तब- सखी, जब बागों में भंवरे गुंजार करने लगें, खेतों में सरसों के पीले फूलों की बहार भरने लगे,समझो बसंत आ गया।
अब- जब बागों में शिवसैनिक-बजरंगी हुंकार भरने लगें, जोडे भी ठुक-पिट कर ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगें, समझो वेलेन्टाइन बसंत आ गया
तब- बाजार में गुड मूंगफली की गजक दिखने लगे, चौपालों पर आग-अलाव जलने लगें तो समझो सर्दियां आ गई।
अब- टी वी पर बिवाई न फटने/रूखी त्वचा से बचाने के विज्ञापन आने लगें और सारे चैनल कोहरे के कारण फ्लाइट/रेल देर होने का रोना रोने लगें तो समझो सर्दी आ गई।
तब- “रेनी डे” के कारण स्कूल से छुट्टी मिल जाये, छपाक-छपाक नाली में नाव चलायें, घर के बगीचे में नये पेड लगायें…आहा बरसात आ गई।
अब- अपार्टमेन्ट का पहला तल्ला पानी में डूब जाये, सडकों पर घुटने घुटने पानी भरा हो और गड्ढों की भरमार हो समझो बारिश आ गई।
तब- बरसात लगभग बन्द हो जाये, त्यौहारों का मौसम शुरू होने को हो, नौ दिन जप तप ध्यान व्रत में बीतें ओहो नवरात्रा चल रहे हैं…दशहरा आने वाला है।
अब- गल्ली मुहल्ले में डांडिया चले, बच्चे देर रात को घर लौटें, शहरों में गर्भनिरोधक की बिक्री बढ जाये- नवरात्रा आ गये हैं।
तब-नाना-मामा के यहां जाने को मिले, ढेर सारे आम खाने को मिलें, कामिक्स पढने को मिले, दुपहरी में सोने को मिले…आहा चुन्नू गर्मियां आ गई।
अब-सच तो ये है कि गर्मी की छुट्टियों में बच्चे क्या करते हैं..मुझे भी नही पता। लेकिन ये मालूम है कि नाना-मामा के यहां जाना बहुत कम हो गया है। शायद वीडियो गेम्स खेलते हों या अगले सत्र की कोचिंग करते हों???
हा हा हा, परिवर्तन की इस बयार को मजेदार ढंग से प्रस्तुत किया है आपने…
नयी पोस्ट के लम्बे इन्तेज़ार का फ़ल बडा स्वादिष्ट लगा.अति रोचक.
तब : टिप्पणी करते थे.
अब : टिप्पणी करते हैं.
सही कहा.
बहुत सही..हैं कहाँ ???
क्या खूब तुलना की है और बिल्कुल सही की है।
मनीष, इला जी, संजय भाई, समीर जी, ममता जी- टिप्पणी के लिये शुक्रिया।
समीर जी- यहीं थे…यहीं हैं