किताबें…इन दिनों
January 3, 2008 by Nitin Bagla
दिसम्बर में हैदराबाद में एक पुस्तक मेला लगा था, जिसकी कि खबर मुझे मेले के आखिरी दिन लगी। किस्मत से उस दिन शनिवार था सो घूमते फिरते पहुँचे और करीब ३-४ घंटे वहाँ बिताये। अधिकांश अंग्रेजी पुस्तकों के स्टाल, कुछ तेलुगु, एक-दो उर्दू पुस्तकों के स्टाल। और से २-३ स्टाल हिन्दी प्रकाशकों के भी। हैदराबाद में हिन्दी किताबों की दुकानें पिछले एक साल से ढूंढ रहा हूँ (या ढूंढने की सोंच रहा हूँ), लेकिन सफल नही हुआ…लेकिन इन स्टालों के मिलने से पुस्तक मेले में आना सार्थक रहा। ४ किताबें खरीदीं-
अमृतलाल नागर की नाच्यो बहुत गोपाल
विष्णु प्रभाकर की लिखी शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी आवारा मसीहा
शरद जोशी का व्यंग्य संग्रह यत्र-तत्र-सर्वत्र
और बहुत दिन से ओशो को पढने का सोंच रहा था सो एक पुस्तक कोंपलें फूंट पडी
नाच्यो बहुत गोपाल तुरंत ही पढ ली थी। तत्कालीन समाज में हरिजन और महिलाओं की स्थिति पर केन्द्रित यह उपन्यास पढके मन एक अजीब सी बैचेनी से भर गया। इसे वितृष्णा कहूं, या सहानुभूति पता नही, मुझे खुद भी नही मालूम। समाज के दो सबसे उपेक्षित तबकों…एक तो महिला और ऊपर से हरिजन पर लिखा गया यह उपन्यास बहुत गहरे तक जाता है। हालांकि अब परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं और जिस काल खंड में यह उपन्यास लिखा गया है, तब में और आज में महिलाओं की और हरिजनों की स्थिति में बहुत अन्तर आया है।
आवारा मसीहा शरतचन्द्र की जीवनी है। अभी करीब सौ पन्ने पढे हैं। स्कूल समय में शरत चन्द्र के कई उपन्यास पढे थे, अब काफी समय हो गया, लेकिन इस उपन्यास को पढ कर कह सकते हैं कि उनके अधिकतर चरित्र उनकी ही जिन्दगी से निकले थे। यह बात भी सोंचने में आती है क्या अधिकतर महान लोग अपने शुरुआती दिनों में थोडे सनकी, थोडे विद्रोही होते हैं?
यत्र तत्र सर्वत्र और कोंपलें फूट पडीं अभी शुरू होने की राह देख रहे हैं। जो पुस्तकें मैने मांगी और नही मिल पाईं, वो थीं श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी, कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान और गिरिराज किशोर की पहला गिरमिटिया । उसी समय रांची से एक सहकर्मी का फोन आ गया और उन्होने डा राही मासूम रजा के किसी गजल संग्रह की मांग की। लेकिन वो भी नही मिला। हालाँकि दोनो प्रकाशकों ने अपने पते दिये, ये पुस्तकें दुकान पर उपलब्ध हैं बताया, और दुकान पर जरूर आने को बोला, और किस्मत से ये दुकानें मेरे घर के एक किलोमीटर के दायरे में स्थित हैं। (देखते हैं कब जाना होता है।)
20-21 दिसम्बर को घर जाते समय नागपुर स्टेशन पर सुबह १० बजे नींद खुली। हाथ पैर सीधे करने उतरा और जब वापस चढा तो मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास क्याप अपने हाथ में था जो रात को मथुरा पहुँचने से पहले निपटा दिया गया। जोशी जी का इससे पहले मैने कसप पढा था, पिछले साल, लगभग इन्ही दिनों। पता नही यह उनके अन्य उपन्यासों में भी है या नही…जोशी जी का नायक बहुत कन्फ्यूज्ड होता है..और नायिका एकदम सालिड, दृढ निश्चयी। कसप में पहाडी हिन्दी से मेरा पहला परिचय हुआ रहा.. और वो मुझे बहुत अच्छी लगी रही ।पर क्याप में यह इतनी प्रयुक्त नही हुई बल।
घर से लौटते वक्त भोपाल रेलवे स्टेशन से सुरेन्द्र मोहन पाठक के तीन उपन्यास उठाये। ये भी सिर्फ स्टेशनों पर मिल पाते हैं और पिछले ५-६ महीने स्टेशन पर कोई काम न पडने की वजह से ३ नये उपन्यास बिन पढे हो गये थे। एक ट्रेन में और दो अगली रात को निपटा दिये गये।
हैदराबाद लौटा तो घर में मित्र रामा की लाई हुई Amitabh Bagachi की Above Avarage और Anurag Mathur की The Inscrutable American बरामद हुईं। Above Avarage, “Five Point Someone ” वाली श्रेणी की किताब है..अपने स्कूल-कालेज के दिनों की याद दिलाती है। सो ये भी शुरू कर दी। Five Point Someone, अपनी पी.जी. कक्षाओं में पीछे की कुर्सियों (BackBenches) पर बैठ कर निपटाई गई थी।
इस बीच और अभी कल आफिस का नियमित पुस्तक सप्लायर Thomas L. Friedman की The World is Flat दे गया। (यह बन्दा अंग्रेजी की अधिकतर पुस्तकों के प्रिंट मूल्य पर २०-२५% तक छूट देता है, और घर बैठे…(बोले तो आफिस बैठे) पुस्तकें डिलीवर करता है)। The World is Flat बदलती दुनिया की बदलती अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण और उसके प्रभावों पर है..अभी पचासेक पेज पढे हैं और शुरुआती पृष्ठ पढते समय मुझे कई जगह एल्विन टाफ्लर(Elvin Tofler) की फ़्यूचर शाक (Future Shock) याद आई।
William Dalrymple की The Last Mughal, George Orwel की 1984, और Robert T Kiyosaki की Rich Dad Poor Dad (जिसे पढने की सलाह और सोफ़्ट कापी समीर लाल जी से प्राप्त हुई), पिछले करीब ३-४ महीने से थोडा थोडा पढ कर खत्म होने की राह देख रही हैं।
पढने को इतना सारा मसाला। नये साल में एक ब्लागर बन्दे को और क्या चाहिये?…..सिवाय थोडे खाली समय के, जो मिलता नही, चुराना पडता है!
आप सबको साल-२००८ के लिये शुभकामनाएं।

नाच्यो बहुत गोपाल शानदार लगी,
आवारा मसीहा भी।
राग दरबारी तो है ही जबरदस्त लेकिन कितने पाकिस्तान ज़रुर ज़रुर पढ़ें।
पहला गिरमिटिया पूरी तो नही पढ़ी मैने लेकिन उसका विद्यार्थी संस्करण पढ़ा तो पूरी पढ़ने की तमन्ना जाग उठी है।
सुरेंद्र मोहन ने सुनील और प्रभु का कौन सा नया नोक झोंक लिख मारा या फ़िर द लक्की बास्टर्ड का कोई नया झमेला?
अंग्रेजी किताबों की चर्चा कर ही नही सकता मैं ।
तो
आपको भी नए साल की शुभकामनाएं
नया साल आपको पहले से बेहतर दे जाए!
रोचक। इतनी पुस्तकें पढ़ने पर तो कहने का बहुत मसाला होगा आपके पास।
बहुत दिनों बाद आप की पोस्ट नजर आई। मैं यहां कोटा में फोन का इन्तजार करता रहा। पुस्तको की सूची देख कर रुचि का पता लगता है। मैं समझता हूँ अब ब्लॉग पर शीघ्रता से मुलाकात होगी।
हिन्दी की पुस्तकों में मैंने आवारा मसीहा पढ़ी है। यह बहुत अच्छी है पर इसका मजा तभी है जब आपने शरतचन्द्र को पूरा पढ़ रखा हो।
नाच्यौ बहुत.. मेरी सबसे पसंदीदा पुस्तकों में से एक है, इसकी संक्षिप्त समीक्षा मैने यहाँ लिखी थी। अब तक चार बार पढ़ चुका हूँ इसे।
क्याप वगैरह पढ़ ली है ना , बस मैं आ ही रहा हूँ लेने के लिये बल।
बाकी पुस्तकें भी फटाफट निबटा लीजिये।
Arre Bhai, aapke sawak ka uttar aapke poast ke hi tippani wale khand me hain
Naye saal me aap jeevan me naye safaltao ko payen! baki itni pustake mat padhe (woh bhi ek saath)
संजीत, आपकी सलाह पर अमल किया जायेगा, टिप्पणी के लिये धन्यवाद
ज्ञान जी, कहने को मसाला तो बहुत है पर आपकी तरह नियमितता नही है…शायद नये साल में कुछ सुधार हो सके
दिनेश जी, माफी…कोटा फोन नही कर पाया, मात्र एक दिन रुके थे, अत्यंत व्यस्तता में गुजर गया…अबकी बार जब भी आना हुआ, जरूर मिलेंगे
उन्मुक्त जी, टिप्पणी के लिये धन्यवाद
सागर भाई, कब आ रहे हैं..आपका स्वागत है
आलोक, बहुत उलझा रहे हो…हमें पलटवार करना होगा, तैयार रहना :)..
पुस्तकें एक साथ नही..एक-एक करके पढेंगे..
Nitin Bhai hum to suljhana chah rahe the,
ahan baat palatwaar ki hain, to mare ko kya maroge
Kya khoob shuruaat hui hai naye saal ki. Nitinji, hindi mein likhne mein thodi pareshani ho rahi hai, parantu, dil ki baat aise hi bayaan karoongi. I share the same hunger for reading as u. Awara masiha nahi padh pai hoon , Nachyo bahut gopal, papa se lekar padhi thi, Inscrutable Americans will make an interesting read, but does not give any food for thought. Bahut satahi tarike se liki hai Anurag mathur ne.Five point someone was finished on a short trip to Jaipur. Mera bachpan school ki kitaabon ke saath sahitya padhte hue bita hai, itna padhti thi ki classmates mujhe hindi teacher Mrs. Tiwari ki chamchi kah kar chidate they, Kota Sophia ki library mein bahut achha collection hai hindi sahitya ka, Sharatchandra, Premchand, Bimalmitra, Ashapurna Devi, ityadi lekhkon se parichay wahin se hua, baki Papa aur ma ki library se mili. Nitin aapko dhanyawad, school ki yaad dila di.Likhte rahiye please.
kya babu niti saheb….bahut din baad aapke blog per aane ka dev-durlabh sanyog mila…achche kaam yada kada hi hote he……socha ki idhar se guzra hu to salaam karta chalu..
kya babu niti saheb….bahut din baad aapke blog per aane ka dev-durlabh sanyog mila…achche kaam yada kada hi hote he……socha ki idhar se guzra hu to salaam karta chalu..