बचपन छिन रहा है
April 23, 2007 by Nitin Bagla
अभी हाल ही में मैने फिल्म ब्लड डायमंड (Blood Diamond) देखी थी । पिछले साल की यह बहुचर्चित फिल्म अफ्रीकी देशों में गैरकानूनी रूप से हो रहे हीरों के खनन एवं व्यापार, इस काम में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लघन, हीरे की चमक से चौंधियाई ’पहली दुनिया’, इन देशों में गृहयुद्ध जैसे हालात और इस सबके बीच पिसते आम नागरिकों पर आधारित थी। फिल्म की पृष्ठभूमि अफ्रिका के सियेरा लियोन की है और फिल्म बताती है कि कैसे हीरों का उत्खनन करने वाला संगठित माफिया आम नागरिकों एवं बच्चों को बंदूक के बल पर उठा ले जाते हैं । अत्यंत भयावह है कि कैसे ८-१०-१२ साल के बच्चों के हाथों में बदूक थमा दी जाती है और उन्हे सिर्फ एक काम करना होता है…फायर। उन्हे दिन रात नशे की हालत में रखा जाता है, और ट्रेनिंग दी जाती है मारने की…Complete Barinwash.
अभी विभिन्न टी वी चैनल्स पर दिखाये एक १२ वर्षीय तालीबानी बालक द्वारा एक हत्या के बारे में अभी डा. सुनील दीपक एवं पंकज भाई के विचार पढे तो मुझे फिर इस फिल्म की याद आ गई। उन बच्चों की आँखों में भी वैसा ही खालीपन दिखता है, जिसकी डा. दीपक बात कर रहे हैं।
सियेरा लियोन और अफगानिस्तान की परिस्थितियां बहुत भिन्न हैं, लेकिन बच्चों की हालत दोनो जगह एक जैसी! वहां (सियेरा लियोन में) तालिबान नही है, इस्लाम के नाम पर जेहाद नही है लेकिन बचपन के हाथ में बंदूक दोनो जगह है। तालीबान और अफगानिस्तान का सच तो कभी कभार हमारे सामने आ भी जाता है, लेकिन दुनिया के एक बडे हिस्से की बर्बरता मेरी और आपकी आँखों से अछूती रह जाती है और यह इस दुनिया की भयावह हकीकत है, जिससे मुह नही मोडा जा सकता। अफ्रिका, एशिया और लेटिन अमेरिका के कई देश इस हकीकत से जूझ रहे हैं । जो हीरा और सोना आप और हम पहनते हैं उस पर किसी का खून भी लगा हो सकता है, ये हम सोंच भी नही सकते लेकिन सच्चाई यही है।
मेरे खयाल में तालिबान और अफगानिस्तान तो इस भयावह परिस्थिति का एक पहलू भर है। दुनिया भर में एक करोड से ज्यादा बच्चे ऐसी बीमारियों से मर जाते हैं, जिनका इलाज अत्यंत सरलता से उपलब्ध दवाओं द्वारा संभव है, १० करोड से ज्यादा बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और कभी स्कूल का मुंह नही देखते। अफ्रिका में हीरे की खदान में काम करने वाला बच्चा हो, तालिबान जुनून के वशिभूत हत्या करता बच्चा हो या हिन्दुस्तान में किसी पटाखे या कालीन के कारखाने में काम करता बच्चा…इनके हालातों में बहुत ज्यादा अन्तर नही है, बचपन तो सभी का छिन रहा है।

सत्य वचन भाई.
बिल्कुल खरी बात कही आपने. और दुखद स्थिति यह भी है कि हम और आप कुछ कर भी नही रहे है सिवाय कीबोर्ड पीट कर यह सब लिखने के.
आप समाजसेवी संस्था से जुडे हैं इसलिए शायद कुछ कर भी रहे होंगे. हमने क्या किया? यह आत्म चिंतन का सवाल है.
दुखद!!!
दिमाग ओर दिल को झकझोर देने वाला मुदा छेडा है आपने । लेकिन स्थिति भारत मे भी कुछ बेहतर नही है बस फर्क इतना है कि यहा हथियार की जगह कचरा उठाने वाला बोरा होता है उनके हाथों में । या फिर किसी रईस के घर पडे होंगे दो वकत की रोटी के वास्ते ।
पढ़कर मन दुखी हो गया बच्चों के बारे में सोचकर!
Nitin jee- aap to ek “samajsewi sanstha” se jude hai aur samaj sewa kar rahe hain , aap koi pahal lijiye aur in bachho ke liye kuch kare.
पंकज भाई - अपने आसपास से छोटीमोटी शुरुआत तो की ही जा सकती है।

समीर जी, श्रीश -
मेरा पन्ना, अनूप जी -
अलोक - याद दिलाने का शुक्रिया, प्रयास जारी है…
ग्रेट! धार्मिक कट्टरता/वहशीपन या गरीबी - दोनों का इम्पैक्ट बच्चों पर एक सा. मैं पहले दोनों के मूल में शोषण देखता था, पर अब लगता है कि यह मानसिक कमजोरी के कारण होते हैं. लोगों को धर्म का सही अर्थ समझना चाहिये तालिबानी/बजरंगी कट्टरता से मुक्ति के लिये. और गरीबी भी धन के प्रति गलत एटीट्यूड का परिणाम है. उसके लिये किसी और को दोष देने से काम नहीं चलता.
पर बच्चा क्या करे - यह मुझे नहीं मालूम.
मैने देखी है वह पिक्चर । उसे देखने के बाद मन नही करता हीरा पहनने को । बच्चो के बारे मैं क्या बात की जाए, अपने देश मै भी उनका हाल बुरा है। कितने ही घरों मैं छोटे बच्चे सफ़ाइ और बरतन का काम करते हैं । अछे पढें लिखे लोगों के घर भी। समाज को दोश देना आसान है, पर सफ़ाइ अपने घर से शुरु होती है।
वैसे युध मैं शोषन अधिकतर औरतों और बच्चों का ही होता है।
दुख तो होता है, पर करें तो क्या करें? खुद को यह सरकार के सामने कमज़ोर पाती हुँ । एक बच्चों के शोशन पर कानुन बनाने से क्या फ़रक पडा? सब तरफ़ एक तरह से apathy देखती हुँ । रास्ते के ढाबों पर काम करते छोटे बच्चों के देख कर लोगो का दिल पसीजता क्यों नही? उढ कर वह मालिक को क्यों नही बोलते? मेरे केहने से कहते हैं की उस बच्चे का बना बनाया काम क्यों बिगाडती हो?!!!
अगर तुम और तुमहारे साथी कुछ करने की सोचे तो मैं साथ देना चाहुँगी ।
शायद यही हर ज्गह होता हॆ और यही एक अन्तर हॆ जो चला आ रहा हे …… कुछ के शोषन के बिना कुछ अमीर न्ही बन स्क्ते, …..े