ज़िन्दगी चल रही है। हमारे लिये, जो थोडे खुशकिस्मत थे कल शाम को…। पर जिन्होने अपने खोये हैं इन धमाकों मे…उनके लिये तो शायद सब कुछ बिखर गया। पूना से आये हुए वो छात्रों के परिवार, यो टी. वी. पर बिलख बिलख कर रोती दिखाई दी वो माँ और बाकी लोगों के परिवार, यार दोस्त….।
सुबह सिकंदराबाद गया था, हालांकि रविवार को वैसे भी सडकों पर आवाजाही कम होती है, और दुकाने भी बन्द रहती हैं…पर फिर भी रोजमर्रा की तरह आवागमन था सडकों पर। (शाम को पता चला कि नजदीक से सारे शापिंग माल, जो आमतौर पर रविवार को खुले रहते हैं, आज बंद थे।)
कुछ सावधानियां बरतनी होंगी शहर को। सप्ताहांत पर हैदराबाद सेन्ट्रल, बिग बाजार, प्रसाद, ईट स्ट्रीट आदि जगहों पर पैर रखने की जगह नही होती, सांस लेना मुश्किल। सुरक्षा के इन्तजाम वाकई बहुत ढीले हैं, कोई भी कुछ भी लेकर घुस सकता है। कुछ दुर्घटना हो जाये, तो ज्यादा लोग भगदड से हताहत हो जायेंगे..ऐसी संरचना है इन जगहों की। हालांकि लुम्बिनी पार्क, गोकुल चाट और मक्का मस्ज़िद…अपेक्षाकृत खुली जगहें थी..पर अगली बार(भगवान ना करे) गर निशाना कोई बन्द जगह/बाजार/काम्प्लेक्स हुआ तो परिणाम और बुरे होंगे।
पिछली बार हैदराबाद के बारे में सात पसंदीदा बातें लिखी थीं..तो कहा गया था कि दोष भी तो गिनाओ। शायद एक दूसरे पर भरोसा करना और मिल जुल कर रहना इस शहर का सबसे बडा दोष है। शांत…सुस्त शहर है, लोग अपने में मगन। क्या बदलें? सिनेमाघर में जायें तो अपने बाजू वाले को शक की निगाह से देखें? या बाजार में खरीदरी करने जायें तो लोगों से बच बच कर निकलें? लोगों को देख कर मुस्कुराना छोड दें या तहज़ीब से बात करना छोड दें? ऐसा करना तो शायद उन लोगों के मंसूबे कामयाब कर देना होगा। ऐसा हरगिज़ नही करेगे।
जिन्दगी चल रही है।
कल ये भी तो हो सकता था, हम लुम्बिनी पार्क में शो देख रहे हो सकते थे..या बम किसी सिनेमाघर में फटा हो सकता था जहाँ शनिवार/रविवार को अक्सर चले जाया करते हैं।
सही कह रहे हैं नितिन किस किस को शक की निगाह से देखें।
यह दोष बनाए रखें.. शुभकामनाएं..
यह काम गुप्तचरी का है, हम आप किसी को क्या शक से देखेंगे. दुष्ट-प्रवृतियों पर मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आँखे मुंदे रखने का परिणाम है. अन्यथा धमाके तो होते रहेंगे. आज वे मरे हैं, कल हम मरेंगे.
Hi, its gd or bad only time will tell, but as some else has also commented above we need to get out of this seudo secular garb, a per son is gd or bad not a religion, but it require guts to commit this which as we all know our spineless netas dont have, they are secular to the core.
तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.
सामने सब के स्वीकार करता हूँ
हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
कलम है मेरी टूटी फूटी
थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
हर हिन्दी लिखने वाले का
प्रकट आभार करता हूँ
आप लिखते रहिए
मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
NishikantWorld
यह कहानी पुरानी हो गयी है, नया चीट्टा कब लिखेगे???
well said OSO is senselessless entertainment, saawariya bhool ke bhi mat dekhna it sucks, and coming from Bhansali it is even more painful..I just an hour back wrote my dukhda on saawariya and OSO.