फ्रांस प्रवास १ - काँच की सडकें!
November 4, 2007 by Nitin Bagla
छुटपन में अपने दोस्तों के बीच की गपबाजी में एक बात बारबार सुनी थी…”पेरिस की सडकें कांच की होती हैं”। बहुत रोमांच हुआ करता था उस समय, कैसी होती होगी कांच की सडक, कैसे तो लोग चलते होंगे उन पर..चलते क्या होंगे…फिसलते होंगे…और गाडियां..क्या सरपट दौडती होंगी। एक और बात जो शायद सामान्य ज्ञान की किताब में भी था, कि “किस देश में मच्छर नही होते?”…फ्रांस। फ्रांस जाने का कार्यक्रम बनते समय जो बात सबसे पहले ध्यान में आई वो बचपन के ये किस्से थे। भई कांच की सडकें तो नही देखन मिलीं..हाँ जो थीं वो एकदम सपाट और साफ सुथरी थी। और मच्छर ..एक मच्छर तो मैने बरामद कर ही लिया वहां। फोटो लेने वाला था कि उड गया..लेकिन दिल को पता नही क्यों..अजीब से खुशी हुई। वैसे अगर बचपन में आ जाता तो कितना निराश होतामेरा बाल मन…जो मच्छर नही होना था, वो मिला, और कांच की सडक..नही मिली
|
(चित्र- Champs-Élysées - पेरिस की सबसे मंहगी सडक। इसके दोनो ओर मंहगे शोरूम, केफे, सिनेमाघर, फैशन हाउसेस आदि हैं। पृष्ठभूमि में Arc De Triomphe दिख रहा है। हिन्दी में विजय द्वार। इंडिया गेट का फ्रेंच संस्करण कह सकते हैं।)
******
हवाईअड्डे से अपने गंतव्य तक कैसे पहुँचूंगा, इसकी बडी चिंता थी। अपने यहाँ मेहमानों को पिक अप उपलब्ध करवाते हैं ताकि कोई दिक्कत नही हो। लेकिन मुझे बताया गया था कि ऐसी कोई सुविधा वहां नही रहेगी। हवाई अड्डे से टेक्सी लेने का और निकल लेने का। पते का प्रिंट साथ लेकर चलने का और टेक्सी वाले को थमा देने का। मैने पूंछा..भाव-ताव। बिना किराये पर बहस कियें टेक्सी में कैसे बैठ जायेंगे :)। खैर, एयर इंडिया कि कृपा से विमान ८ घंटे लेट। सो जहाँ दिन के २ बजे मुझे मुझे पहुँच जाना था, पहुँचा रात १०:३० बजे। और चिंता हुई। अंजान शहर और भाषा भी नही आती। हवाई अड्डे से टेक्सी पकडी, टेक्सी वाला कुछ बोला तो बिना कुछ कहे प्रिंट उसे थमा दिया। रापचिक टेक्सी…जी. पी. एस. लगी हुई। मेरा गंतव्य शायद पेरिस के बाहर था..करीब एक घंटे की ड्राइव के बाद जिस जगह पहुँचना था उस उपनगर में तो पहुँच गये, लेकिन अपना वांछिता पता ना मिला। पहले तो गलती से एक घुडसाल में घुस गये, फिर बहुत देर गोल गोल चक्कर काटते रहे..ड्राइवर कुछ कहे फ्रेंच मिश्रित अंग्रेजी में और मैं कुछ कहूं अंग्रेजी में।अब अगर अपने देस में हों तो नुक्कड पर उतर कर किसी भी दुकान पे पूंछ लो, पर वहां ना दुकान, ना आदमी। बहुत देर बाद दिमाग की बिजली चमकी और मैने उसे अपने गंतव्य पर फोन करके पूंछने को कहा, जिसका कि नम्बर मेरे पास था। आखिरकार किसी तरह सही ठिकाने पहुंचे।
*******
एक यूरो करीबन पचपन रुपये का होता है। ये अच्छे से याद था, पर लोगों भूल जाने की सलाह देकर भेजा था। चेतावनी मिली कि वहां कुछ भी ५५ से गुणा करके मत देखना नही तो जीना मुश्किल हो जायेगा। पर ऐसा कैसे हो सकता था। जब टेक्सी वाले को ७० यूरो चुकाये गये, तो मुझे हैदराबाद-मुम्बई-हैदाराबाद का हवाई किराया नजर आ रहा था…किसी तरह खुद को संभाला
| पर बताया गया कि टेक्सी वाला लाया एकदम सही था।बिना किसी चीटिंग के।
(चित्र - केटरीना कैफ- मुम्बई हवाई अड्डे पर)
********
अंग्रेजी और फ्रेंच की प्रतिद्वंदिता तो सब जानते हैं। आज जो स्थान दुनिया में अंग्रेजी का है, वो किसी समय फ्रेंच का हुआ करता था। लेकिन आज भी फ्रंसिसियों का अपनी भाषा के प्रति प्रेम लाजवाब है। बिना जरूरत कोई भी अंग्रेजी में बात नही करता। किसी शब्द को लेकर एक प्रतिभागी से बात हो रही थी जो अंग्रेजी और फ्रेंच में एक जैसा है। बातों बातों में मैने कहा “ओह दिस वर्ड कम्स फ़्रोम इंगलिश ओनली”..तुरंत प्रतिवाद हुआ..“नो नो..ईत गोज़ फ्राम फ्रेंच टू इंगलिश” (हालांकि दोनो लेटिन से आती हैं)।
********
जहां ठहराया गया था वहां शाम ५ बजे बाद वायरलेस इंटरनेट बन्द हो जाता था, सो लेपटाप बेकार और सर्फिंग के लिये वहां रखे हुए कम्प्यूटर्स की शरण में जाना होता। वहां सारे एपल मेक (Apple Mach)लगे हुए। यहां तक तो ठीक, पर सब फ्रेंच में और की बोर्ड भी फ्रेंच वर्ज़न। अब एक तो आज तक एपल पे काम नही किया। वो तो फिर भी किसी तरह RnD करके चला लूं..पर फ्रेंच..? बहुत नाइंसाफी है। एक मेल लिखने में आधा घंट लग जाता। और हिन्दी तो पढ ही नही पाया..यूनिकोड में भी। भोमियो की उपियोगिता उसी दिन समझ में आई।
********
निकलते समय मुंबई एयरपोर्ट पर रातगुजारी काफी सही रही। पुरानी दिल्ली के रेल्वे स्टेशन जैसी भीड…बैठने को कोई जगह नही..ट्राली पर सामान रखो और पसर जाओ। पहले तो खबर आई कि आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम आने वाली है। अपन केमरा लेकर एकदम तैयार। T20 हार कर आई थी उस शाम को टीम और वो हार और शायद सीरिज के बीच हुआ “बंदर विवाद” खिलाडियों के चेहरों पर दिख रह था। सब के मुह सूजे हुए है थे। जैसे ही टीम बस आई..अच्छी खासी हलचल मच गई। हालांकि टी. वी. पर जिन चेहरों को देखते ही पहचान जाते हैं असलियत में उन्हे देखकर पहचानने में दिक्कत हुई। खैर जब तक ये निकले, बिना किसी चेतावनी के केटरीना आ गईं। भई अपनी तो शाम बन गई। फोटो तो लिये ही, ये भी पडताल की गई कि ये वाकई में खूबसूरत हैं या सिर्फ परदे पर दिखती हैं :)। (अगर आप कहीं जायें और लोग धडाधड आपकी तस्वीरें उतारना शुरू कर दें आपके चारों तरफ खडे हो जायें तो कितना असहज हो जाता है। ये शायद प्रसिद्ध होने की कीमत है। आप इत्मीनान से (अपनी) नाक में अंगुली भी नही डाल सकते…)
चित्र- मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रात को २ बजे। बैठने को पर्याप्त जगह तक नही।
खाने-पीने को लेकर इतना कुछ लिखना है, कि पूरी पोस्ट बन सकती है..सो वो अगली बार।

Bhai Paris yatra phir se mubarak ho!
Kya kya kharidari kari, yatra vritant bhi vistaar se likho ; tumhare shabdo ke vayuyaan me hum bhi paris bhraman kar lenge
यात्रा का वर्णम संक्षिप्त सा लगा। भाई कुछ विस्तृत लिखो!!
खाने पीने आदि सब कुछ लिखो। और हाँ तस्वीरें कुछ साफ नहीं आई हैं।
यह लाईन पढ़ते हुए बरबस हँसी आ गई।
आप इत्मीनान से (अपनी) नाक में अंगुली भी नही डाल सकते…)
i had so much fun reading that I am awaiting the next installment on food! Interestingly, In Tamil Nadu when people refuse to speak anything except Tamil why is that no one thinks of it as love for their language??


railway station will seem sparse with people! Intl area is complete madhouse! Now that new airport is coming, there is sigh of relief but new worry comes up, HOW does one reach there?? The connecting roads are not built yet !!!!!!!!!
kuch bhi kaho
I wonder why Katrina was hanging outside instead of in some airline’s VIP lounge
Also, if u r complaining about Mumbai airport’s scarcity of seating space, fly once out of Bengaluru (Bangalore)
Well, apana desh nirala hai
आलोक -धन्यवाद । खरीदारी कुछ विशेष नही हुई दोस्त..बस थोडा बहुत घूमे फिरे।

सागर भाई - संक्षिप्त यात्रा थी..सो छोटा सा विवरण है। तस्वीरों पर क्लिक करेंगे तो बडी दिखाई देंगी, हाँ अगर आपको केटरीना के और फोटो चाहियें तो मेल पर भिजवा दूंगा
मूनी- शुक्रिया।
तमिल लोगों का भाषा प्रेम प्रशंसनीय है। लेकिन अगर किसी कि तमिल ना आती हो, और फिर भी आप जानबूझ कर, हिन्दी/अंग्रेजी आते हुए, उससे तमिल में ही बात करें तो गलत है। (वैसे मैं तमिलनाडु में नही रहा हूं..सिर्फ सुना है इस बारे में)।
चेक-इन करने के लिये तो केटरीना को लाइन में खडा ही रहना पडा बहुत देर तक।
बंगलोर हवाई अड्डे का काम नही पडा कभी…
देस तो अपना है ही निराला…कुछ कहने की जरूरत नही
[...] November 25, 2007 by Nitin Bagla भाग १ से आगे [...]
[...] 18, 2007 by Nitin Bagla भाग १- काँच की सडकें भाग २- परदेस में [...]