टी वी पर समाचार देख/सुन रहे थे कल। समाचार वाचक सुन्दरी ने मौसम का हाल बताते हुए , मुस्कुराते हुए अंग्रेजी में जो कहा उसका आशय कुछ ऐसा था “दिल्ली और उत्तरप्रदेश के लोग राहत की सांस ले सकते हैं क्योंकि यहां बारिश की संभावनाएं हैं” (चैनल का नाम ध्यान नही) । पता नही उनका [...]
Archive for March, 2008
मौसम का मिजाज…
Posted in किसान, मीडिया, मौसम on March 31, 2008 | 7 Comments »
जब मैं छोटा बच्चा था…
Posted in childhood, childhood dreams, बचपन, यादें on March 31, 2008 | 3 Comments »
पिछली पोस्ट में बचपन के कुछ टोटकों/धारणाओं पर लिखा था जिन्हें अब याद करके भी हँसी आती है। टिप्पणियों में एक-दो टोटके और पता चले…शायद ‘जनरेशन गेप’ के चलते हमारे बचपन तक वो विलुप्त हो चुके थे । सोंचते सोंचते कुछ और बाते ध्यान आ गईं। इस बार वो चीजें जिनकी बचपन में शिद्दत [...]
बचपन की हमारी मान्यताएं
Posted in childhood, childhood dreams, बचपन, यादें on March 27, 2008 | 17 Comments »
मान्यता से मतलब संजूबाबा वाली मान्यता से ना लगाइयेगा। मैं बात कर रहा हूं छुटपन की अपने कुछ धारणाओं/विश्वासों की, जो पता नही कब,कहां से मन में बैठी थीं और कब धी्रे-धीरे बडे होते हुए, दिमाग से निकल भी गईं। ये छोटे बच्चों के आपस की बाते हैं…शायद आपको समझ में ना भी आएं…पर पढने [...]
तब और अब
Posted in बकर on March 26, 2008 | 6 Comments »
तब- सखी, जब बागों में भंवरे गुंजार करने लगें, खेतों में सरसों के पीले फूलों की बहार भरने लगे,समझो बसंत आ गया।
अब- जब बागों में शिवसैनिक-बजरंगी हुंकार भरने लगें, जोडे भी ठुक-पिट कर ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगें, समझो वेलेन्टाइन बसंत आ गया
तब- बाजार में गुड मूंगफली की गजक दिखने लगे, चौपालों पर आग-अलाव जलने लगें [...]
सफर की कतरनें
Posted in विचार on March 3, 2008 | 13 Comments »
रोजमर्रा की भगादौडी, काम धाम, डेडलाइन पर डेडलाइन…कितना कम समय निकल पाता है कि बैठ कर अपने आप से ही बातें की जायें? या कुछ भी नही किया जाये। कब हुआ था आखिरी बार, जब फालतू बैठे और कुछ नही किया? जी हाँ, कुछ नही। मतलब टी वी भी चालू नही थी, कोई अखबार-पत्रिका [...]

