चार किताबें
April 14, 2007 by Nitin Bagla
पिछले दिनों में मैने दो किताबें पढी हैं, तीसरी पढ रहा हूं और चौथी शुरू करने वाला हूँ (ये सोंच कर खुश मत होइये कि मुझे नौकरी से निकाल दिया गया है और मेरे पास करने को और कुछ नही है, नौकरी बढिया चल रही है…
)। चारों किताबें भारत के इतिहास पर नजर डालती हैं, कोई थोडा आगे, कोई थोडा पीछे, अपने अपने नजरिये से, पर दिमाग में इतनी गड्डमगड्ड हो गई हैं, कि मैं चाह कर भी उनके बारे में अलग अलग नही लिख पा रहा।
पहली किताब है, क्रिस्टोफर क्रेमर (Christopher Kremmer) की ‘इनहेलिंग दि महात्मा’ (Inhaling the Mahatma)। किताब लेखक के भारत में बिताये कुछ सालों का वर्णन है। आस्ट्रेलियाई लेखक क्रेमर जब जुलाई १९९० में पहली बार अखबार सिडनी हेराल्ड के लिये भारत आये, उस समय भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। अपने तीन साल के प्रवास में उन्होने भारत को, आजादी के बाद के सबसे बडे संक्रमण काल से गुजरते हुए देखा। वी. पी सिंह का मंडल के सहारे उत्थान और पतन, राजीव गांधी की हत्या, कांग्रेस की मिली जुली सरकार, बाबरी मस्जिद विधवंस, मुम्बई धमाके आदि कुछ प्रमुख घटनाएं रहीं, जिन्हे उन्होने अपने अखबार के लिये कवर किया (बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के प्रत्यक्ष साक्षी रहे)।
अपने अगले प्रवास , १९९७ से २००१ में वे भारत को काफी तेज गति से भागते और बदलते हुए देखते हैं, कांग्रेस का सबसे बुरा समय, सोनिया गांधी का राजनीति में प्रवेश, बी जे पी की सरकार, तेजी से खुलता बाजार और..गुजरात दंगे । उन्हे आश्चर्य होता है (जैसा कि हर विदेशी को होता है) कि कैसे, भारत और यहां का आम आदमी, इतने कोलाहल, हो हल्ले, दंगे, भीड भडक्के के बावजूद अपनी गति से चलता रहता है, कैसे भारतीय समाज बुरे से बुरे घाव को जल्द ही भुला कर वक्त से आगे बढ जाता है, नये निर्माण के लिये ।
थोडा वर्णन २००४-०५ का है, जो खास तौर पर आइ. टी. , काल सेंटर अर्थव्यवस्था और बदलाव पर नजर डालता है । इन सबके साथ है, इलाहबाद और बनारस के घाट, किनारे और आध्यात्म जिसके माध्यम से लेखक भारतीय संस्कति और जनमानस को समझने की कोशिश करता है। धर्म, ईश्वर, गंगा, मोक्ष, भीड, पंडे आदि आदि ।इसके अलावा, दिल्ली में ही वो अपनी भावी पत्नि से मिलते हैं, और अपने ससुराल में मिली कुछ की पुरानी डायरियों के माध्यम से दिल्ली का कुछ इतिहास जानने समझने की कोशिश करते हैं ।
अगली जो किताब मैने पढी है, वो है ‘सिटी आफ जिन्स’ (City of Djinns), स्काटिश लेखक विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) द्वारा । क्रिस्टोफर क्रेमर जहाँ दिल्ली के इतिहास को छूकर निकल जाते हैं, वहीं डालरिम्पल उसमें अन्दर तक घुस जाते हैं । यह किताब लेखक के दिल्ली में १९८९-९० के दौरान एक साल किये शोध का नतीजा है। कहते हैं, जिस जिसने भी दिल्ली में नया शहर बनवाया, वो वहां ज्यादा राज नही कर पाया। सन १९११ में जब अंग्रेज अपना झंडा कलकता से दिल्ली ले गये और नई दिल्ली बसाई तो भी यही बात कही गयी थी जो ३६ साल बाद सच साबित हुई।
मैं कभी दिल्ली में रहा नही हूँ, इसलिये किताब में बताये गई कई जगहों से अपने आप को जोड नही पाया, लेकिन फिर भी मुहम्मद बिन तुगलक से होते हुए मुगल काल, शाहजहाँ, औरंगजेब और मुगल घराने की आपसी लडाइयां, लालकिला और बिटिश साम्राज्य के शुरुआती दौर और नई दिल्ली पर काफी अच्छा और शोधपरक लिखा है। भारत की पुरातात्विक धरोहर (तुगलक से लेकर मुगल और अंग्रेजों द्वारा बनवाये गये भी) की दुर्दशा की बात किताब में बार बार सामने आती है। इस मामले में विलियम डालरिम्पल की सराहना करनी होगे कि उन्होने काफी जगहों पर जाकर पुरानी चीजों को देखा और ढूंढने की कोशिश की । (रेल्वे के एक दफ्तर के तहखाने से, वो लालकिले की और जाती सुरंग ढूंढ निकालते हैं जो की बंद कर दी गयी है)।
मैं काफी कुछ भूल रहा हूँ क्योंकि तारीखें और लोग बहुत कान-फ्यूज कर रहे हैं और इसके बारे में विस्तार से लिखने के लिये किताब को दोबारा पढूंगा।
तीसरी किताब, जो अभी चल रही है, एम. जे. अकबर (M J Akbar) की ‘ब्लड ब्रदर्स’ (Blood Brothers) है । अभी एक-तिहाई पढी है । पुस्तक के कवर से पता चलता है कि ये एशियन एज के संस्थापक और संपादक अकबर की तीन पीढियों की कहानी है। अभी मैं उनके दादा प्रयाग के बारे में पढ रहा हूँ, जिन्हे एक बंगाल में कलकत्ता के पास, एक मुस्लिम परिवार बचाता और अपनाता है, जब वे भूख से दम तोडने वाले होते हैं। ये वाकया १८५७ के आसपास का है। प्रयाग बडा होकर रहमतुल्लाह बन जाता है और इलाके में मान सम्मान और धन अर्जित करता हैं। साथ साथ में उस दौर के हिन्दू मुस्लिम संबंधों की अच्छी पडताल है । यह पैरा काफी कुछ कह जाता है -
“……,as a result of the 1871 census, people learnt for the first time that the Muslims were in majority in Bengal……….Till 1871, Bengal’s social conficts were largely between the powerful and powerless: rich and poor; landlord and peasent. European Sahib, Anglo India, Hindu Baboo, Muslim पeasent and Bihari labour formed shifting pattrens of co-exixtance. After the cesus, rift lines sharpened between Hindus and Muslims as they gardually acquired another layor of identity”
इस पुस्तक पर भी विस्तार से पूरी पढने के बाद ।
इसके बाद अगली पुस्तक जो नम्बर पर है, वो है विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) की ही, ‘द लास्ट मुगल’ (The Last Mughal )। ये पिछले साल की काफी चर्चित पुस्तकों में से एक है और काफी समय से इसे पढने का मन था। पुस्तक शायद १८५७ की क्रांति , मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजों के आगमन पर है। शायद इसे पढने के बाद सिटी आफ जिन्स में अधूरी रही कुछ बातें पूरी हो जायें।
बहुत दिन पहले शायद फुरसतिया जी के लिखा था कि अगर किसी काम को करने में आलस्य आ रहे हैं , तो सबको बता दीजिये कि मुझे वो काम करना है…..इससे आपकी जिम्मेदारी (और अपेक्षाएं) बढ जायेगी। मुझे इन किताबों के बारे में विस्तार से लिखने में आलस्य आ रहा था, आप सबको बता दिया है… अब तो करना ही है
(नौकरी अभी भी सही सलामत ही है..
)

Badi harani ho rahi hai ki koi comment nahi hai. Aakhir kyon? Kya logo ko books ke baare mein janane ki jigyasha nahi hoti hai? Pahle to yeh jankar khushi hui ki chalo kisi ki ruchi padhne mein to hai. Aapne accha likha hai. Waise maine kewal Blood Brothers hi padhi hai. Achhi book hai. Akabar ji ki Byline bhi padhe. wo bhi acchi hai.
shukriya nitin in kitabon ke bare mein batane ke liye.
Bhai pehli wali chod kar baaki sa padhi hain maine, aur aisa lag raha ki tumhara taste refine ho raha hai
he he
William Dlarymple is best travelogue writer no doubt.. city of djinns main delhi ko jaise represent kiya woh wakai kabile tarif hai, aur the last mughal main choti kahaniya aur saath hi saath vamnasyata ko abhi ache se likha hai.,..
jahan tak blood brothers ki baat hai.. bahut achi kitaab hai..
Lage rahiye…..
बड़ी भारी भारी किताबें पढ़ रहे हैं, शुभकामना…पढ़ाई जारी रखें.
I have not read any but plan to in future, heard a lot abt Dlarymple,I am reading Maximum City at present, excellent description of Mumbai.
Aur kabhi Vedprakash pathak ka bhi review kar lo,tumhare poorane sathi hain..
राजेश, ऐसा नही है, कई लोग यहाँ पढने में खासी रुचि लेते हैं, टिप्पणी छूट जाती है कभी कभी । आपने ध्यान रखा..शुक्रिया
Byline हाथ लगती है तो देखता हूँ
मनीष, धन्यवाद..
अखंड, चलो तुम्हारी नजर में हमारा कुछ तो ‘रिफ़ाइन’ हुआ ।
समीर जी, टिप्प्णी का शुक्रिया
आलोक - भैये, वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक दो अलग अलग लेखक हैं, तुमने तो दोनो की शादी करा के वेद प्रकाश पाठक बना दिया
वैसे मैं पाठक को ही पढता हूँ…
Yaar bagla boss…shukriya….ki aap ne is naciz ke blog pe nazar daali….baharhaal panga ye he ki me webpage pe hindi likh nhi paa raha hu even using all those baraha sw(barahadirect n baraha ime both i have tried out) to tumhare liye roman lipi me likh raha hu…
baaki maze…..tumhare lekh magar me regularly padhte rehta hu….maza aata he…