बडे बूढे कह गये हैं..”सुख के सब साथी दुःख में ना कोय”। गलत नही कहा। ज्यादा दिन नही बीते हैं, जब महेन्द्र सिंह धोनी के निर्माणाधीन घर पर हमला हुआ था रांची में…।या विज्ञापन बाजार में खिलाडियों के भाव मिथुन दा के भाव से भी कम हो गये थे या पूरे T20 में पेप्सी ने किसी क्रिकेटर को लेकर कोई विज्ञापन नही बनाया/दिखाया। पर १५ दिन बहुत होते हैं ये सब बदलने के लिये। और हिन्दुस्तान की जनता के लिये तो खासकर…क्योंकि अपने यहाँ याददाश्त बहुत कमजोर होती है पब्लिक की। तो साहब और अब फिर से “अनहोनी हो गई होनी”..और बिना किन्ही अपेक्षाओं के गई अन्डरडाग्स की टीम ने कप उठा लिया….एक नाखून-कतर (बोले तो Nail Biting) फाइनल में। गिले शिकवे सब माफ।
चलिये ये देखा जाये के ये जीत क्या मायने रखती है विभिन्न Stakeholders के लिये।
BCCI- फिर तिजोरी भरने का मौका। वर्ल्ड कप में हार और ICL प्रकरण को देखकर ऐसा लग रहा था कि दिन बुरे चल रहे हैं..पर उस सब के ऊपर एक धुली हुई…साफ-सफेद चादर बिछा दी जाये…उस पर २ मिलियन डालर बिछाये जायें और फिर से लम्बी तान के सो जाया जाये…अगले झटके तक के लिये।
ICC - वेस्टइंडीज वर्ल्डकप बहुत घाटे का सौदा रहा था..और बहुत नीरस भी। T20 इनके लिये भी अमिताभ का KBC सिद्ध हुआ है। भारत पाकिस्तान के फाइनल में पहुंचने से जहाँ उपमहाद्वीप में फिर से दरवाजे खुले हैं…वहीं तीन घंटेय फार्मेट और चीयर डांसर्स के दम पर पश्चिम में फुटबाल को टक्कर देने की कोशिश रहेगी। T20 लीग भी शायद इसीलिये बनाई गयी है।
बाजार - भाई व्यापारी कभी घाटा नही खाता। खाता है, तो अगली बार दुगने वसूलता है। जीतने लगे हैं..फिर विज्ञापनों की दरें बढ जायेंगी…नये नये उत्पाद बेचे जायेंगे…Tata Sky की जो लाइफ झिंगालाला हुई थी मार्च अप्रेल में…उससे उबरने का मौका मिलेगा।
खिलाडी - Fast-Furious-Cool…ये तालमेल चाहिये यहाँ। जो ये कर गया…वो ले गया। जैसे गेम छोटा है…वैसे ही मुझे लगता है खिलाडियों की शेल्फ लाइफ भी छोटी रहेगी। शेल्फ लाइफ छॊटी होने का मतलब किसी एक खिलाडी का १५ साल तक दबदबा ना रहे…तो नये नये लोगों को मौके मिलेंगे..जो कि अच्छा ही है।
ICL - फिलहाल कुछ कहना मुश्किल, पर मुझे लगता है कि दीर्घावधी में ये ICL के लिये भी अच्छा ही होगा। T20 का भविष्य मुझे Club Football जैसा लग रहा है। समय कम, सो आयोजन में खर्च कम..और रोमांच अधिक। अगर डालमिया निकट भविष्य में ICL में आते हैं, तो वो इस संभावना का खूब सही दोहन कर पायेंगे।
भारतीय क्रिकेट के लिये - सबसे बडा फायदा…सचिन-द्रविड-गांगुली अपरिहार्य नही हैं।अच्छे खिलाडियों की अगली खेप तैयार है। वैसे, जैसे देश भगवान भरोसे चल रहा है, वैसे ही प्रतिभाएं भी भगवान भरोसे आ जाती हैं ऊपर तक…इसलिये ये तो ना ही माना जाये कि BCCI या क्रिकेट के कर्त्ताधर्ताओं की किसी सोंची समझी योजना/रणनीति के तहत ऐसा हुआ। १९९६ की इंगलैण्ड सीरीज में द्रविड-गांगुली मिल गये थे, २००२ में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध जहीर-युवराज मिले थे..ऐसे ही यहाँ रोहित शर्मा मिल गये। ये भी कोई जरूरी नही कि टीम के साथ कोई विशेषज्ञ कोच हो। बस आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं ना रखें, बोझ ना बनायें..और खेल को पूरी तरह से बाजार के हाथ में ना जाने दें।
क्रिकेट के लिये – परिवर्तन संसार का नियम है, और मेरा मानना है कि जिसने समय के साथ खुद को बदला, जो बार बार अपने को खोज कर अपने अंदर नयापन लाता रहा… वो ही लम्बे समय ता टिक सकता है।(बोले तो Innovation is the key)। वरना तो “यूनान मिस्र रोमां सब मिट गये जहाँ से”। क्रिकेट ने दूसरी बार ऐसा किया है- पहले टेस्ट क्रिकेट से एकदिवसीय, और अब एक दिवसीय से T20। जो पुराना है, उसका अपना स्थान है..पर जो नया है..वो अधिक रोमांचित करता है। दोनों का संतुलन बना रहे बस। बाकी अपना मानना है कि तीनों की तुलना करना उतना ही गैरजरूरी है जितना पाकिस्तानी कप्तान का मैच के बाद “मुस्लिम्स इन पाकिस्तान/आल ओवर वर्ल्ड” को थैंक यू/सारी, बजाय “फेन्स आल ओवर वर्ल्ड” के।
और आखिर में ..हमारे लिये- भई अपन तो पब्लिक हैं। महीने भर बाद हारने लगे तो फिर गरियायेंगे,पत्थर उठा कर मारेंगे..तुम्हारे नाम कि फेयरनेस क्रीम और रेजर (और भी काफी कुछ) इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। जीतोगे..तो फिर पुचकार लेंगे..फिर गला फाड कर चिल्लायेंगे, फिर सिर चढायेंगे। क्या करें भाई..याददाश्त बडी कमजोर है। दिमाग की RAM बहुत कम है…जिन्दगी में और भी बहुत गम हैं
चलते चलते:
धोनी और उनकी टीम को एक शानदार जीत के लिये धन्यवाद..बधाई..साधुवाद।
मैच के बाद हर्ष भोगले, सुनील गावस्कर से पूंछ रहे थे..क्या T20 का भारत में समय आ गया है। भैया, दिल पर हाथ रख कर कहियेगा कसम से ..आप में से किस किस ने अपनी गली में, छत पर, बरामदे में, पार्किंग लाट में, बिल्डिंग के कारीडार में..यही फाइव-टेन-ट्वेन्टी-ट्वेन्टी नही खेला है?
ट्वेन्टी – ट्वेन्टी का हिन्दी नाम क्या होगा, सोंच रहा हूँ..बीस-बीस/चालीस/पन्द्रह-बीस-पच्चीस कहना अच्छा नही लगता..क्या (चार सौ) बीस क्रिकेट कहें?..सोंचियेगा
।


जीत गये. चलिये – हैदराबाद के बम ब्लॉस्ट के गम भुला दीजिये. RAM में ज्यादा नहीं भर सकते! कुछ दिन बम-बम हो जायें.
चलिये एक शानदार जीत के लिये धन्यवाद..बधाई..साधुवाद हमारा भी लगा लिजिये.
बाकी सब ठीक है.
जो भी हो खेलप्रेमियों के लिए गर्व करने का एक पल और आया है ।
जिसे टी वी वाले बरसों बरसा दोहरायेंगे । जिसके सहारे गली क्रिकेट में खिड़कियों के शीशे कुछ ज्यादा टूटेंगे ।
जिसके सहारे लोग चकदे इंडिया और भारत माता की जय के बुलंद नारे लगायेंगे ।
लेकिन 20-20 का बुखार जल्दी उतरे तो अच्छा । पांच छह दिन बाद ऑस्ट्रेलियाई दौरा हॉलीवुड फिल्मों के दैत्य की तरह सामने खड़ा होगा ।
टीम के जीतने की बधाई !!
bhai chalchitra samikshchak se khel samikshak ka aapka safar ati uttam raha hai, aage bhi aap se aur ki umeed hain.
ज्ञान जी – बम बम कैसे होते हैं?
समीर जी- धन्यवाद
यूनुस जी-सही कहा आपने
ममता जी- बधाई
आलोक-