<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	>
<channel>
	<title>Comments on: बचपन की हमारी मान्यताएं</title>
	<atom:link href="http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/</link>
	<description>जिन्दगी : सतरंगी रे</description>
	<pubDate>Sat, 17 May 2008 22:10:41 +0000</pubDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=MU</generator>
		<item>
		<title>By: आपने बंदर पपड़ी खाई है कभी? &#171; ॥दस्तक॥</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-3004</link>
		<dc:creator>आपने बंदर पपड़ी खाई है कभी? &#171; ॥दस्तक॥</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 May 2008 12:57:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-3004</guid>
		<description>[...] दिनों नितिन बागला जी ने अपनी पोस्ट में कई सारी ऐसी ही चीजों का जिक्र किया [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] दिनों नितिन बागला जी ने अपनी पोस्ट में कई सारी ऐसी ही चीजों का जिक्र किया [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: बेटा&#8230;बडे होकर क्या बनोगे? &#171; इन्द्रधनुष</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2953</link>
		<dc:creator>बेटा&#8230;बडे होकर क्या बनोगे? &#171; इन्द्रधनुष</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Apr 2008 11:13:58 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2953</guid>
		<description>[...] की कुछ बातें लिखी थीं..मसलन बचपन के टोटके और बचपन की तमन्नाएं। एक और चीज़ जिस पर [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] की कुछ बातें लिखी थीं..मसलन बचपन के टोटके और बचपन की तमन्नाएं। एक और चीज़ जिस पर [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जब मैं छोटा बच्चा था&#8230; &#171; इन्द्रधनुष</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2926</link>
		<dc:creator>जब मैं छोटा बच्चा था&#8230; &#171; इन्द्रधनुष</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Mar 2008 04:34:04 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2926</guid>
		<description>[...] 31, 2008 by Nitin Bagla    पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 31, 2008 by Nitin Bagla    पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जब मैं छोटा बच्चा था&#8230; &#171; इन्द्रधनुष</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2925</link>
		<dc:creator>जब मैं छोटा बच्चा था&#8230; &#171; इन्द्रधनुष</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Mar 2008 18:41:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2925</guid>
		<description>[...] 29, 2008 by Nitin Bagla    पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 29, 2008 by Nitin Bagla    पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Prashant Priyadarshi</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2924</link>
		<dc:creator>Prashant Priyadarshi</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Mar 2008 04:08:16 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2924</guid>
		<description>अजी हम तो अपने कालेज में भी सिक्के को चुम्बक बनाने का ट्राई मार चुके हैं और वो भी तब जब पोस्टग्रैजुएसन में थे.. क्योंकि बचपन में हम ये नहीं कर पाये थे.. ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अजी हम तो अपने कालेज में भी सिक्के को चुम्बक बनाने का ट्राई मार चुके हैं और वो भी तब जब पोस्टग्रैजुएसन में थे.. क्योंकि बचपन में हम ये नहीं कर पाये थे.. <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Nitin Bagla</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2923</link>
		<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 14:39:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2923</guid>
		<description>मिश्रा जी, यूनुस भाई, समीर जी, ज्ञान जी, संजीत जी, मनीष भाई, दिनेश की, इला जी, सागर भाई - टिप्पणी करने और अपनी यादें सांझी करने के लिये शुक्रिया।

ज्ञान जी, आप फिल्म जगत में रुचि नही रखते सो आपकी फिल्मी जी. के. थोडी कमजोर हो गई है। :)  मान्यता संजय दत्त की दूसरी या तीसरी बीवी हैं...हाल ही में शादी की हैं इन लोगों नें और थोडा पंगा भी पड गया है इसमें।  

सागर भाई- सारी मर्यादाओं को परे कर टिप्पणी कीजिये..इसे अपना ही घर समझिये :)  &#124; चाहें तो अपने ब्लाग पर पोस्ट भी लिख सकते हैं।  बंदर की रोटी का सतूना किसी दिन लगता है तो देखते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मिश्रा जी, यूनुस भाई, समीर जी, ज्ञान जी, संजीत जी, मनीष भाई, दिनेश की, इला जी, सागर भाई - टिप्पणी करने और अपनी यादें सांझी करने के लिये शुक्रिया।</p>
<p>ज्ञान जी, आप फिल्म जगत में रुचि नही रखते सो आपकी फिल्मी जी. के. थोडी कमजोर हो गई है। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  मान्यता संजय दत्त की दूसरी या तीसरी बीवी हैं&#8230;हाल ही में शादी की हैं इन लोगों नें और थोडा पंगा भी पड गया है इसमें।  </p>
<p>सागर भाई- सारी मर्यादाओं को परे कर टिप्पणी कीजिये..इसे अपना ही घर समझिये <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  | चाहें तो अपने ब्लाग पर पोस्ट भी लिख सकते हैं।  बंदर की रोटी का सतूना किसी दिन लगता है तो देखते हैं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सागर नाहर</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2922</link>
		<dc:creator>सागर नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 11:57:33 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2922</guid>
		<description>वाह नितिन भाई
 क्या क्या याद दिलवा दिया आपने.. चुंबक तो हमारी भी सबसे पसंदीदा चीजों में से एक  थी और आज २५ साल बाद हर्ष की भी सबसे पसंदीदा है। :)
बहुत सी बातें याद आ रही है, विद्या की पत्ती की जगह हम मोरपंख से भी काम चला लेते थे। बंदर की रोटी को हम बंदर पापड़ी  कहते थे.. मेरे घर के आस पास बहुत से पेड़ हैं, पिछले साल तो श्रीमती जी को सुबह सुबह उठा कर घूमने ले कर जाता था बहाना  घूमने का होता था जबकि मैं तो बंदर पापड़ी खाने ही जाता था। 
आप कभी खाना चाहें तो आ जायें पास में ही है.. आपके घर से शायद ६-७ किमी होगा। 
इलाजी वाला रबड़ भी हम भी बनाया   करते थे,, कभी रंग भी जमाया करते थे, चॉक को पीस कर अलग अलग स्याही और  रंग मिला कर... वाह रे बचपन। 
बहुत सी चीजें याद आ रही है.. टिप्पणी की भी मर्यादा है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह नितिन भाई<br />
 क्या क्या याद दिलवा दिया आपने.. चुंबक तो हमारी भी सबसे पसंदीदा चीजों में से एक  थी और आज २५ साल बाद हर्ष की भी सबसे पसंदीदा है। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
बहुत सी बातें याद आ रही है, विद्या की पत्ती की जगह हम मोरपंख से भी काम चला लेते थे। बंदर की रोटी को हम बंदर पापड़ी  कहते थे.. मेरे घर के आस पास बहुत से पेड़ हैं, पिछले साल तो श्रीमती जी को सुबह सुबह उठा कर घूमने ले कर जाता था बहाना  घूमने का होता था जबकि मैं तो बंदर पापड़ी खाने ही जाता था।<br />
आप कभी खाना चाहें तो आ जायें पास में ही है.. आपके घर से शायद ६-७ किमी होगा।<br />
इलाजी वाला रबड़ भी हम भी बनाया   करते थे,, कभी रंग भी जमाया करते थे, चॉक को पीस कर अलग अलग स्याही और  रंग मिला कर&#8230; वाह रे बचपन।<br />
बहुत सी चीजें याद आ रही है.. टिप्पणी की भी मर्यादा है ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ila</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2921</link>
		<dc:creator>ila</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 07:05:04 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2921</guid>
		<description>एक गाना याद आ रहा है,: बचपन के दिन भूल न जाना- - - - -.
बचपन के दिन कभी विस्मृत नहीं होते, हां ज़िन्दगी की भागमभाग में कहीं छुप जाते हैं. मेरे बचपन के ऐसी ही एक धारणा आप के साथ बांटना चाहती हूं.जब हम प्राइमरी स्कूल में थे, तो माना जाता था कि पेन्सिल के छिलकों को १५ दिनों तक दूध मिले पानी में रखने से वो मिटाने वाला इरसेर यानि कि रबर बन जायेगा.हम से पूछिये, हमने कितनी पेन्सिलें छील छील कर शहीद कर दीं,और कितनी मां से डांट-मार खाई,दूध चुराने के चक्कर में पतीला उलट दिया, किन्तु कमबख्त रबर कभी हासिल नहीं हुआ.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक गाना याद आ रहा है,: बचपन के दिन भूल न जाना- - - - -.<br />
बचपन के दिन कभी विस्मृत नहीं होते, हां ज़िन्दगी की भागमभाग में कहीं छुप जाते हैं. मेरे बचपन के ऐसी ही एक धारणा आप के साथ बांटना चाहती हूं.जब हम प्राइमरी स्कूल में थे, तो माना जाता था कि पेन्सिल के छिलकों को १५ दिनों तक दूध मिले पानी में रखने से वो मिटाने वाला इरसेर यानि कि रबर बन जायेगा.हम से पूछिये, हमने कितनी पेन्सिलें छील छील कर शहीद कर दीं,और कितनी मां से डांट-मार खाई,दूध चुराने के चक्कर में पतीला उलट दिया, किन्तु कमबख्त रबर कभी हासिल नहीं हुआ.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2920</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 17:46:54 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2920</guid>
		<description>वाह भाई, क्या बचपन की याद दिलाई है। रेल की पटरी पर दबा कर बहुत बार दो पैसे का सिक्का दस पैसे का बनाया। पर बाजार में चला एक बार भी नहीं। सावण की डोकरी खूब देखी है। संस्कृत में इसे इन्द्रगोप कहते हैं। प्रोस्टेटवृद्धि के रोग की आयुर्वेदिक दवा का मुख्य तत्व है। और वह जुगनुओं को जेब में रख कर बरसाती रातों में जेब चमकाना। पंतंग के मंजा बनाने के वशीकरण टाइप नुस्खे। सब केवल यादें हैं अब। और एक मलाल है, हमारे बच्चों को वो मस्ती नसीब न थी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह भाई, क्या बचपन की याद दिलाई है। रेल की पटरी पर दबा कर बहुत बार दो पैसे का सिक्का दस पैसे का बनाया। पर बाजार में चला एक बार भी नहीं। सावण की डोकरी खूब देखी है। संस्कृत में इसे इन्द्रगोप कहते हैं। प्रोस्टेटवृद्धि के रोग की आयुर्वेदिक दवा का मुख्य तत्व है। और वह जुगनुओं को जेब में रख कर बरसाती रातों में जेब चमकाना। पंतंग के मंजा बनाने के वशीकरण टाइप नुस्खे। सब केवल यादें हैं अब। और एक मलाल है, हमारे बच्चों को वो मस्ती नसीब न थी।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: मनीष</title>
		<link>http://saptrang.wordpress.com/2008/03/27/bachpan-ki-manyata-e/#comment-2919</link>
		<dc:creator>मनीष</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 17:16:38 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://saptrang.wordpress.com/?p=203#comment-2919</guid>
		<description>बढ़िया उदहारण दिए..अच्छा लगा पढ़ कर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया उदहारण दिए..अच्छा लगा पढ़ कर</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>
