जब मैं छोटा बच्चा था…
March 31, 2008 by Nitin Bagla
पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा था जिन्हें अब याद करके भी हँसी आती है। टिप्पणियों में एक-दो टोटके और पता चले…शायद ‘जनरेशन गेप’ के चलते हमारे बचपन तक वो विलुप्त हो चुके थे :)। सोंचते सोंचते कुछ और बाते ध्यान आ गईं। इस बार वो चीजें जिनकी बचपन में शिद्दत से ख्वाहिश होती थी। कुछ ऐसी चीजें जिनको पा लेनी की इच्छा कभी कभार सनक की हद तक होती थी..लेकिन अपना बस नही चलता था। ना मिलने पर मन मसोस कर रह जाते थे..और सोंचते थे कि बडे होकर ये सब चीजें जरूर हासिल करेंगे। बडे तो हुए…पर ख्वाहिशें भी उम्र के साथ साथ बदल गईं।
हर बच्चे की तरह कामिक्स अपनी भी फेवरेट हुआ करती थी। पर मांग और आपूर्ती का अनुपात जरा गडबड था। पापाजी कामिक्स के सख्त खिलाफ। सो घर पर कामिक्स यदा कदा ही उपलब्ध होती थी। हास्टल जाने के बाद वहां किसी तरह कुछ मिल जाया करती थी..। पर गर्मी की छुट्टियों में एक-एक कामिक्स किराये पर लाने के लिये बहुत जिद और चिरोरी करनी पडती थी। कभी कभार ही सफल होते थे और अठन्नी मिल भी गई तो उससे मिली कामिक्स १५ मिनट में खतम। हम सोंचते..क्यों हमारी कपडे की दुकान हैं…काश हमारी भी कामिक्स की दुकान होती। जिसकी कोई कामिक्स की दुकान होती या जिन बच्चों के घर वाले उन्हे आसानी से कामिक्स दिला देते वे हमारी ईर्ष्या के पात्र हुआ करते थे। । हां,बाल पत्रिकाएं चंपक,नंदन और बालहंस कभी कभार मिल जाया करती थीं..पापा बाहर जाते तो जरूर लाते थे और गीता प्रेस के साहित्य का तो भंडार आज भी है घर में। इसके अलावा नवोदय विद्यालय में हमारे पुस्तकालय में अमर चित्रकथाएं भी खूब सारी थीं।
कामिक्स जैसी ही हालत अपनी पतंग के मामले में थी। पतंगे हमारे यहां गर्मियों की शामों में उडाई जाती हैं और बजाय मैदानों के, अपने घर की छत से उडाई जाती हैं। और हमें कभी पतंग नही दिलवाई जाती। गिर जाओगे छत से..बस। हां, अगर कोई पतंग कट कर छत पर आ गई तो ठीक..पर मंजा कहां से लाओगे? अपना सपना हुआ करता था कि काश घर की छत पर खूब सारी पतंगे कट कर गिरें (जितनी भी पतंगें कटें.. हमारी ही छत पर गिरें)। पतंग उडाना कभी नही आया, आज भी नही आता।
एक और चीज जिसकी बचपन में जब्बरजस्त ख्वाहिश हुआ करती थी वो थी कोई जादूई शक्ति। कुच्छ भी मिल जाये। कोई गायब कर देने वाली जादुई टोपी,या करामाती कोट,या कोई घडी। या कोई ऐसा यंत्र जिससे हम दूसरों के मन की बात पढ लें। ये तो नही बताऊंगा कि गायब होकर क्या क्या कर सकने के ख्वाब देखा करते थे
…पर ये जिन्दगी में सब कुछ पा लेने जैसा था। इनसे संबंधित कई सीरियल /फिल्में उस समय दूरदर्शन पर देखीं जिनमें किसी बच्चे को कोई जादुई शक्ति मिल जाती थी। सोनी टी वी के शुरुआती दिनों में I Dream of Jeanie नामक एक अंग्रेजी टू हिन्दी डब्ड सीरियल आया करता था,जिसमें जीनी पलक झपकते ही कुछ भी कर देती थी…आज भी ये धारावाहिक बहुत याद आता है।
खेलने की चीजें अन्य चीजें थी गेंद,चपटे पत्थर, चूडियों के टुकडे और भी पता नही क्या क्या। चपटे पत्थरों से हम पव्वा खेलते थे…अलग अलग जगहों पर इस खेल अलग अलग नाम हैं…जमीन पर छः सात खांचे बना कर खेला जाता है। (वैसे ज्यादातर लडकियां खेलती हैं)। चूडियों के टुकडों से भी हम एक खेल खेलते थे जिसमें जमीन पर चाक से बनाये एक गोल घेरे में चूडियों के छोटे छोटे टुकडे डाल दिये जाते थे और इन्हे एक बडे टुकडे की सहायता से निकालना होता था। जब एक टुकडा निकालें तो वो किसी अन्य टुकडे को छूना नही चाहिये। यहां लिखना में इतना रोमंचक नही लगता लेकिन खेलते वक्त शानदार होता था। इसके अलावा गर्मी की छुट्टियों में इमली के बीज इकट्ठे करने का भी बहुत शौक हुआ करता था। इमली के बीजों को हमारे यहां कोमचे कहते हैं। इनसे चंगा-पो नामक खेल खेला जाता था। इमली के बीज को बीच में से फोडेंगे तो ये बराबर दो भागों में बंट जायेगा। बस चंगा-पो की सामग्री तैयार। चाक/बुत्ती से जमीन पर कुछ लाइने बनानी हैं। दो कोमचे फोडे और शुरू। इन कोमचों की पूरी डिब्बी हुआ करती था अपने पास। इनहे खा भी सकते थे..पर सावधान..ज्यादा खा लिये तो द्स्त बन्द हो जायेंगे :)।
बुत्ती की बात किये बिना शायद ये पोस्ट अधूरी रहेगी। स्लेट पर लिखना बुत्ती का Secondary Function हुआ करता था…असल काम तो इसका खाने में और तोड कर खोने में किया जाता था। बत्ती और चाक का स्वाद आज भी बहुत अच्छा लगता है। शायद रोजाना स्कूल जाते समय एक बुत्ती मिला करते थी। पूरी नही खाते थे लिखते भी थे..पर टूटना…गुम होना भी चलता रहता था। हाँ…ये धमकी मिलती रहती थी कि बुत्ती खाओगे तो पेट में कीडे पड जायेंगे….पर कौन कम्बख्त कीडों की परवाह करता है।(वैसे..ये कीडे परेशान बहुत करते थे
)
आपकी भी कुछ ख्वाहिशें हों तो कह डालिये….।

गेंद और चपटे पत्थर के खेल को हम लोग तो भंडा फोड़ कहते थे।
खूब याद दिलाई आपने चूड़ी और इमली के बीज वाले खेलों (चौपड़) की।
हम लोग तो गुट्तक भी बहुत खेलते थे।
बत्ती खाने में तो हम बचपन की परम्परा को आज भी यदा कदा दोहरा लेते हैं. यकीन मानिये,जो स्वाद पथरीली बत्ती खाने में आता था, वो स्वाद तो छप्पन भोग में भी नहीं.सतोलिया,इक्कल-दुक्कल,अष्टा-चन्गा पो भी खूब खेले.ये खेल हमें नानाजी के गांव में बनी सहेलियों ने सिखाये थे.हमने बदले में उनको लूडो और सांप-सीढी से परिचित करवाया.बचपन के गलियारों की सैर करवाने के लिये बधाई.
ममता जी, इला जी- टिप्पणी के लिये धन्यवाद।