बेटा…बडे होकर क्या बनोगे?
April 24, 2008 by Nitin Bagla
पिछली दो पोस्ट्स में मैने बचपन की कुछ बातें लिखी थीं..मसलन बचपन के टोटके और बचपन की तमन्नाएं। एक और चीज़ जिस पर मैं लिखना चाहता था वो थे..बचपन के डर और चिन्ताएं। पर लिखते लिखते रह गया। कारण यह, कि अगर सबको पता चला जाता कि मैं बचपन में रात में अकेले घर की छत पर या बगीचे में जाने से डरता था या रात को पापाजी पान लाने भेजते थे तो मुहल्ले की अंधेरी गली, एक सांस में फर्राटे से दौडते हुए पार करता था तो कितनी इन्सल्ट होती ना मेरी। बहादुर बच्चे भी भला कहीं डरते हैं? नही ना। इसीलिये मैने किसी को नही बताया। खैर…डर नही, लेकिन बचपन की एक बडी चिन्ता आपके साथ बांटते हैं, वो ये ..कि बेटा बडे होकर क्या करेंगे?
बडे होकर क्या करेंगे/बनेंगे…ये अपने लिये सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय हुआ करता था। एक समय था, शायद ७-८ साल की उम्र में, जब में अपने आसपास लोगों को काम करते देखता और बस यह तुलना किया करता था कि मैं यह काम कर पाऊंगा या नही। जो काम करते हुए देखता था वहां अपने आप को फिट करता था..और पता चलता था कि इनमें से शायद कोई भी काम नही कर पाऊंगा। कुछेक बानगी…
- सब्जी वाला नही बन सकता…मुझे तराजू से तौलना नही आता।
- दर्जी नही बन सकता…नाप लेना नही आता, सिलना भी नही आता।
- ड्राइवर नही बन सकता…गाडी तो क्या साइकिल भी नही चला पाता। और मुझे तो रास्ता भी याद नही रहता।
- अपनी कपडे दुकान पर भी नही बैठ सकता…ना तो मुझे कपडा नापना और काटना आता..और ना ही इतने सारे कपडों के दाम याद रहते।
- कारीगर नही बन सकता…प्लास्तर करना और पत्थर काटना नही आता।
- नाई की दुकान नही खोल सकता..बाल काटना भी नही आता।
बोले तो, हर जगह असफलता। सोंचिये…कैरियर का कित्ता बडा सवाल मेरे आगे मुँह बांये खडा था..और कोई काउन्सलिंग नही।
खैर, ये सवाल तो अपने आप से थे, सो जवाब दें, या ना दें..सब चलता था। लेकिन स्कूल आकर यह समस्या और बढ गई। मास्टर जी कक्षा में पूंछे, तो भी ये बडा भारी प्रश्न हुआ करता था। मास्टर जी कक्षा में आयेंगे…और सब बच्चे एक एक करके बतायेंगे कि वो बडे होकर क्या बनेंगे। टीचर जी को तो खुश रखना भी जरूरी था (ये काम हमें बचपन से आता था), तो अलग अलग समय पर, अलग अलग अध्यापक जी को ध्यान में रखते हुए हम तरह तरह के जवाब देते थे
- सर, सबसे पहले तो मैं इस देश का एक अच्छा नागरिक बनना चाहूंगा। (तालियां-तालियां)
- मैं तो अध्यापक बनूंगा..आप की तरह। (एक एक को मुर्गा बना दूंगा)
- राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री बनूंगा- जी हाँ…कहने में अपना क्या जाता है।
- डाक्टर-इंजीनियर-वैज्ञानिक, गणित अथवा विज्ञान की क्लासानुसार- ये जवाब थोडा बडे होने के बाद पकडे और फिर इन्हे ही पकडे रहे।
ये तो हुई बचपन की बात। लेकिन जरा गंभीर होकर सोंचे, तो क्या हम बडे होने के बावजूद भी कभी अपनी मर्जी यह तय कर पाते हैं कि हमें क्या बनना है अथवा क्या करना है? क्या यह सोंच लेने के बाद , कि मुझे यह करना है, हम वो सब कर पाते हैं। सोंचियेगा, क्या हम आज वही कर रहे हैं जो हमने हमेशा से करने का सोंचा था? (अगर सोंचा था तो)। या फिर हालात,परिस्थितियों से लडते भिडते आज जहां हैं वहां पहुंच गये हैं किसी तरह और बस जमें हुए हैं वहीं पर?
और हाँ, जो हम नही कर पाये, वो बच्चों सें अपेक्षा कर ही सकते हैं। अच्छा चिन्टू बेटा…अंकल को बताओ तो बडे होकर क्या बनोगे!!!

मैं अच्छा आदमी बनना चाहूंगा, बना कि नहीं मालुम नहीं।
मुझे आज भी याद हे जब मुझ से कोई पुछता था बडा हो कर कया बनॊ गे ? तो मेरा जवाव झट से होता था….डाकू
फ़िर पुछा जाता था, अरे डाकू क्यो तो मे कहता था मे अमीरो को ळुट कर गरीबो मे बाटुगां. डाकू तो नही बना, पर जो भी बना उस मे खुश हू
अति सत्य वचन बन्धु !
बचपन की यादे ताजा कर दी बन्धु ! आज भी याद है कि हम भी कहा करते थे कि डाक्टर बाबू बनना है बडा होके !
पर नही बना !
[:)]
राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री बनूंगा- जी हाँ…कहने में अपना क्या जाता है।
ईस विषय पर निबन्ध लिखते समय कई बार राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री बन चुका हूँ ! हाहाहाहा !
अभी आपने मुझे मेरे चिट्ठे पर जो सलाह दी है उसके लिये धन्यवाद.. मैंने पहले ही उस पर गौर करके ही ये वाला पोस्ट डाला था.. कल जब मैं आफिस छोड़ रहा था तब मैंने अपने प्रोजेक्ट लीडर से कहा की मैं इस पर अपने ब्लौग पर कुछ लिखने जा रहा हूं.. और उसे कोई ऐतराज नहीं था..
कुछ सालों पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आता था जिसका शीर्षक गीत कुछ ऐसा था “क्या बनोगे मुन्ना मम्मी कहती बनो डाक्टर पापा कहते इंजीनियर” इसकी याद दिला दी आपने!
वैसे एक अच्छा इंसान बनने का प्रयास जारी है।
उन्मुक्त जी, राज जी, रजनीश भाई, प्रशांत, नितिन जी - आप सबको टिप्पणी के लिये धन्यवाद।
अच्छा इंसान बनने की कोशिश मैं भी कर रहा हूं।
प्रशांत-आपकी टिप्पणी का जवाब आपके चिट्ठे पर दिया है।