रोजमर्रा की भगादौडी, काम धाम, डेडलाइन पर डेडलाइन…कितना कम समय निकल पाता है कि बैठ कर अपने आप से ही बातें की जायें? या कुछ भी नही किया जाये। कब हुआ था आखिरी बार, जब फालतू बैठे और कुछ नही किया? जी हाँ, कुछ नही। मतलब टी वी भी चालू नही थी, कोई अखबार-पत्रिका भी हाथ में नही थी…एकदम खाली? …एकदम आराम…Total Hibernation! ऐसा नही है कि काम बहुत होता है..पर ये जो मन है ना मन…। जब काम नही कर रहे होते..तो भी कुछ ना कुछ सोंच ही रहे होते हैं। घर जल्दी भी पहुँच गये तो टी वी से चिपक लिये, इतनी सारी किताबें अधूरी पडी हैं…वो उठा ली। दिमाग को आराम नही। ये बेचारा , Information Overload का मारा।
ऐसे में ट्रेन का १६-१८ घंटे का सफर बडा सुकून देता है। पिछले हफ्ते घर जाकर आया तो दो बार मौका लगा। हालांकि हाथ में कोई किताब रहती है लेकिन कुछ समय के लिये ही..उसे परे रखा जा सकता है। निर्विकार होकर बैठे रहें। खिडकी के बाहर देखें…देखते रहें।आसपास बैठे लोगों की शक्लें देखें। कितने सारे लोग…अलग अलग जगह से..अलग अलग जगह पर…अलग अलग प्रायोजनों से। हम सब को यहीं आकर मिलना था? हर इंसान की अपनी कहानी, अपनी जिन्दगी। धत्त तेरे की…फिर सोंचने लगे।
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जाते वक्त स्लीपर डब्बे में ऊपर की बर्थ थी। मेरे सामने नीचे की बर्थ पर एक व्यक्ति लेपटाप पर कुछ गिटपिटा रहा था…साइड लोअर बर्थ पर एक अन्य। एक लेपटाप मेरे बैग में । Randomly छाँटे हुई आठ लोगों में से तीन के पास लेपटाप…क्या Penetration है भाई। काश लालूजी अपने बजट में रेल के डिब्बों में एक अदद चार्जर भी लगवा देते। मोबाइल तक चार्ज करने में बहुत परेशानी होती है सर।
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बैठे बैठे ये सब लिखने का खयाल आया, बैग से कागज पेन निकाल लिया। २-४ लाइन लिखने के बाद महसूस हुआ कि हिन्दी में लिखना (हस्तलेखन) पिछले काफी समय से एकदम छूट सा गया है। अंग्रेजी में तो फिर भी आफिस में नोट्स वगैरह लिख लेते हैं…पर हिन्दी में कागज पेन लेकर आखिरी बार कब लिखा था ध्यान नही आ रहा (शायद कालेज में हिन्दी पखवाडे पर आयोजित प्रतियोगिताओं में)। ऊपर से हस्तलेखन भी
माशाअल्लाह हो गया है। खुद का लिखा खुद पढ लूं , यही काफी है। लगता है इमला लिखना शुरू करना पडेगा।
ये सब ट्रेन में कागज पर लिखा था। स्केन करके यहां चिपकाने की सोंच रहा था…लेकिन हस्तलेख देख कर शर्म आ गई
। कहते हैं हस्तलेख व्यक्तित्व का आइना होता है। यहाँ चिपका दिया तो पोल खुल जायेगी


ट्रेन में चलते समय जरूर लिखा करें। बड़ा अच्छा लिखते हैं – फ्री फ्लो में!
You are right.. train journey is really very conducive to creative thinking.. specially the people.. they can surely provide enough for 4-5 blogs..
After a long gap, I got an opportunity to travel.. 24 hours train journey.. and I finished two books..
बहुत बढि़या….उत्तम लेखन.
मैं जिन ट्रेनों में चढ़ा हूं उनकी एसी प्रथम में तथा एसी चेयर कार में सबसे आगे वाली सीट पर चार्जर रहता है। मैं हमेशा लैपटॉप पर रिलाएंस फोन के साथ ट्रेनो पर काम करता हूं। शायद यह सुविध सारी ट्रेनों में न हो।
जब तक इस ब्लॉग से पाला नहीं पड़ा था कई बार Total Hibernation में मैं भी चला जाता था। जब से इस के चक्कर में पड़ा, ध्यान लगाने की भी कोशिश करता हूँ तो भी कुछ देर में शून्यता की बजाय ब्लॉग और टिप्पणीया.. ही नजर आते हैं।
ha ha beautiful writings specialy the handwriting stuff,nice.
बहुत बढिया. यूं तो शून्य में ताकने की फ़ुर्सत आसानी से नहीं मिलती,फ़िर भी कभी कभी मन करता है,खाली बैठ जाने को.मुझे भी एक बार को्टा जाते वक्त ६ घन्टे मिले थे, न कोई किताब पास थी, न ही कोई सहयात्री, जिसका दिमाग खा सकूं. मुझ जैसी बातूनी के लिये बिना बात किये रहना बहुत बडी सज़ा साबित हुई. कागज़ कलम की मदद से कुछ वक्त कटा, राम राम करते, मन में कुछ गुनते सफ़र कटा.
good blog. Some trains are really nice to travel though, while some are really a disaster.
wah bhai sahi likhe ho,jahan tak mujhe lagta hai now every compartment ie AC II and above has a charging point..
alok – naa ji, it depends on train. old coaches still dont have chargers. I was travelling to patna last month and the coach attendant was charging Rs 20 for mobile charging (he invented a charger from AC connection in typical deshi style).
Nitin: i support you, but I sleep a lot in train.
nitin: the comment above is mine’s
ज्ञान जी, संतोष, समीर जी, उन्मुक्त जी, सागर भाई, महक, इला जी, Anon, आलोक, अखंड- टिप्पणी के लिये शुक्रिया।
उन्मुक्त जी, आलोक- जैसा अखंड ने बताया , नये II AC एवं उसकी ऊपर के डब्बों में चार्जिंग पाइन्ट आने लगे हैं हर कंपार्टमेंट में। वैसे परसों सागर भाई ने बताया की नये स्लीपर कोच में भी आजकल २ चार्जर पाएंट आने लगे हैं।
[...] सफर की कतरनों में मैने लेपटाप के Penetration और ट्रेन में [...]