“एन्ड…दे लिव्ड हेप्पिली एवर आफ़्टर” – ९०% कहानी, किस्से, उपन्यास, फिल्में जिस हैप्पिली- एवर-आफ्टर पर आकर खत्म हो जाती हैं वो कोई पडाव क्या वाकई जिन्दगी में संभव है ?… कि आदमी चैन से बैठ कर कह सके कि नाउ आइ विल लिव हेप्पिली एवर आफ्टर। बस बहुत हो गया…अब जिन्दगी सुख से बिताउंगा..खुश रहूंगा।
बचपन में जब फिल्म देखता था..और हीरो हिरोइन की शादी हो जाती थी तो मैं सोंचा करता था कि फिल्म के बाद क्या हुआ होगा, दोनो कितने खुश रहे होंगे खूब गाने गाये होंगे। पर साथ ही अक्सर हीरो के उस दोस्त के लिये दुःख भी मनाता…जो प्यार तो हीरोइन से करता था..पर दोस्ती के लिये जान दे बैठता था ….कभी कभी उस विलेन के लिये भी…जिसने कोशिश तो बहुत की….बस जीत ही जाता..अगर ऐन वक्त पर रिवाल्वर में गोलियां खत्म नही हो गईं होती या उस कातिल के लिये…या हीरो की बहन के लिये…या… छोडिये..जाने दीजिये। वैसे हेप्पिली-एवर-आफ्टर वाली जिन्दगी भी कोई जिन्दगी होगी? हमेशा हेप्पी रहे तो हेप्पीनेस का मतलब ही भूल जायेंगे ना| विलेन नही रहा तो हीरो अपनी हीरोगिरी किसपे दिखायेगा? कहानी का ही कचरा हो जायेगा भाई।
शुक्रवार आता है…शाम बडी खुशनुमा लगने लगती है..। रविवार शाम होते होते हैप्पीनेस मन्डे फीवर में बदल जाती है। छुट्टियों में घर जाता हूं..जाते समय मन हवा में उड रहा होता है…आते में जान निकलती है । जब स्कूल के समय में छुट्टियों के बाद वापस हास्टल जाते थे…तो क्या क्या नही सोंचता..बम फट जाये..बाढ आ जाये..बिल्डिंग गिर जाये..और ये छुट्टियां कुछ दिन और बढ जायें। और ऊपर से पूरे ना किये गये होमवर्क की चिन्ता । कितना ही अच्छा हो..अगर सर/मेडम छुट्टियों के बाद वापस ही ना पायें । हालांकि मेरी इच्छाएं कभी पूरी नही हुईं । आज वो स्कूल इतना याद आता है…१० साल हो गये…वापस नही जा पाया एक बार भी ।
स्कूल के समय सुनते आये..बस बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक ले आओ…जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय है..वो खत्म हुआ (अंक कुछ खास नही) फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी..बस एक साल और….उसके बाद..फिर कालेज..कुछ दिन(साल) ठीक ठाक..फिर वही ..जिन्दगी का महत्वपूर्ण समय…उसके बाद फिर तैयारी..फिर पी. जी….फिर बस दो साल और…अब नौकरी । अब आगे की सोंचो तो लगता है कि जो बीत गया वो तो सबसे आसान समय था…पसीने तो अब आगे आने वाले हैं। वैसे बीता हुआ वक्त…कितना भी कठिन रहा हो..आसान लगने लगता है। अब ये लगता है…जिन्दगी का कोई एक पल क्या किसी दूसरे पल से कम महत्त्वपूर्ण हो सकता है?
आधा समय भविष्य की चिंता..या थोडे सोफेस्टिकेटेड शब्दों में कहूं तो…प्लानिंग, हम्म अपने मन की करनी है। आधा समय..अतीत की यादें…बोले तो इन्ट्रिस्पेक्शन…अरे यार मन की नही कर सके। बाकी बचा(!) बेचारा वर्तमान…जिस पर ध्यान देना है..और जिन्दगी है..कि उम्रेदराज के चार दिन ऐसे ही बीते जा रहे हैं…. कोई रोको यार ।
सही कहा, बचपन में आपकी तरह ही सोचता था। फिल्मों के बारे में सोचना कि बाद में क्या हुआ होगा। यदि ऐसा न होता तो क्या होता, यदि हीरो ऐसा न करता तो बच जाता वगैरा वगैरा। रविवार और छुट्टियों वाले विचार भी बिलकुल आप ही जैसे थे।
आज भी कुछ सशक्त फिल्में इस तरह की बातें सोचने को मजबूर कर देती हैं, टाइटैनिक, मैट्रिक्स और किंगकांग जैसी।
ये ‘… रोको यार ” वाला विचार मुझे भी ज्यादा आता है. आपकी तो पहली ईनिंग में काफी रन बाकी हैं. मुझे तो सेकेण्ड ईनिंग खेलनी है और जम के खेलनी है – वर्ना काम चलेगा नहीं.
लेकिन आलम ये है कि –
सुबह होती है, शाम होती है.
जिन्दगी यूंही तमाम होती है.
जीने का नया अन्दाज सोचना तो बताना.
दुसरी इनिंग के चक्कर में ज्ञानजी अमिताभ की फिल्मे देखने लगे है
…रोको यार..
श्रीश- अब की सोंच, बचपन की उस मासूमियत भरी सोंच से बहुत अलग है…फिर भी, जानकर अच्छा लगा कि आपकी-हमारी फ्रीक्वेंसी कहीं कहीं टकरा रही है
पाण्डेय जी, रन की जगह ओवर ज्यादा बेहतर रहेगा…शायद…।
अपना काम ओवर खेलना है..रन तो खुद ब खुद निकल जायेंगे. जीने का अंदाज तो हमें आपसे सीखना है…हमारी सिखाने की उम्र नही अभी
संजय भाई- काहे रोकें..देखने दीजिये…हमने तो आपको भी नही रोका था