द थ्योरी आफ “कूडे का ट्रक”
May 2, 2008 by Nitin Bagla
सुबह सुबह किसी बात पर मूड खराब हुआ तो यह “कूडे के ट्रक वाला सिद्धांत” याद आ गया। कुछ दिन पहले एक ई पत्र में प्राप्त हुआ था। सार कुछ इस तरह से है।
क्या आप एक खराब ड्राइवर, किसी अभद्र कर्मचारी, किसी बदमिजाज दुकानदार के चक्कर में अपना दिन खराब कर लेते हैं? सडक चलते आपसे किसी ने कुछ कह दिया, कोई दुकानदार बद्तमीजी से पेश आया, रेस्तरां में गये और सर्विस अच्छी नही हुई आदि आदि? एक अच्छे/सफल इन्सान का गुण यह है कि वह किस तरह से ऐसी गैरजरूरी बातों को नज़रअंदाज करके अपना ध्यान जरूरी कामों पर लगाये। कूडे के ट्रक का सिद्धांत कहता है कि -
“कई लोग कूडे से भरे ट्रक की तरह होते हैं। वे अपने साथ साथ क्रोध, भय, घृणा, नैराश्य का कचरा अन्दर में समेटे चलते हैं। जैसे जैसे यह कचरा उनके अन्दर भरता चला जाता है, उन्हे इसे कहीं फेंकने की जरूरत महसूस होती है। ठीक कचरे से भरे ट्रक की तरह। हो सकता है बदकिस्मती से आज आप उनके रास्ते में आ गये और उन्होने इसे आपके ऊपर फेंक दिया।
तो अबकी बार कोई अपना कचरा आपके ऊपर इस तरह फेंके, तो इसे दिल पर मत लीजिये। सामने वाले पर तरस खाइये। मुस्कुराकर उसे नजरंदाज कीजिये और खुश रहिये। आप ज्यादा अच्छा और प्रसन्न महसूस करेंगे। और हाँ, ये भी देखें कि कितनी बार हम अपना गुस्सा दूसरों पर उतारते हैं और कचरे के ट्रक की तरह बर्ताव करते हैं।”
ई मेल में इसके रचियता का नाम था, David J Polly. थोडा गूगल किया तो पता चला कि “The Law of Garbage Truck” डेविड साहब का ट्रेड मार्क है। वे एक ख्यातनाम वक्ता और लेखक हैं। कचरे के ट्रक वाली कहानी विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं, अंग्रेजी में। इस पर एक वेबसाइट भी है। यहाँ और यहाँ डेविड साहब के ब्लाग भी हैं।
सिद्धांत सुनने में अच्छा लगता है ना। भारतीय दर्शन पर नज़र डालेंगे तो हमारे यहां इस तरह का दृष्टांत भगवान बुद्ध के प्रेरक प्रसंगों में मिलता है। जब एक व्यक्ति बुद्ध को खूब गालियां देता है पर वो जरा भी विचलित नही होते। शिष्य के पूंछने पर उसे समझाते हैं कि भई जब वो गालियां मैने स्वीकार ही नहीं कीं तो वो तो उसी के पास रही ना। मुझे लगी ही नही। मुझे उससे क्या फर्क पडता है।
सो नया तो कुछ भी नही है, बचपन से पढते आ रहे हैं, जीवन में उतार सकें तो बात बने।

IIFM hostel mein to tum waste room mein hi phek deta tha
uske piche kaun sa garbage theory tha
बहुत कुछ हम कूड़े के ट्रक में ड़ाल देते हैं। फिर भी बहुत कुछ शेष रह जाता है। अब उसे भी डाल दिया करेंगे।
सही है.
kosis hi ki ja skti hai hm jaise sadhran log itna uncha uth paye tb n
वाह, आपने तो सोचने को मसाला दे दिया। कचरे का ट्रक! बहुत रोचक कांसेप्ट!
बढिया कांसेप्ट!
काश!
कुछ सालों पहले यह सिद्धान्त पता चल जाता। बहुत बढ़िया सिद्धान्त है.. अमल में लाने की कोशिश करते हैं।
धन्यवाद नितिनजी
मैं तो लंबे समय से इस स्थापना को मानता रहा हूं ।
इन महोदय ने कोई नई बात तो नहीं कही ।
आप ही देखिए हमारे समाज में आसपास नकारात्मकता के ऐसे भंडार चारों तरफ चलते फिरते नज़र आएंगे ।
अगर आप उनके सामने भी पड़े, तो समझिये आप नेगेटिविटी के नए कैरियर बन गये ।
ऐसे लोगों से सदा बचना चाहिए ।
दिव्य दर्शन जीवन का..जीवन में उतारने लायक. बहुत बढ़िया पोस्ट. बिल्कुल सही.
क्या करें,इन्सान हैं हम.कभी हम कचरे का ट्रक बन जाते हैं और कभी कोई ट्रक अपना कचरा हम पर उंडेल जाता है.वक्त वक्त की बात है.
Bandhu,
Mukul ne sahi sawal uthaya hai, aise as a sufferer I should have riased that questiom to both of you…..
on a serious note the stress & the pressure which is faced in the modern times makes us aggressive, impatient. I dont agree that that some people are filled with all that but its the contributions from the external environment, society which builds up slowly in a individual. Some people are able to hide it behind a fasad others vent it out….
sounds neat funda. Its correct in many ways, people keep holding on to their anger, despair and hurt close to their heart creating a ‘hurt body’ and this keeps increasing on daily basis. Instead one needs to create a ‘bliss body’ accumulating million small happiness which comes our way and deflect the harmful thoughts