इस बार दिवाली पर घर जाना नही हो पाया….हैदराबाद में ही मनेगी अपनी दीवाली। ऐसा नही है की पहली बार घर से दूर दिवाली मना रहा हूं, छात्रावास में पढाई होने के चलते बचपन की सब दीवालियां घर से दूर ही मनी हैं, लेकिन कालेज के समय से कोशिश रही है कि दिवाली पर तो घर पहुँच ही जायें। खैर…
तो अपना दुखडा साझा करते हैं उन लोगों के साथ, जिनका कि काम ही ऐसा है कि उनकी दिवाली भी घर से बाहर, अपनों से दूर ही मनता है। शायद इसलिये कि हम और आप जैसे कई, दिवाली पर समय से अपने घर पहुंच जायें…या हमारी दिवाली जगमगाती हुई मने…या हमारी दिवाली सुरक्षित, सुकून भरी मने। शायद ये पर्दे के पीछे के वो कलाकार हैं जो स्क्रीन पर नजर तो नही आते, पर मंच पर होने वाले हर घटनाक्रम में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।
ड्राइवर- एक दुनिया है जो रास्ते पर चलती है। सडक पर, रेल की पटरियों पर। बस, ट्रक, ट्रेन…। बदकिस्मती से एक दिवाली की एन शाम को, पूजन के समय बस में सफर करना पडा था। बहुत अजीब लगता है उस समय। जरा सोंचिये..आप अंधेरे में चले जा रहे हैं…सडक/पटरी के दोनो और दुकाने , घर, रास्ते जगमगा रहे हैं, पटाखों की आवाजें आ रही हैं…और बस के भीतर अंधेरा, इंजन की घर्र-घर्र और ठिकाने पहुंचने की जल्दी । बहुत अजीब सा महसूस होता है। हम तो फिर भी १-२ घंटे में घर पहुंच जायेंगे..लेकिन जो चला रहा है…वो तो घर से दूर ही है..पता नही कब पहुंचेगा।
पुलिस- पुलिस वालों का काम त्यौहारों पर और बढ जाता है..खासकर होली दिवाली दशहरा…जब हुडदंग होने की संभावना अधिक हो। शायद इसीलिये यह विभाग हर त्यौहारों दूसरे दिन मनाता है…मुख्य त्यौहार शांति से निपट जाये..तो इनकी सिरदर्दी हटे।
बिजली विभाग- वैसे तो आमतौर पर बिजली के आने जाने से कोई फर्क नही पडता, आदत हो चुकी है। पर दिवाली की शाम को इनके ऊपर खास दबाव रहता है, आपूर्ती बनाये रखने का। भई रोशनी की शाम है, इस दिन तो बनी रहे।
आपातकालीन सेवाएं (स्वास्थ्य, अग्निशमन आदि)- दिवाली जैसे त्यौहारों पर इन सेवाओं का काम और बढ जाता है विशेषकर पटाखे चलाते समय बरती असावधानियों की वजह से।
अगर आप भी घर से दूर हैं…तो मेरे और इन लोगों के साथ दुख साझा कर सकते है
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यह दिवाली आपके जीवन में सुख, समृद्धी, हर्ष, उल्लास लाये।
खुशियों के दीप आपकी जिन्दगी में झिलमिलाएं।
आप सबको रोशनी के इस पर्व की हार्दिक मंगलकामनाएं।
और हाँ, खूब खायें, पियें नही। दीप जलायें, पटाखे नही। दिल मिलायें, पत्ते नही।


आपका दुख समझ सकता हूं। पर घर पर रहते हुये भी हमारा एक दुख है – काम और फोन पीछा नहीं छोड़ रहे।
दिवाली मुबारक!
घर से दूर थे… लेकिन अपना घर भी उतना दूर तो नहीं था, हम आपका इन्तजार कर रहे थे, आप आये ही नहीं।
दीपावली और नये साल की आपको बहुत बहुत शुभकामनायें।
Rei agro Ltd
Date 29-10-2008
SRI BABA