हर हफ्ते-दस दिन में देश को एक मुद्दा मिल जाता है। मुद्दा कुछ भी हो सकता है, कोई विवाद हो तो सोने पे सुहागा।…कहीं से भी उठ सकता है…सामान्यतः पहले मीडिया इसे लपकता /उठाता है…दृश्य-श्रव्य मीडिया पहले क्योंकि उसे २४ घंटे कुछ न कुछ दिखाना होता है..फिर अखबार-पत्र-पत्रिकाएं ले लेते हैं…बचा-कुछा कुछ चिट्ठेकार भी लपक लेते हैं…बहस होती है..पक्ष-विपक्ष बन जाते हैं…भावनाएं जोर मारती हैं..काफी और भोजन की मेजों पर बहस होती है…पान्डेय जी की भाषा में मुद्दे को “….फेंटते चले जाते हैं – जब तक मक्खन नहीं निकल आता. फिर वे मक्खन फैंक कर लस्सी के नाम पर छाछ परोस देते हैं” …जिसे पीकर लोग डकार भी नही मारते…। असली घी वो लोग खा जाते हैं, जो इन विवादों का हिस्सा होते हैं..क्योंकि उन्हे मुफ्त का प्रचार मिल जाता है।
फिर…फिर एक नया मुदा आता है..पुराना कहां चला जाता है, किसी को याद भी नही रहता …वैसे भी जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है….मीडिया भी भूल जाता है क्योंकि उसे सबसे तेज बने रहना है। वो कहता है..हम वो दिखा रहे हैं जो जनता देखना चाहती है….जनता बेचारी वही देखती रहती है जो वो दिखा रहे हैं….कासे कहूँ टाइप।
वर्तमान और बीते कुछ महीनों के मुद्दे, जिन्हे खूब उछाला गया, पर जिनसे शायद ही किसी का कुछ भला हुआ हो
ताज….. – जो एस. एम. एस. करे…वही करे उस पर नाज
शिल्पा शेट्टी – रिचर्ड गेरे – दे ना..ना दे रे
दास्तान-ए-ऐश्वर्या-अभिषेक- नाउ टेस्ट्स लाइक बासी मिल्कशेक
राखी सावंत-मीका- रंग पड गया फीका
भारतीय क्रिकेट की दुर्दशा/कोच पुराण-दो मैच जीते,फिर शुरू गुणगान
इन सब के बीच कुछ ऐसे मुद्दे जो भीड में खो गये(खो जायेंगे)…पर जिनके जवाब ..शायद ही मिलें
राष्ट्रपति पद-बढती लडाई, घटता कद
निठारी की चीखें – क्या ले पाय हम कुछ सबक?
विदर्भ के किसानों की आह – सब भगवान भरोसे , किसी को नही परवाह
फिर बरसात – घरों में पानी, माथे पर हाथ
राजस्थान में गुर्जर उत्पात- कहां तक फैलेगी आरक्षण की आग?
और भी बहुत कुछ हैं….पर क्या करूं..मैं भी आम जनता हूं ना…याददाश्त बडी कमजोर है
सही कहा आपने!!
कुछ मुद्दे और भूल गये आप जैसे प्रिंस और सुरज का गड्ढे में गिरना, बिना ड्राईवर की कार का सड़कों पर दौड़ना आदि।
बाकी मेहनत अच्छी करी आपने।
नितिन बागला> …याददाश्त बडी कमजोर है.
यह आपकी नहीं हिन्दुस्तान की समस्या है. तभी तो मुद्दे बनते/उछलते और गुम होते हैं.
बहुत सही-वैसे न भूलें तो जीना संभव नहीं. समय को इसीलिये सबसे बड़ा मरहम कहा गया है, हर घाव भरता चलता है और जीवन बढ़ता जाते है. बढ़िया शोध.
संजीत, सागर भाई, ज्ञानदत्त जी, समीर जी टिप्पणी का शुक्रिया ।
समीर जी, समय तो मरहम है ही, पर बेवजह मुद्दों में समय खराब करना और जहाँ जरूरत हो उसे दबा देना बुरा लगता है।