आइये…सर्दी का स्वागत करते हैं।
November 15, 2007 by Nitin Bagla
अनामदास अपने चिट्ठे पर योरोप की आसन्न सर्दियों की कंपकंपाहट का अहसास करवा रहे हैं…नीरस, बोझिल, उदास सी सर्दियां। काली, धूसर, डरावनी सर्दियां। बैरंग, ब्लैक एण्ड व्हाइट सर्दियां। सर्दियों की बात चली तो महसूस हुआ कि सुबह-सुबह आजकल यहां भी हल्की सी ठंड महसूस होने लगी है। उन्होने योरोप की सर्दियों से मिलवाया तो हमें भी अपने यहां आती सर्दियों की आहट सुनाई दी। लेकिन कंपकंपाहट नही हुई…मन में गुदगुदी सी हो उठी।
सर्दियां….। छत पर या आंगन में धूप में चद्दर बिछा कर कम्बल ओढे सोने का मौसम । उसके बाद धूप में बैठ कर देर तक सरसों के तेल की मालिश और फिर कुनकुने पानी से स्नान। (हफ्ते में चार बार…अच्छा चलो २ बार तो पक्का)। हरे मटर, गाजर, मूली का मौसम। इनसे मन ना भरे तो सिकी हुई गेहूँ की बालियां और चने के बूटे हाजिर हैं। और मीठे के लिये पिण्डखजूर तो है ही। अगर सोना-खाना नही है, उछल कूद करनी है तो देर तक छत पर पतंग उडाने का, अथवा मैदान में गिल्ली-डंडा खेलने का मौसम। थक-हार कर घर आयें तो देर रात तक रजाई में गुडीमुडी होकर बैठे रहने का मौसम।
लड्डुओं का मौसम। गोंद के लड्डू, मेथी के लड्डू, उडद के कड्डू, कसार के लड्डू। गाजर का हलवा, शकरकंद का हलवा। गजक का मौसम। गुड की, शकर की गजक। कुटी हुई तिल्ली की चक्की, साबुत तिल्ली की चक्की, तिल पपडी। या फिर गरमागरम सिकी हुई मूंगफली और गुड?
हरी सब्जियों का मौसम। मेथी का साग, पालक, बथुआ का साग। सरसों का साग। साथ में ढेर सारा घी लगा कर ज्वार, मकई की रोटी। अथवा गरम, मीठे दूध में चूर कर भी। अगर तला भुना खाने का मन है तो मेथी, मूली, पालक, गोभी के परांठों का मौसम। साथ में धनिया/पुदीने की चटनी, कच्चे टमाटर की चटनी नींबू/केरी का अचार। दिन में दो-तीन दफा गर्मागरम चाय, गर्मागरम चाय और गर्मागरम चाय। और उसमें अदरक, लोंग, कालीमिर्च डली हो तो बात ही क्या?
शाम को सिगडी/तगारी में कोयले जलाकर हाथ सेकने का मौसम। सुबह नहाने का पानी गरम करने के लिये दालान में रखे गये चूल्हे के साथ अठखेलियां..कभी उसमें अखबार, तो कभी घास के तिनके तो कभी मूंगफली के छिलके डाल देना। फिर भी ना सुलगे तो फूंकनी से जोर जोर से फूंक देना…(और फूंक देते देते अगर सांस उलटी खिंच गई तो गये काम से
खांसते रहो खुल्ल-खुल्ल)। औरकुछ नही तो ऐसे ही बैठे बठे हाथ तापना।
‘उधर’ ये “..सारी ख़ुशियों और उल्लास के स्थगन का मौसम…” है, तो इधर चार-छः दिन बाद देवोत्थान एकादशी आ रही है। कइयों की आस बंधी हुई होगी…चलो, इस बरस तो ‘चेत’ ही जायेगी। बोले तो…इसी के साथ शुरू हो जायेगा, शादियों का मौसम। बैंड-बाजों…पूंपाडियों का मौसम।
बक्से से पुराने स्वेटर, जर्सी, कोट , मफलर, टोपा, शाल, कम्बल, रजाई निकाल कर धूप देने का मौसम। हालांकि, रेडीमेड के इस जमाने में स्वेटर-जर्सी की बुनाई का चलन बहुत कम हो गया है, अन्यथा ऊन के गोलों का मौसम भी यही है। या फिर पुराने पडे २-३ स्वेटरों को उधेड कर एक नया स्वेटर बना दिया जाये?
और हाँ, जिनके जोडों/घुटनों में दर्द रहता है उनके लिये हायतौबा का मौसम। जुकाम से बहती नाक। फटे(रूखे)हाथ, पैर, गाल, होठ..फटी हुई बिवाइया..रात को आधा घंटा तेल में वेसलीन मिला कर मालिश करने का मौसम।
चलते चलते:
वैसे, ऐसा नही है कि हम यहां ये सारे सुख भोग रहे हैं। सच तो ये है कि ये सब सुख आप अपने घर (फ्लेट नही), अपने गांव, अपने कस्बे में ही महसूस कर सकते हैं। अब घर से बाहर निकल गये(या निकाले गये), तो राजस्थान से हैदराबाद जायें..या भारत से योरोप के किसी देश, हैं तो परदेसी ही। और अब घर जाना भी कितना कम हो पाता है..गये तो तो हद से हद ४-५ दिन। क्या खायेंगे..क्या करेंगे..कितना जियेंगे इन ४-५ दिनों में?
तो फिर आइये…सर्दी का स्वागत करते हैं। ![]()

बहुत खूब बन्धु !
“कइयों की आस बंधी हुई होगी…चलो, इस बरस तो ‘चेत’ ही जायेगी। ”
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी भी ईस सर्दी मे`चेते !
हाहाहा ! ईश्वर सबकी सुनता है!
वाकई अति सुन्दर लेख!
– रजनीश
बहुत बढ़िया नितिनजी
सचमुच हल्की हल्की सर्दी पड़ने लगी है और दिन छोटा होने लगा है। भूख जम कर लगने लगी है।
इस बार आपकी बताई सूचि में से कुछ बाकी ना रह जाये इस बात का खास ध्यान रखना पड़ेगा।
एक दो चीजें आप भी भूल गये मसलन च्य्वनप्राश और उड़द, मेथी और कौंचा पाक!!!!
सर्दियों का स्वागत बहुत अच्छा किया आपने।
हम तो ललक रहे हैं कि सर्दी तेज हो और आनन्द आये!
अच्छा लगा जाड़े से जुड़ी इन मीठी बातों को पढ़ कर। हमारे यहाँ तो हल्की हल्की ठंड तो दो तीन हफ्तों से है।
वाकई!!! बहुत बढ़िया लिखा है बंधु!!
I dnt know abt Hyderabad par Mumbai me to sardi padti hi nahin, this being my second winter am still to wear aomething warm. really miss the winter mornings, lazing around in the blanket, a cup of hot tea…, subah ki dhoop.
वाह दिल खुश कर दिया आपके इस लेख ने! पुरानी यादे ताज़ा हो गयी। I really wish I could go back to the days of my childhood in Delhi!
anyways thanks for bringing smile of my face just with all the remembrances.
रजनीश - सब्र करो, ईश्वर आपकी भी सुनेगा
सागर भाई- हो जाय।
ज्ञान जी, मनीष, संजीत, आलोक, मूनी - टिप्पणी के लिये धन्यवाद ।
Hindi ka kitna achha use kia hai.. sach me bahut garv hota hai.
its actually amazing how u have been so successfull in describing and convincing the reader about the promise which winter brings which otherwise is considered to be such a dull wheather aptly described in the first few lines by you…… Is it the magic of Hindi language that makes it so pleasing and wonderful or is it the manner in which you wrote it….. Whatever but very well written…… Was suddenly translocated back home for the few minutes when i read it…….
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राजीव - टिप्पणी के लिये धन्यवाद।