendra Mohan Pathak has been published on White paper rather then Lugdi paper and the cost was 60 rupees. Still it was a hit and only his novels are coming on white paper and the plan is to convert some old hits also on white paper.
He is also the first whom Novel 65 lakh ki dakaiti will be translated and published this month with the name of 65 lakh heist in English.
So it is not about the language, it is the quality !!!
Makarand ji kya apke paas pathak ka phone no. or email id hai ?
Pathak ke fan kayi journalist hai, Jo unko sunil ki kargujariyon par valuable tips de sakte hai.
Maine pathak ki adhikansh kitab parhi hai, sachmuch achha likhate hai.
No I do not have his Phone no and he dont use e mails. But you can find him in the press club in Delhi almost everyday evening. I also met him there.
I AM AN ABOUT TO DIE FAN OF SMP, IT IS SO BECAUSE I TRIED TO FIND HIM IN EVERY NOOK AND CORNER BUT WAS LEFT IN VAIN. ANYWAY, I HOPE THAT I WILL BE ABLE TO GET HIM THERE……
THE STYLE, THE PASSIONS, THE QUOTES, THE FEATURES, THE CHARACTERS, THE EMOTIONS, INHERENT ARE ALL UNIQUE.
MAY HE LIVE LONG WITH THE BEST OF HIS HEALTH TO GIVE US MORE AND MORE OF HIS LOVELY NOVELS.
CORDIALEMENTS.
All SMP lovers go to orkut and join the community Surendra Mohan Pathak. it is his fan club.
i am also fan of SMP and creat a blog on SMP.surendraji is my favorite writter since my school time.you all fan can join the blog and put your views.
My best Book is jit app ke hogi
After a long gap I found this site and saw comments. Pathak use to visit Delhi press club is a good news for me and I will try to contact him there.
I am a regular ……of Kolkata press club.
Thanks for comments
Lokenath
Fogot to thank makrand ji….sorry
Read pathak ji ka latest NAQAAB the story is too similar to perry mason–the case of the counterfeit eye by earl stanley gardner