अहमदाबाद ब्लागर भेंटवार्ता (गुजरात प्रवास भाग - ३)
March 6, 2007 by Nitin Bagla
भुज और सूरत के बाद अपनी अगली मंजिल थी अहमदाबाद । दो बार अहमदाबाद होकर गुजर चुका था, भुज जाते वक्त और सूरत जाते वक्त लेकिन रुकना नही हुआ था । हाँ भुज जाते वक्त पंकज जी को फोन लगाया था और अगली बार आने का वादा किया था, दो-तीन बार चैट पर भी ।
पहुंचने के दूसरे दिन(शनिवार को) सोंचा कि रविवार(११ फरवरी) को ये शिखर वार्ता संपन्न कर ही दी जाये । पहले सोंचा कि क्या पता भाई लोग रविवार को अपना कोई कार्यक्रम बनाये बैठे हों और हम दाल भात में मूसलचंद पहुंच जायें, शनिवार को ही पंकज जी को फोन किया और पूँछा कि आफिस खोलते हैं या नही रविवार को, उन्होने फोन पे स्वागत किया, लंच के पहले आफिस में होंगे बताया, और घर पे खाने का निमंत्रण हाथ के हाथ सरका दिया, जिसके लिये हमने फोन पर ही थोडी ना नुकुर भी कर दी । रविवार को फिर फोन लगाया, पता लिया तथा कैसे पहुंचना है पूँछा । उन्होने हमे हमारे होटल से ‘उठा’ लेने का (बोले तो पिक करने का) प्रस्ताव रखा, जिसे हमने हमारे ‘शर्मीले’ स्वभाव की वजह से मना कर दिया । वैस इतना शर्माता नही हूँ…बस सोंचा कि अकेले जायेंगे तो इसी बहाने अहमदाबद देख लिया जायेगा थोडा ।
रविवार को होटल से निकला, पहले सोंचा बस से चलते हैं…बैठा, दो स्टाप आगे जाकर जाने क्यों, फिर उतर गया और आटो ले लिया । बाद में लगा, अच्छा किया, नही तो लंच नही, चाय के समय आफिस पहुँच पाता। खैर ढूंढ-ढांढ कर आफिस पहुंचे, संजय जी बगलगीर होकर मिले, आसन(कुर्सी) ग्रहण करवाया गया, पंकज जी मिले, खुशी जी और अभिजीत जी से मिला ।
बातचीत शुरू हुई, संजय जी मेरे बारे में नेट पर थोडा खंगाल चुके थे, पर ज्यादा कुछ मिला नही था, फोटो भी नही, सो अपना परिचय दिया, क्या करता हूं, क्यों करता हूं, कहाँ करता हूं टाइप । मैं पिछले २० दिन से बाहर था सो ब्लागजगत की हलचलों से बेखबर था बताया गया कि बडा हल्ला हो रहा है आजकल और कई पत्रकार बंधु कूदे हुए हैं ब्लागिंग के मैदान पर । तभी सागर जी गूगल टाक पर दिखे, जिन्होने की इसका नामकरण किया, “ब्लागर मीट इन कर्णावती” और बैंगानी बंधुओं से ताकीद की कि हमें क्या खिलाया-पिलाया जा रहा है।
फिर चर्चा ज्यादातर ब्लागिंग पर केन्द्रित रही, लोग क्या, क्यों, कैसा, कैसे लिखते हैं, कुछ लोग लिखते-लिखते क्यों इतना सेन्टिया जाते हैं और कुछ सेन्टी होकर क्यों लिखते हैं, जो चिट्ठाकार लडते हैं वो कैसे दोस्त बन जाते हैं, जब लडते हैं तो चिट्ठे से लडते हैं या चिट्ठाकार से । सुनील दीपक जी कितना घूमते हैं, रवि जी कैसे किसी को भी कुछ लिखने से मना नही करते , जीतू जी कैसे कैसे आइडिये फेंकते रहते हैं, फुरसतिया जी इतना लम्बा कैसे लिख लेते हैं, एडसेन्स से कमाई कैसे संभव है, या क्या दिक्कत है , परिचर्चा पर जाना आजकल कम क्यों हो गया है आदि आदि।
क्रिकेट मैच भी था उस दिन सो हमे नेट पर लाइव मेच भी दिखाया गया, निरंतर का नया अंक आ गया है ये बताया गया । ये भी पता चला कि आज संजय पंकज जी की शादी की सालगिरह भी है, सो हमने उसकी भी बधाई टिकाई (ये भी सोंचा कि खाली हाथ आ गये, कुछ लेकर आना था) ।फिर लंच का आफर, मैने फिर थोडी ना ना की, पर मैं एक अकेली जान और इधर और ये दो-दो, चलने नही दी गई । वास्ता दिया गया कि घर पर खाना बन गया है, दिन में बासी बचा तो शाम को इन्हे ही खिलाया जायेगा और हमें गाडी में डाल दिया गया । निकलने के पहले फोटो सेशन हुआ, जिसमे कि पंकज जी इतने गमगीन क्यों नजर आ रहे हैं हम बता देते हैं । दरअसल इनकी चिंता ये थी कि दिल्ली ब्लागर मीट में भी इन्होने यही शर्ट पहनी थी जो आज पहनी हुई थी, और ये कह रहे थे कि लोग क्या कहेंगे, पंकज हमेशा एक ही शर्ट में फोटो क्यों खिंचाता है । बडे भैया के खूब समझाने पर राजी हुए फोटू खिंचवाने को
घर पहुंचे, भाभियों से मिले, और परिवार के(या कहें हिन्दी के) सबसे छोटे ब्लागर से मिले । २० दिन बाद घर का खाना नसीब हुआ था, सो हम अब तक की लाज शरम छोड कर टूट पडे…। खाने के बाद की चर्चा महंगाई, राजनीति, क्रिकेट, समाचार, सूरत, असाम, चूरू होते हुए पता नही कहाँ कहाँ होकर निकली कि अचानक फोन टनटना गया । वैसे भी काफी वक्त हो गया था, सो हमने बैंगानी परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए विदा ली । लौटते में हमे आइ. आइ एम. अहमदाबाद दिखाया गया जहाँ से आटो पकड के हम ये जा वो जा हुए….।
इति श्री गुजरात यात्रा समाप्तम
फोटो साभार जोगलिखी



मस्त विवरण दिया.
वैसे शादी की वर्षगांठ पंकज की थी उस दिन, तथा बधाई भी उसे ही दी थी
आपने.
यार ये आप दोनो के नाम मे बडा कन्फ़्यूजन होता है, पोस्ट करने से पहले दो बार चेक किया था, एक बार तो आप दोनों के ब्लाग एक दूसरे के नाम से लिंक कर दिये थी..खैर…आपको अग्रिम बधाई, जब भी हो तब के लिये
“पंकज हमेशा एक ही शर्ट में फोटो क्यों खिंचाता है”
हा हा हा… हा..हा..
भद पीट दी यार…. तुमने तो… हा हा हा
यार ये पंकज एक में शर्ट में फोटो क्यों खिंचवाते है?
मजेदार रहा वर्णन यात्रा का।
बढ़िया विवरण रहा. वैसे शर्ट का आप याद न दिलाते तो ख्याल भी न आता.
हाँ तो ईब रहस्य समझ आया ना पंकज भाई का इतने टेन्शन में बैठने का!! वैसे ई बात तो अपन भी नोट किए रहे लेकिन कुछ इसलिए नहीं बोले क्योंकि बहुतया बार ऐसा होता है कि एक खास गेटअप में ही एक खास फोटो आती है, इसलिए …..!!

हमें ये नहीं पता था कि हमारे चिट्ठे की लम्बाई अहमदाबाद तक परेशानी पैदा कर रही थी।
पंकज जी, चलिये इसी बहाने आप हँसे तो…

सागर जी, शुक्रिया
समीर जी, ध्यान मुझे भी ना आता, अगर पंकज जी ना रूठते..
अमित…फोटो भी खास, गेटअप भी खास, और खिंचवाने वाला भी खास..
अनूप जी, ऐसी खूबियां परेशानियाँ पैदा नही करतीं…लेकिन गली-मुहल्लों में चर्चा का विषय जरूर बन जाती हैं
वाह खूब रही भेंटवार्ता। शर्ट वाला किस्सा मजेदार रहा। अनूप जी की फुरसत वहाँ भी चर्चित रही।