भारतीय क्रिकेट को संभालने के लिये, खिलाडियों को नौकरी देने वाली सोसाइटी (क्लब), BCCI की हाल ही में हुई बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व कप के पहले ही दौर में बाहर निकल जाने की मुख्य वजह ये थी कि खिलाडी एक समय में तीन से ज्यादा विज्ञापन कर रहे थे और एक एक विज्ञापन में २ से ज्यादा खिलाडी काम कर रहे थे। इनसे निपटने के लिये बैठक में कुछ ‘कठोर’ फैसले लिये गये हैं। विज्ञापनों के अलावा सिर्फ एक कोच का मौजूद रहना (वो भी विदेशी) भी एक बडी वजह बताया गया । ह्म्म, जरा सोंचिये, ग्रेग चैपल जैसे २-३ और होते तो क्या होता ? खैर, अब खिलाडियों को संभालने के लिये एक गेंदबाजी कोच, एक क्षेत्ररक्षण कोच और एक मेनेजर भी होंगे ।
ये तो वो है जो मीडिया के सामने आया, सुना है कुछ अन्य भर्तियों की भी संभावना है, जल्द आवेदन कीजिये
विज्ञापन कोच – इनका काम खिलाडियों के विज्ञापन संभालना होगा, ये देखना कि कोई खिलाडी नियत संख्या से ज्यादा विज्ञापन तो नही कर रहा।
बयानबाजी कोच – ये कोच खिलाडियों की बयानबाजी पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे, बयान क्या देना है, या क्या नही देना है, कब देना है, किसको कितना माप तौल कर देना है आदि आदि मह्त्त्वपूर्ण मुद्दे इनके क्षेत्राधिकार में होंगे । सुना है, पाकिस्तान को भी इस तरह के एक कोच की अवश्यकता है, जिनका इस्तेमाल वो अपने खिलाडियों पर कम और पूर्व खिलाडियों पर ज्यादा करेंगे । वजह यह कि आधे से ज्यादा को तो बोलना आता नही है, पर सरफराज नवाज को कैसे चुप करायें ये इनके लिये मुसीबत है उन्हे चुप कराने के लिये तालिबान के कमांडरों से भी संपर्क साधा जा रहा है ।
फुटवर्क कोच – खासतौर पर वीरेन्द्र सहवाग के लिये, ताकि लापा मारने के अलावा, वक्तेजरूरत अपने कदमों का इस्तेमाल भी कर लें। भरतनाट्यम जानने वालों के लिये अच्छी संभावनाएं ।
‘रनिंग बिटवीन द विकेट’ कोच – वैसे तो ये काम क्षेत्ररक्षण कोच भी कर सकते हैं, लेकिन सौरव गांगुली का कहना है कि गेंद के पीछे भागने में और गेंद के साथ भागने में जमीन आसमान का अन्तर है, बिना कोचिंग के वे रन नही दौड पायेंगे ।
इन सबके अलावा, एक कोच चाहिये जो इन सभी कोच में आपस में सामंजस्य बिठा सके, ताकि एक समय में एक खिलाडी के सिर पर एक ही कोच बैठा हो ।वैसे भज्जी का कहना था कि अब बडे मजे रहेंगे, बालिंग वाला बुलायेगा तो कह देंगे फ़ील्डिंग वाले के पास जा रहे हैं, और vice versa
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वैसे मंशा ये थी कि कम से कम ११ कोच तो हों ही, अभी ७ ही हुए हैं , लेकिन स्कोप बहुत है । पाकिस्तानी बोर्ड एक डोपिंग कोच, एक सट्टेबाजी कोच और कोच-खिलाडी की हाथापाई सलटाने के लिये एक कोच पर भी ‘बुरी’ तरह से विचार कर रहा है। आंख और कान खुले रखिये
कुछ आवेदन हिन्दी चिठ्ठाजगत से भी आये है
विज्ञापन कोच – रवि रतलामी जी, अब विज्ञापनो को आपसे बेहतर और कौन जानता है।
बयानबाजी कोच – मोहल्ला से किसी को भी उठा लिया जाये
फुटवर्क कोच – उड़नतस्तरी वाले समीर जी, उनके पैर जमीन पर रहते ही नही है।
‘रनिंग बिटवीन द विकेट’ कोच – जितेन्द्र चौधरी जी, अब देखो ना नारद के पिछे बेचारे कितना भागते रहते है।
भारतीय खिलाडियों को कौंचने वाला कोच चाहिए . जो महावत की तरह अंकुश हाथ में रखे .
सुना है बंगलादेश भी अपने कोच के लिए भारत को आफर दिया है ;-(
अब आशीष ने इतनी बड़ा कार्यभार हमारे नाजुक कंधों पर डाला है कि मना भी नहीं कर सकते.
सिखायेंगे, क्या करें!!
मजेदार प्रविष्टी. आनन्द आया.
आशीषजी की टिप्पणी भी कम नहीं.
अच्छा व्यंग्य कसा है।
बहुत बुरी बात है नितिन जी
सब का सब आपही ने लिख दिया कुछ तो टिप्प्णी करने वालों के लिए रख देते
हमेशा कि भाँति मजेदार लेख
Majedaar hai.
आशीष, सही है जी, और इन सब में सामंजस्य बिठाने के लिये…? फुरसतिया जी को लेंगे?
प्रियंकर जी, शुएब भाई, समीर जी, संजय जी, सागर जी, नोटपेड, राजेश रोशन…आप सबको टिप्पणी के लिये धन्यवाद