गुजरात प्रवास - भाग-२
February 21, 2007 by Nitin Bagla
भुज के बाद अपना अगला पडाव था सूरत । याने गुजरात के पश्चिमी कोने से हमें दक्षिणी छोर की ओर जाना था । सूरत भारत का हीरा कटिंग और कपडा उद्योग का केन्द्र माना जाता है, पर सूरत शहर हमारी मंजिल नही थी । हमें जाना था सूरत के आदिवासी इलाके में । सूरत जिले में कुल १४ तालुका (या मंडल) हैं जिनमें से १० आदिवासी बहुल हैं जिनकी कि जनसंख्या का करीबन ८५-९०% हिस्सा आदिवासी है । आदिवासी विकास विभाग के दो कार्यालय हैं इस इलाके में, मांडवी और सोनगढ जहां कि हमे जाना था ।
(य़ूं ही चला चल राही - सूरत-मांडवी)
पहले मांडवी । सूरत से करीब ६० किलोमीटर दूर है, तापी नदी के किनारे बसा हुआ छोटा सा कस्बा है और तालुका मुख्यालय है। इस इलाके में शकर की करीबन १० मिलें हैं, और सूरत से लेकर मांडवी तक का पूरा रास्ता आपको गन्नों के खेतों से अटा हुआ दिखाई देगा । अब तक मैं यही समझता था कि गन्ना सिर्फ़ महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में ही होता है, पर यहाँ गन्ने की इतनी खेती देख कर अपने अज्ञानता का अहसास हुआ ।
(गन्ने और मक्का की मिश्रित फसल । गन्ने का खेत अभी तैयार किया गया है, बडे पौधे मक्का के हैं जिसे चारे के लिये जल्द ही काट लिया जायेगा)
मांडवी के वन विभाग विश्राम गृह (जहां हम रुके थे) से काकरापाडा परमाणु बिजली घर की चिम्नियाँ दिखाई देती हैं, एवं थोडे ही ऊपर कांकरापाडा बांध बना हुआ है । इलाके की विसंगति ये है कि जहाँ जहाँ कांकरपाडा की नहर है, वहाँ खूब फसल होती है अर किसान समद्ध हैं, पर जहाँ नहर नही पहुँची, वहाँ किसानों को एक फसल के भी लाले हो जाते हैं..और ये अंतर आपको २०-२५ इलोमीटर के फासले पर ही मिल जायेगा । मेरे साथी मोहसिन जी इससे पहले दाहोद-पंचमहल के आदिवासी क्षेत्र का दौरा कर चुके थे, अतः दोनों जगहों की तुलना करने से अपने आपको नही रोक पा रहे थे । दाहोद की तुलना में ये इलाका काफी समृद्ध और विकसित है । चाहे वो कृषि हो, पशुधन या शिक्षा । गाँवों के स्कूलों की तारीफ़ करनी होगी, चहे कितना भी छोटा स्कूल क्यं ना हो, साफ सुथरा, पेड पौधों से सुसज्जित और सुंदर होगा ।
ज्यादातर गाँवों में हर परिवार से १-२ लोग सूरत जाते हैं…काम या तो हीरा कटिंग, या किसी मिल में मजदूरी । शकर मिलों में यहाँ के लोगों को नही रखते…बाहर से मजदूर बुलाये जाते हैं..लगभग यही समस्या हमने भुज में भी देखी थी । सूरत जाने वाले मजदूर ८-१५ दिन में घर आते हैं एक बार… । युवाओं में शिक्षा का स्तर कमोबेश ठीक ही है, लेकिन समस्या ये है कि पढे लिखे लडके, याने जवान पीढी खेती/पशुपालन नही करना चाहती ।गाँव में जाइये..किसी भी युवा लडके से पूँछिये..
“भाई, क्या करते हो ?…”
“कुछ नही ।”
“अरे..कुछ तो करते होंगे…”
“हाँ ,खेती करते हैं ।”
यह वार्तालाप एक दो नही हर जगह पर हुआ । मुख्य फसलें, जहाँ पानी है वहाँ गन्ना और चावल, जहाँ पानी नही वहाँ ज्वार । थोडी बहुत तुवर, मूंगफली, मक्का आदि भी होती है ।कुछ जगहों पर सब्जी भी उगाई जाती है । व्यारा तालुका के अंतापुर गाँव की तस्वीर है । जानकर आश्चर्य हुआ के ये भिंडी निर्यात के लिये छाँटी जा रही है…
अपनी जिन्दगी का अहला विस्थापित गाँव हमने देखा, निजर तालुका में, जो कि सोनगढ में आता है । गाँव का नाम, हाथनूर । विस्थापित हुए, उकाई बाँध के चलते । उकाई बाँध तापी नदी पर ही बना है और महाराष्ट्र गुजरात की सीमा तक फ़ैला हुआ है । करीबन सन ७० में यह बाँध बना था, जिसके चलते ये लोग विस्थापित हुए । ३७ साल बाद भी लोग इस बात को भूले नही है । हाथनूर पहले महाराष्ट्र में आता था, और १९६० में, बाँध निर्माण की योजना के समय गुजरात में चला गया । आज भी लोगों से पूंछिये ‘काम करने कहाँ जाते हो’..जवाब मिलेगा गुजरात ।आधा आधा किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए गाँव, बोली में हल्का सा मराठी का घालमेल । समस्या ये कि बाँध तो बना, पर बाँध का फायदा इन्हे नही मिला, नहरें तो सारी निचले इलाके में हैं । उकाई बाँध पर बिजली संयंत्र भी है। और पास ही में एक कागज मिल भी है ।
और आखिर में बात दूध डेरियों की । इनके बिना गुजरात का वर्णन अधूरा ही होगा ना । हर गाँव में आपको दूध मंडली मिल जायेगी, जिसे की दूध सहकारी भी बोला जाता है । पूरे गाँव का दूध यह मंडली इकट्ठा करती है, इसका अपना भवन एवं कार्यालय होता है । यह दूध इकट्ठा करके निकटतम प्रशीतन केन्द्र पर भिजवा दिया जाता है । हर किसान की अपनी एक डायरी होती है जिसमे कि दूध की मात्रा व वसा के हिसाब से रोज का भुगतान दर्ज किया जाता है, जो महीने के आखिर में मिलता है । हालांकि अधिकतर जगहों पर हमें वसा नापने के यंत्र नही मिले…इस स्थिती में यह नपाई प्रशीतन केन्द्र पर दूध पहँचाए जाने के समय होती है । प्रशीतन केन्द्र पर दिन में एक बार जिला दुग्ध सहकारी (District Milk Cooperative) की गाडी आती है (सूरत में सुमूल) और दूध ले जाती है । पशुधन किसी भी किसान की अर्थव्यस्था की रीढ होता है । लेकिन नस्ल (अधिकतर गाय भैंसों की) बहुत अच्छी नही थी । कहने को सब्सीडी मिलती है सरकार से (करीब ६०००/- की), भैंस खरीदने के लिये, लेकिन इसी सब्सीडी के चलते १५०००/- की भैस काश्तकार के २५ से ३० हजार में पड जाती है..इतने लोचा हो जाता है बीच में ।फिर भी कहूंगा कि कम से कम मेरे गृह राज्य राजस्थान से यहाँ पशु/दूध की स्थिति बहुत बेहतर है । बस यही बात समझने की कोशिश करता रहा कि ये सहकारी आंदोलन, जो गुजरात मे इतना सफल हुआ, भारत के अन्य राज्यों में क्यों नही चल पाया ?
(तापी नदी के पीछे ढलता सूरज - चित्र मांडवी वन विश्राम गह के पास से, जहाँ अपन रुके थे | सभी चित्र - मोहसिन जी)
(अगली मंजिल - अहमदाबाद - तरकश टीम से मुलाकात….)






मजा आ रहा है.
स्कूलों के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा.
बहुत सुन्दर बागला भाई
आत्मीयता और जानकारी से भरा हुआ यात्रा संस्मरण .
धन्यवाद संजय जी, प्रमेन्द्र जी एवं प्रियंकर जी ।
hey nitin Ukai dam, mandwi…surat…. man i am really nostalgic. i visited these places during my study trip.