फ्रांस प्रवास ३- पेरिस की इक ठंडी शाम
December 18, 2007 by Nitin Bagla
भाग १- काँच की सडकें
भाग २- परदेस में खाना-पीना
कार्यक्रम इतना टाइट था, कि पेरिस घूमने के लिये लौटते वक्त मात्र शुक्रवार की दोपहर और शाम मेरे पास थी…शनिवार दिन में ११-१२ बजे वापसी थी। क्या देखें, क्या छोडें..और क्या खरीदें। मेरे साथ वन्दना जी और सुरीता जी थे जो फ्रांस में मेरी मुँह और कान थे (Interpreter को हिन्दी में क्या कहेंगे?) । ये लोग पेरिस के चप्पे चप्पे से वाकिफ थे सो इन्ही से मदद की गुहार लगाई गई। दो संभावनाएं थी या तो पूरा समय टेक्सी करके घूमा जाय..या एक जगह से दूसरी जगह मेट्रो में बदल बदल कर सफर किया जाये । अनुभवी जनों ने कहा कि मेट्रो से घूमेंगे तो थोडा अडवेन्चरस भी रहेगा और सस्ता भी। टेक्सी अगर कहीं ट्रेफिक वगैरह में फंस गई तो खडे ही रह जाओगे..कहीं जा नही पाओगे..और यहां की टेक्सी का मीटर जो घूमता है…देखते हीं चक्कर आने लगते हैं।
यहां के सबसे खास बात यह है कि आपको जगह जगह निः शुल्क नक्शे , जानकरी , पुस्तक आदि मिल जाते हैं सो परेशानी नही होती। उसके अलावा मेट्रो आदि स्टेशनों, मार्गों में दिशा निर्देश बहुत सपष्ट हैं। चूंकि मेट्रो में पहले नही बैठे थे पहले, तो ये अपने आपमें रोमांचक था। सो होटल से नक्शा उठाया गया..एक शहर का और एक मेट्रो का। सीमित समय में क्या क्या देखा जा सकता था और किन किन रास्तों से ताकि समय का अधिकाधिक उपयोग हो सके। चूंकि अपनी जानकारी बिल्कुल शून्य थी..हम कुछ नही बोले, सिवाय इसके कि एफिल टावर जरूर देखना है, इसके अलावा क्या दिखा सकें आपकी मर्जी। मेट्रो का नक्शा देख कर लगा कि बहुत जटिल सिस्टम है..लेकिन एक बार गौर किया और २ बार अलग अलग मेट्रो में बैठने के बाद इतना सरल लगने लगा कि आप एक नक्शा और जेब में पैसे देकर कहें भी छोड दीजिये, बिना किसी से कुछ भी पूंछे भी आराम से घूम सकते हैं।

सबसे पहला पडाव था Sacré-Cœur Basilica (Basilica of the Sacred Heart)। ये एक पुरातन चर्च है जो कि एक पहाडी पर स्थित है। ऊपर चढने पर पूरा शहर दिखाई देता है। यह काफी पुराना इलाका है, आसपास छोटी छोटी गलियां हैं जहां कई बार, कैफ़े हाउस, रेस्त्रां इत्यादि हैं। इनमें कि रिनेंसा के समय चित्रकार, कवि, दार्श्निक इत्यादि बैठा करते थे। अभी भी फुटपाथ पर लाइन से चित्रकार बैठे रहते हैं..यहां घंटा-दो घंटा बैठिये, अपना पोर्ट्रेट बनावाइय। अपना फोटू बनवायें इतना समय नही था…सो थोडा घूमते फिरते, दुकाने टापते हुए फिर बढे मेट्रो स्टेशन की और…।
अगली मंजिल थी Arc de Triomphe. हिन्दी में कहें तो विजय द्वार। यह अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में नेपोलियन युद्ध के समय शहीद हुए सैनिकों की याद में बनवाया गया था (दिखने में यह काफी कुछ अपने इंडिया गेट जैसा लगता है, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिकों की याद में बना है)। यहाँ से एक सडक शुरू होती है - Champs-Élysées । .इसे दुनिया की फैशन स्ट्रीट भी कह कते हैं…लम्बी-चौडी सडक..दोनों और बडे बडे ब्रान्ड्स के कपडों, गहनों और घडियों के शोरूम, सिनेमाघर, काफी हाउस इत्यादि। जेब में माल हो तो खरीदारी करने के लिये काफी कुछ। हमने बस बाहर से कीमतें देखीं। चूंकि ठंड बहुत थी…और बादल घिरे हुए थे..मेक्डानाल्ड्स में जाकर एक काफी पी..जो बिल्कुल भी अच्छी नही लगी। .रात को इस सडक बहुत अच्छी रोशनी होती है। यहाँ से एफिल टावर बहुत दूर नही है और समय होता तो पूरी सडक नापी जा सकती थी और ‘काफी कुछ’ देखा जा सकता था।
खैर…यहाँ से फिर मेट्रो में सवार हुए और पहुँचे एफिल टावर। एफिल टावर बोले तो फ्रांस का ट्रेड मार्क। ठीक वैसे ही जैसे भारत का ताजमहल। १८८९ में बना यह शिखर, अपने समय में दुनिया का बसे लम्बा मानव निर्मित ढांचा था। इसकी कुल लम्बाई ३२४ मीटर है। टिकट लेकर आप टावर में कुछ ऊपर तक चढ भी सकते हैं…मध्य भाग में एक रेस्त्रां भी है, और अंधेरा होने के बाद जब रोशनी होती है तो पूरा टावर जगमगा उठता है। किंतु चूंकि हमें खरीदारी भी करनी थी (दुकानें यहां १० बजे बन्द हो जाती हैं) और सुबह निकलना भी था, सो ज्यादा देरे नही रुके और फिर मेट्रो पकडी अपने होटल की ओर।
इति श्री पेरिस यात्रा समाप्तम…..
चलते चलते:
इन दिनों चिट्ठा-संसार में ‘खिचडी’ बनाम ‘स्पेशल डाइट’ पर चर्चा चल रही है। दरअसल खिचडी बनाने में बहुत आसान होती है..अपन जैसा अनाडी भी आराम से बना सकता है- नमकीन, मीठी, तीखी, फीकी कैसी भी बना लीजिये..ना ज्यादा मेहनत..ना ज्यादा कुशलता और काबिलियत। जल्दी बन जाती है और हाँ, पचने में भी आसान होती है। इसीलिये ये अपने को रास आती है। वैसे एक बात और है..’बुफे सिस्टम’ में हमने देखा है…छः तरह के पकवान एक थाली में जब आते हैं और जब गुलाबजामुन की चाशनी रायते से गठबंधन करती है…तो लोग कहते हैं..’अरे ये तो खिचडी हो गया’ (बोले तो..खिचडी की भी कई श्रेणियां हो सकती हैं) ![]()


bahut satik vivran apr chotta , bhai tumhare bharose hi paris ghoomna hai, isliye detail me likho..
Aur aajkal farmaish par hi likhte ho
aur bahi ek khichdi aur nahin samajh aayee.. ye india - france ke beech chakkar laga rah eho kya.. kabh bharat ar blog kabhi france par… ye khichdi swadisht to hai, par prawas ya fir yatra ke samay ka hisab bhi ho to mazaaa aa jaay.
awaiting ur next post on France! Did u go to any vineyard?
Nice post, wish i was there
आलोक-धन्यवाद। दिन बहुत हो गये सो यांदें थोडी धुंधली हो गईं। और फरमाइश? ऐसा क्यों लगा भला तुम्हे?
। वाइनयार्ड जाने का मौका नही लगा। पोस्ट पसंद आई…शुक्रिया..।
अखंड-भाई, गये तो काफ़ी समय हो गया..लेकिन लिखते लिखते दिन लग गये। समय का क्या हिसाब, कभी भी समझ लो
मूनी- फ्रांस प्रवास कथा खतम भयी। फ्रांस पर अगली पोस्ट पता नही कब