न्यूटन बाबा कह गये हैं कि कोई वस्तु, जिस अवस्था में है..उसी में रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाहरी दबाव ना डाला जाय। अगर रुकी है, तो रुकी रहेगी और अगर चलायमान है…तो चलती ही जायेगी, उसी गति से..बिना किसी घट बढ के। बाबा वैज्ञानिक तो थे, पर मनोवैज्ञानिक भी थे, ये पता नही। देखिये ना, मानव मन पर ये बात कितनी सटीक बैठती है। हर किसी को, कहीं न कहीं से दबाव चाहिये ही। आफिस में अधिकारी का,स्कूल में शिक्षक का, भक्त पर भगवान का, नेता जी पर आलाकमान का (जनता का नही), अभिनेता पर भाई का, शेयर मार्केट पर एफ.आई.आई. का,भारतीय क्रिकेट टीम पर बी.सी.सी.आई. का …सबको कहीं न कहीं से दबाव चाहिये। नही तो समझिये काम हुआ ठप। थोडी आदत भी ऐसी हो गई है, कि जब तक प्रेशर ना बने, काम ढंग से नही होता। और जैसे ही डेडलाइन का प्रेशर बना, चीजें खुद-ब-खुद हो जाती हैं।
लेकिन हाँ, कई गुणी लोग होते हैं, जिनमे ये प्रेशर अंदर से आता है। अंदर बोले तो..अंतरात्मा। ये जो अंदर से प्रेशर बनता है, ये कई बार बडी खुराफात कर जाता है….लेकिन सच मानिये, तो दुनिया को बडी बडी चीजें इसी प्रेशर की बदौलत मिली हैं। मेरे खयाल में, दुनिया में जो लोग टाप पर पहुँचते हैं…उनके अन्दर से प्रेशर बनता है, बोले तो ये Self Driven होते हैं…ये लोग होते गिने चुने हैं…लेकिन शायद इनके अंदर का प्रेशर ही सारी दुनिया के लिये Driving Force का काम करता है।
चलते चलते गुणीजनों के लिये एक सवाल, आदम Self Driven था, या उस पर सेब के द्वारा दबाव डाला गया? लीजिये, न्यूटन बाबा से बात शुरू हुई थी, और सेब तक जा पहुँची…उनका Driving Force तो सेब ही था
और कुछ भाग्यवान ऐसे होते हैं जो पत्नी या माँ ड्रिवन होते हैं ।
घुघूती बासूती
स्टेटस-को-इज्म सर्वत्र व्याप्त है। उसी प्रकार सेल्फ ड्राइव भी नेचर में सर्वत्र व्याप्त है। यह भी नहीं इ केवल अचीवर्स में सेल्फ ड्राइव होता है। बाकी लोग तो अपनी सेल्फ ड़्राइव अनप्रोडक्टिव दिशा में मोड़ने में सफल हो जाते हैं।
अरे। अंदर के प्रेशर बिना तो कोठा भी साफ नहीं होता।
हम ब्लॉगरों पर एक अलग ही किस्म का दबाव होता है टिप्पणी करने का… अगर नहीं की तो हमें भी नहीं मिलेगी।
वैसे कल हमारे उपर भी दबाव पड़ा था पर वह सेब तो नहीं था कुछ अलग किस्म का हथियार था।
घुघूती बासुती जी, पत्नि या माँ ही नही, महिलाएं किसी भी रूप में अक्सर बडी उत्प्रेरक शक्ति का काम करती हैं
ज्ञानदत्त जी, हो सकता है, नेगेटिव -पासिटिव की तरह स्टेटस-को और सेल्फ ड्राइव भी प्रकृति में समान रूप से हो, लेकिन स्टेट्स-को अक्सर दिखाई दे जाता है। सेल्फ ड्राइव, प्रोडक्टिव/अनप्रोडक्टिव कैसा भी…कम ही दिखाई पडता है।
दिनेश जी, उसके लिये भी कभी कभी ईसबगोल या चूरण लेकर बाहर से दबाव बनाना पडता है।
सागर भाई- सत्य वचनम। लेकिन कई लोग जैसे संसार में रह कर भी संसार से परे होते हैं, वैसे ही ब्लागिंग करते हुए भी टिप्पणियों से परे होते हैं। बाकी हथियार की बात जरा विस्तार से समझाइये
pressure dene wala blog hai…bahut achha..
Nitin ji – orkut ke terah ctrlG yahanbhi chalwaiye.. mazaa nahin aata angrezi likhne main aapke blog par..
ps- s/w kaun chalaye baar baar – taki aap barah etc ka use karne ko na kahein!!
अखंड- भाई, वर्डप्रेस फिलहाल इस मामले में ज्यादा कुछ करने की इजाजत नही देता, गूगल के उत्पाद भाषाओं की सहूलियत में अन्य कंपनियों से काफी बेहतर हैं।
आपकी टिप्पणी का रोमन हिन्दी में भी स्वागत है।