झूले में बैठने का मन है? आइये आपको हैदराबाद में “राजस्थानी हवाई झुल्ला” में सैर करवाते हैं।
गेट पर लिखा हुआ है “शराब पिके झुले पर बैठना मना है।” यार शराब पिके झूले पे कोई क्यों पैसा बरबाद करेगा… पीकर तो आदमी का दिल, दिमाग ,जिस्म सभी कुछ झूमता और झूलता ही रहता है
। ऐसा लिखना चाहिये, “या तो झूले पर बैठो, नही तो शराब पियो”
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और ये झूले के एकदम ऊपर से मेले का दृश्य (दांयी ओर मौत का कुआ दिख रहा है, बांयी और जो नही दिख रहा वहां अन्य प्रकार के झूले, गाडियां आदि थीं)
बचपन में झूले में बैठने में बहुत डर लगता था। अब नही लगता। सच्ची
। इस समय हमारे गांव में भी मेला लगता है। महाशिवरात्रि से शुरू होता है, अभी चल ही रहा होगा। ये लोहे के बडे झूले तो बाद में देखे, शुरुआती यादें लकडी के झूलों की हैं जिन्हे आदमीं खींचा करते थे। चकडोलर कहते हैं हमारे यहां उन्हे।चर्र चर्र आवाज करते थे चलते समय। टाकिज भी आता था है मेले में पर मैने आज तक नही देखा। सच्ची।
और ये है “नींबू, कैरी, धनिया, पुदीना, टमाटर एवं अन्य मसालों” से भरपूर, चना मसाला। खाया नही, बस फोटो लिया। गांव में मेले की फेमस चीज गोंद के पापड हुआ करती थी, अभी भी चांस लग जाये तो नसीब हो जाते हैं। कल गये थे मेले में घूमने। यहां नेकलेस रोड पर। आप भी फोटो देख कर खुश हो लीजिये।






चकडोलर में झूलने का तो बहुत मजा आता था.. उन दिनों मात्र दस पैसे में दस पन्द्रह मिनिट तक इतनी तेजी से झुलाते थे कि इलेक्ट्रोनिक डोलर भी उनका क्या मुकाबला करे।
झुलाने वाले पसीने से नहाये हुए होते थे। एक बैच पूरा होते ही दूसरे की तैयारी शुरु हो जाती थी। उनकी हालत सोच कर अब बहुत तकलीफ होती है।
हो लिये खुश..
धन्यवाद.
Bhai,
Kiske saath gaye the mele ghumne???
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