फ्रांस प्रवास २-परदेस में खाना पीना
November 25, 2007 by Nitin Bagla
एक ना ‘पीने’ वाले शाकाहारी को परदेस में क्या दिक्कत हो सकती है, कोई मुझसे पूंछे। हालांकि जाने के पहले ही वहां ई-मेल द्वारा बता दिया था कि में विथाउट-एग-और-फिश वाला शाकाहारी हूं..पर कोई सुने तब ना। सो खाने की टेबल पर जब वहां वेटर को बताया जाता तो चेहरे पर ऐसे भावा आते मानो कोई अजूबा देख लिया हो। पेरिस में भारतीय होटल मिल जाते हैं, पर मैं चूंकि पेरिस से ३०-४० किमी बाहर था…वहां कुछ उपलब्ध नही था। तो अपना आसरा थी ब्रेड, उस पर मक्खन, नमक और कालीमिर्च। कालीमिर्च भी ऐसी कि कोई तीखापन नही..गनीमत है कि नमक खारा था। साथ में उबले हुई आलू, गोभी, पालक, बीन्स, गाजर आदि आदि। १-२ बार चावल भी मिले। हाँ जूस और फ्रूट खूब लिये..दिन में ३-४ सेब , २-३ गिलास जूस डकार जाते थे।
( तले हुए आलू, उबली गोभी और पत्ता गोभी
)
चूंकि मैं वहां ज्यादा खाता नही था सो साथी प्रतिभागी अफसोस जताते थे और ‘वेरी-सारी’ भी कहते थे, पर कोई चारा ना था और वैसे भी, मानसिक रूप से मैं ऐसी किसी परिस्थिति के लिये तैयार था। तो एक दिन हमारे लिये विशेष रूप से भारतीय खाना मंगवाया गया। तंदूरी रोटी, पुलाव, पालक पनीर, दाल, अचार, समोसे आदि आदि। साधु-साधु करते हुए खाया। ![]()
भोजन करने का फ्रेंच तरीका भी बताते चलें।(और भी कई चीजों के फ्रेंच तरीके होते हैं
)। खाने के साथ पीने को जरूर होना। अक्सर रेड वाइन। अब हमें ना पीने का खामियाजा अपने कालेज में तो भुगतना पडता था…यहां भी वही हाल। हां उन्हे देख देख अपने पीने वाले मित्रों की जरूर याद आतीं। फ्रेंच भोजन के तीन चार चरण होते हैं। सबसे पहले शुरुआत होती है, स्टार्टर से। इसमें होते थे कुछ सलाद,उनके ऊपर क्रीम और कुछ ऐसी चीजें जिनका मैं नाम नही जानता (अधिकतर अंडे युक्त)। मैने सोंचा..सलाद बचा कर रख लिया जाये, जब भोजन आयेगा तो उसके साथ खायेंगे..तो बताया गया कि जब तक ये प्लेट तुम्हारे सामने से हट नही जाती..अगले प्लेट नही आयेगी, याने पहले स्टार्टर खत्म कर लें फिर खाना मिलेगा। खाना भी प्लेट में एक ही बार परोसा जाता है। मतलब एक बार में प्लेट में जो आ गया, सो आ गया..ना ज्यादा न कम। इसके अलावा, यहां खाने-पीने की हर चीज डिब्बाबंद होती है …चीनी, जैम, शहद, मक्खन सब चीजों की एक-एक खुराक के बराबर छोटे छोटे पैकेट। दही, छाछ, जूस आदि के साथ भी ऐसा ही।ऐसा नही होगा कि भगोनी में दही रख दें और कटोरी में अपने हिसाब से ले लें।
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यहाँ से जाते समय, मुम्बई से एयर इंडिया की उडान मात्र १० घंटे देरी से थी, सो सुबह के ७ बजे की जगह यहां से निकले शाम के ५ बजे। हालाँकि एयर इंडिया वालों ने होटल उपलब्ध करवाया था सो हाँ खास दिक्कत नही थी पर दूसरे छोर जहाँ हम दिन के १:३० बजे अपेक्षित थे, वहाँ हम पहुँचे राते के ११ बजे। परदेस में नन्ही सी जान, एक दम अकेली..और रात के ११ बजे..हाय दय्या। पूंछो ना कैसे मैने रैन बिताई।
खैर रात को किसी तरह गंतव्य पहुँचे, अपना कमरा मिला और सो लिये। सुबह जब अन्य लोगों से मिले, जो मिलता, मेरी देरी की वजह पूंछता। व्हिच एयरलाइन्स? एयर इंडिय? ओह्ह्ह। ये ओह्ह और नाक भौं सिकोडना इतना खला कि बस।लेकिन मन मसोस कर रह गये।
लेकिन मजा आया लौटते में। वापसी में जब टेक्सी पकडी, तो टेक्सी चालक कम्बोडिया का था। योरोप में किसी एशियाई से मिले, तो ऐसा लगा मद्रास में कोई राजस्थानी मिल गया :)।खैर रस्ते में वो भी पूंछ बैठा..व्हिच एयरलाइन्स। एयरइंडिया। देन इट्स ओके। एयर फ्रांस इस ओन स्ट्राइक सिन्स २-३ डेज़। अब खुश होने की बारी अपनी थी। एयरपोर्ट पहुँचा तो देखा..एयर फ्रांस की ८०% उडानें निरस्त। कुछ हिन्दुस्तानी मिले, जो एक दिन पहले निकलने वाले थे, पर उस हडताल की वजह से नही निकल पाये, और उनक टिकट एयरइंडिया में ट्रांसफर करवाया या था। साथ मिल कर दम भर एयर फ्रांस को गरियाये। और हाँ, अपनी एयर इंडिया..एक दम राइट टाइम थी उस दिन।दिल खुश कर दित्ता। (फ्रांस में आजकल हडतालों का मौसम चल रहा है, शायद वहाँ की सरकारी नीतियों की वजह से। अभी हाल ही में मेट्रो हडताल पर थी, और अन्य नागरिक सुविधाएं भी।)
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फ्रांस निवासी रिचड से मेरी मुलाकात २००२ में बैंगलोर में हुई थी, मात्र १ महीने के लिये। हम लोग एक ही इंस्टिट्यूट पर जाते थे। उसके बाद कभी कभार याहू मेसेन्जर पर हाय हलो होती रही। पेरिस आने का प्लान बना तो मैने उसे एक आफलाइन डाला..अपने आने की खबर देते हुए। समय की कमी के चलते हम वहाँ मिल तो नही पाये, पर फोन पर बतियाये। अंग्रेजी में बात करते करते अचानक वो पूंछ बैठा “तुम्हे हिन्दी आती है?”। मैं भौंचक। मैं बोला..”तुम्हे हिन्दी आती है?” बोला हाँ..मैं तो बैंगलोर समय भी थोडी बहुत बोलता था। और हिन्दी फिल्में भी खूब देखता हूँ..और मेरी बीवी पाकिस्तानी है। खालिस फ्रांसिसी बंदे के मुह से अपनी भाषा सुनकर बहुत अच्छा लगा । हिन्दी फिल्मों के मसाले को हम कितना भी गाली दे लें लेकिन दुनिया भर में बालिवुड ने अपनी एक पहचान तो कायम कर ही रखी है, और कई जगह अपना इंडिया इन्ही की वजह से पहचाना जाता है।
पेरिस शहर में क्या कुछ देख सके, वो अगली बार।


हमरे पूर्वज अपना भोजन खुद बनाते थे। ऐसी परिस्थिति में खिचड़ी ही बनाते! वह भी स्वादिष्ट लगती!
बाकी, फ़्रेन्च की हिन्दी बोलने वाली बात पसन्द आयी।
बहुत अच्छे। आगे और संस्मरण लिखो। तुम्हें हिंदी तो आती है न!
रेड वाईन =P~
बढ़िया विवरण, लेखन शैली ने रोचक बना दिया है!!
“योरोप में किसी एशियाई से मिले, तो ऐसा लगा मद्रास में कोई राजस्थानी मिल गया ” बहुत खूब!
फ्रांसिसी को हिन्दी बोलते सुनना और यहां अमेरिका में एक अमेरिकी को देसी दुकान में जाकर बर्फी खरीदते हुए देखना अच्छा लगता है
मैं जब बाहर जाता हूं तो एक नियम जरूर बना लेता हूं कि वहां सब कुछ खाऊंगा। यह भी कोशिश करता हूं कि वह खा कर देखूं जिसका मैंने नाम कभी नहीं सुना है। यह मैं इसलिये कर पात हूं क्योंकि मुझे किसी बात से एलर्जी नहीं है। हां एल्कोहल नहीं लेता इसलिये वाइन, बीयर वगैरह से दूर रहता हूं।
फ्रांस यात्रा विवरण का दोनों हिस्सा पढ़ा, लग रहा है कुछ और लिखोगे आप.. इंतजार रहेगा. लेकिन आप तो नारद पर शायद नहीं आते.. ठीक ठीक पता भी नहीं..
ज्ञानदत्त जी - खिचडी…अच्छा आइडिया है..पर ४-६ दिन की बात हो तो कौन इतने झमेले में पडे।

अनूप जी - मुझे आती है
संजीत - धन्यवाद
हमनाम -
उन्मुक्त - अल्कोहल के अलावा हम माँसाहार भी नही करते, इसके अलावा खाने-पीने में अपने कोई नखरे नही..सब चलता है।
अमित - आते रहिये..आगे भी लिखेंगे। अपना चिट्ठा नारद समेत अन्य चिट्ठा संकलकों पर भी आता है, अन्यथा आप फीड भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।
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