एल्लो…इतना हल्ला कर रहे थे हैरी भैया की नई किताब का। पूरा माहौल बना कर तैयार किया हुआ है २१ जुलाई के लिये..कि किताब रिलीज होगी, पढेंगे, ये होगा, वो होगा, हैरी बचेगा..मर जायेगा ..पता नही क्या क्या। हैरी पाटर श्रॄंखला की आखिरी किताब Harry Potter and the Deathly Hallows अपने समय की सबसे ज्यादा [...]
Archive for July, 2007
१ करोड पाउण्ड की सुरक्षा धरी रह गयी!
Posted in Harry Potter, Piracy, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, हैरी पोटर on July 18, 2007 | 10 Comments »
हिन्दी का हैरी…
Posted in Harry Potter, Hindi, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, हिन्दी, हैरी पोटर on July 14, 2007 | 4 Comments »
इस मौसम में, जब हैरी पाटर श्रृंखला की पाँचवी फिल्म सिनेमाघरों में पहुँच गई है और (संभवतः)आखिरी पुस्तक २१ जुलाई को निकलने वाली है, आप चाहकर भी हैरीमय होने से नही बच सकते। और अगर मेरी तरह उसे पसंद भी करते हों तो बात ही क्या है। चाहे इसे मार्केटिंग और मीडिया मेनेजमेन्ट कहिये या [...]
हाथ दिखाई के नुस्खे
Posted in बकर, मनोरंजन on July 13, 2007 | 9 Comments »
आपने कभी किसी को हाथ दिखाया है?
नही भाईसाहब, माफ कीजिये, थप्पड-घूंसे वाला हाथ नही, गलती हो गई। ( वो आपका बेलन/चिमटे/झाडू वाला भी नही आंटी जी )। हाथ बोले तो हथेली…जिसमें होती है रेखाएं जिन्हे कि बाज लोग पढ कर आपका आगापीछा बता सकते हैं। वैसे कई लोग इसे मानते हैं कई नही मानते, व्यक्तिगत [...]
कितनी ‘लाल मस्जिद’ ?
Posted in आतंकवाद, पाकिस्तान, मुद्दा on July 9, 2007 | 6 Comments »
पाकिस्तान की इस्लामाबाद स्थित लाल मस्जिद करीब पिछले २० दिन से सुर्खियों में है। वैसे तो सरकार और लाल मस्जिद के बीच तनातनी पिछले ५-६ महीनों से चल रही थी और यह भी सुना/पढा है कि लाल मस्जिद में लड रहे लोगों पर पहले मुशर्रफ का ही हाथ हुआ करता था, लेकिन लगता है खुद [...]
सात अजूबे – अपनी नजर से
Posted in बकर, मुद्दा, विचार on July 7, 2007 | 9 Comments »
“हाँ…तो बोलो बच्चों अजूबा क्या है?”- मास्टर जी ने छडी घुमाते हुए गुटखे की जुगाली की और कक्षा में बैठे छात्रों से पूँछा ।
एक अतिउत्साही बालक बोला- गुरुजी, अजूबा अमिताभ बच्चन की एक पिच्चर है, जिसमें ऋषि कपूर भी है…और डिम्पल कपाडिया और सोनम भी। लडाई-मारधाड और कामेडी से भरपूर ये फिल्म कल रात को [...]
मुद्दे – आये भी वो, गये भी वो
Posted in मुद्दा, विचार on July 5, 2007 | 5 Comments »
हर हफ्ते-दस दिन में देश को एक मुद्दा मिल जाता है। मुद्दा कुछ भी हो सकता है, कोई विवाद हो तो सोने पे सुहागा।…कहीं से भी उठ सकता है…सामान्यतः पहले मीडिया इसे लपकता /उठाता है…दृश्य-श्रव्य मीडिया पहले क्योंकि उसे २४ घंटे कुछ न कुछ दिखाना होता है..फिर अखबार-पत्र-पत्रिकाएं ले लेते हैं…बचा-कुछा कुछ चिट्ठेकार भी लपक [...]

