ओम-शांति-ओम : पिच्चर पूरी फिल्मी है मेरे दोस्त !
November 9, 2007 by Nitin Bagla
२००३ में आई फरहा खान निर्देशित पहली फिल्म ‘मैं हूं ना’ अगर आपने देखी हो, तो आपको याद होगा कि किस तरह से उन्होने आर डी बर्मन साहब के गाने, ७० के दशक की लम्बे कालर वाली शर्ट और बेल बाटम पेन्ट का इस्तेमाल किया था।(नही देखी हो तो अब देख लीजियेगा, हफ्ते में दो बार किसी न किसी चैनल पर आती है)।
कट टू २००७। ‘ओम शांति ओम’। फरहा खान एक कदम आगे जाती हैं। अबकी बार कहानी, घटनाएं, दृश्य, मेकअप, कलाकार…सब वहीं से (३० साल पहले से) उठाती हैं…उसमें रोमांस के लिये शाहरुख की अदाएं, कामेडी के लिये पुराने कलाकारों की नकल(मिमिक्री), इमोशन और ड्रामा के लिये ‘कर्ज़’ की कहानी, हिप हाप के लिये धिनचक गाने और चटखीले रंग मिलाती हैं और अच्छी तरह से फेंटती हैं। साथ में मिलाती हैं ढेर सारा प्रचार, और रिलीज के लिये दिवाली का त्यौहार, और लीजिये, हो गई ओम-शांति-ओम तैयार।
फिल्म की कहानी में कुछ नही है..मेरा मतलब है बताने लायक कुछ नही है। अगर आप पृथ्वी पर ही रहते हैं और फिल्मो का थोडा बहुत भी शौक रखते हैं तो ट्रेलर देख कर ही कहानी समझ लिये होंगे। जो बताने लायक है, वो है प्रस्तुतीकरण। अब ये आपके टेस्ट पर निर्भर करता है, या तो आपको बहुत पसंदा आयेगा…या बिल्कुल बेकार। तटस्थ (
) नही रह पायेंगे।
वैसे एक सवाल। क्या सत्तर का दशक सिर्फ बेल बाटम पेन्ट, हाथ में चिडी बल्ला लेकर नाचते जीतेन्दर, कान ढंकते बाल, बडे गोगल्स, धमा धम संगीत (एक शब्द में कहें तो मनमोहन देसाई) का ही थी? अभी NDTV पर देख रहा था, सत्तर का दशक ‘गर्म हवा’, ‘शतरंज के खिलाडी’ और ‘निशांत’ का भी था..समानांतर सिनेमा के लिये मील का पत्थर था वो समय। लेकिन ये फरहा खान की अपनी मर्जी है वो क्या दिखायें…सो ‘मैं हूं ना’ और ‘ओम शांति ओम’ सामने आती हैं।
कुल मिला कर एक मसाला फिल्म, दिमाग पर जोर डाले बिना, सिर्फ टाइमपास करने जाना है तो जरूर जाइये…लेकिन अगर आप जिन्दगी में सिनेमा या सिनेमा में जिन्दगी ढूंढते हैं, तो फिर…पिच्चर आपके लिये नही है मेरे दोस्त।
चलते चलते:
अभी ‘सांवरिया’ नही देखी है लेकिन विभिन्न साइट्स पर सांवरियां और ओम-शांति-ओम पर लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ रहा हूं..सांवरियां पर प्रतिक्रियाएं ठंडी आ रही हैं और ओम-शांति-ओम की तारीफ। ये कितना प्रायोजित है और कितना सही, नही कह सकता। मेरे खयाल में फिल्म तो सांवरिया भी बुरी नही होगी, पर भंसाली से लोगों को उम्मीदें कुछ अलग तरह की हैं। ओम-शांति-ओम कोई बहुत बढिया फिल्म भी नही है..दो से तीन स्टार हद से हद लेकिन फरहा खान से मसाला की उम्मीदें थी..वही मिला, सो बुरा नही लगा। भंसाली से ‘ब्लेक’ के बाद और बेहतर सिनेमा की अपेक्षा थी, हो सकता है उतनी अच्छी ना हो। फिल्म देख लें फिर अपना नजरिया रखेंगे।

well said OSO is senselessless entertainment, saawariya bhool ke bhi mat dekhna it sucks, and coming from Bhansali it is even more painful..I just an hour back wrote my dukhda on saawariya and OSO.
हम तो वैसे भी प्रोमो देख कर ही कुछ कुछ समझ गये थे कि यह पिच्चर अपने काम की नहीं हाँ और साँवरिया भी!
रणबीर कपूर के चेहरे पर अपने पिता दादा की अभिनय विरासत के कोई लक्षण नहीं दिखे। हाँ सोनम से कुछ उम्मीदें है, अब पिच्चर देखने के बाद बाकी का पता चलेगा।
चलते चलते में आपने सही लिखा है, मुझे भी यह सब प्रायोजित लगता है, साँवरिया को हल्का और oso को अच्छी पिकचर दिखाने का कुछ ना कुछ गरबड़ झाला….
mein aapki comments se poori sehmat hu…abhi maine bhi likha hai usi ke baare me ek blog……
suna hai aap katrina ko dekh kar aa rahe hai….
आलोक - मैं अभी भी नही देख पाया सांवरिया।
सागर भाई- टिप्पणी के लिये धन्यवाद।
स्वाती - धन्यवाद। आपने सही सुना है
lovely picture