गुजरात प्रवास (जो याद रहा)
February 19, 2007 by Nitin Bagla
कच्छ, भारत का पश्चिमी कोना, हिन्दुस्तान का दूसरा सबसे बडा जिला । इसी कच्छ के जिला मुख्यालय भुज में अपने कदम पडे २६ जनवरी २००७ की शाम को, याने भूकम्पी गणतंत्र दिवस के ठीक छः साल बाद । गुजरात का यह मेरा पहला प्रवास था, २००५ में एकदिवसीय दाहोद यात्रा को छोड दूं तो, और काफ़ी कुछ सोंचा हुआ था मैने गुजरात को लेकर । अगले २२ दिनों में काफी कुछ नया जाना, देखा और समझा ।
पहली बात जो ध्यान गयी, अहमदाबाद में ही, वो था गुजरातियों का गुजराती प्रेम । अब से पहले मैं यही समझता था कि गुजरात में हिन्दी ही ‘ज्यादा’ बोली और प्रयोग में ली जाती है, लेकिन अपन गलत साबित हुए…दुकानों के साइनबोर्ड हों, या बसों के, या चौराहों पर, सर्वत्र गुजराती का बोलबाला है, शायद यही वजह भी है, गुजराती चिट्ठा संसार के काफी समृद्ध होने की । भुज पहुँचे तो पता चला, यहाँ गुजराती नही, ‘कच्छी’ बोली जाती है । कच्छी शायद गुजराती और सिंधी का घालमेल है, और पूरे कच्छ में यही बोली जाती है । एक और बात पता चली, कच्छी सिर्फ़ बोली जाती है, लिखे नही जाती, याने इसकी लिपी नही है । और समझने में गुजराती से थोडी कठिन भी है ।
कच्छ ..और भुज, २००१ के भूकम्प के बाद दुनिया की निगाहों में आया था, भूकम्प को ६ साल हो गये लेकिन उसके निशान आज भी कई जगहों पर दिख जाते हैं, कई इमारतों में आज भी दरारें पडी हुई हैं…(और लोग भी रह रहे हैं) । भूकम्प राहत के नाम पर खूब पैसा आया है, लेकिन ज्यादातर लोगों की शिकायत है कि उन्हे पर्याप्त राहत नही मिली ।
भुज के आसपास घूमने को कई जगहें हैं लेकिन अफसोस कि मैं कहीं नही जा पाया । हाँ लेकिन शहर की कच्ची बस्तियों में खूब घूमा । आबादी का एक बडा हिस्सा मुस्लिम है, और लगभग हर घर में ‘बाँधनी’ (कपडे में गठान बाँध कर रंगाई) का काम होता है जो मुख्यतः घर की महिलाएं करती हैं । भुज का मिट्टी का काम भी बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन एक मात्र कलाकार जिनसे मैं मिल पाया, ने बताया कि यह लगभग विलुप्ति की कगार पर है, युवा पीढी सीखना नही चाहती इसे ।
कच्छ , विशेष कर अंजार, गाँधीधाम और काँडला, औद्योगिक दृष्टि से काफ़ी समृद्ध हैं, लेकिन भुज इस मामले में थोडा पीछे लगा । वैसे भुज के आसपास भी फ़ेक्ट्रियाँ हैं, लेकिन यहाँ के लोगों को इससे ज्यादा रोजगार नही मिलता । ज्यादातर मानव संसाधन बाहर से लाया जाता है, अहमदाबाद आदि से। और उत्तर प्रदेश , बिहार के लोग तो बहुतायत में हैं । लोग कहते हैं कि कंपनियां यहाँ के लोगों को नौकरी नही देती, कंपनियाँ कहती है कि यहाँ के लोग काम नही करना चाहते । हालत ये है कि जिस होटल में हम रुके वहाँ ८०% सटाफ नेपाली था । वैसे ये बात यहाँ के लोग भी स्वीकारते हैं कि कच्छी आदमी चाहे छोटी सी दुकान खोल ले लेकिन किसी की नौकरी करना पसंद नही करता, खुद के धंधे को प्राथमिकता देते हैं । वैसे भी, पूरे भारत में गुजराती लोग अपनी उद्यमिता के लिये जाने जाते हैं ।
सडकें गुजरात में काफी अच्छी हैं, अंदरूनी गाँवों तक भी, लेकिन राज्य परिवहन की बसें इतनी खटारा कि दिल दहल जाए । दो मिसालें देखी, अहमदाबाद से भुज जाते वक्त एक जगह ढाबे पे बस रुकी, हम इंतजार कर रहे थे, कि पीछे से खचाखच भरी हुई एक बस आई, देख कर दंग रह गये कि बस की पूरी विंडस्क्रीन गायब थी, और लोग आगे तक बैठे थे । दूसरी घटना सूरत के सोनगढ तालुका की है, राज्य परिवहन की चलती हुई एक बस के पीछे के चारों पहिये बाहर निकल गये….और बस वहीं बैठ गई, गनीमत है, घटना शहर में हुई जहाँ ट्रेफ़िक की वजह से गति कम थी, सो कोई हादसा नही हुआ । खैर, हमें ज्यादा सफ़र नही करना पडा इन बसों में ।
आगे …..सूरत का आदिवासी क्षेत्र और अहमदाबाद में तरकश टीम से मुलाकात ।


वाह पूरे गुजरात की सैर करा दी। रन ऑफ कच्छ भी गए क्या बहुत नाम सुनते हैं उसका, आखिर है कैसा वो।
बहुत सुन्दर विवरण, कुछ फोटो शोटो भी होती तो और भी मजा आता
अच्छा विवरण. अगली कड़ी का इंतजार है. आशा है आप ज्यादा इंतजार नहीं करवाएंगे.
अच्छा वर्णन किया है, ईश्वर आपको अधिकाधिक यात्रा सुख और हमें यात्रा वृत्तांत नसीब करें।
तरकश टीम की कमेन्ट्री की प्रतिक्षा मै है सारी निगाहे आपकी तरफ है ……………………
bhai u are improving day by day,take writing as a carrer u will definately do better then dev sector
Anyways did u meet your OT partner,if yes that definately deserves to be written about…
गुजरात के लोगों में गुजराती के अलावा एक चीज, खाने के प्रति बहुत प्रेम है। मेहमाननवाजी में गुजरातियों का कोई सानी नहीं क्या आपने यह अनुभव नहीं किया, यात्रा के दौरान?
गुजरात यात्रा का वर्णन हो और वहाँ की खाने पीने की प्रसिद्ध चीजों के बारे में ना बतायें यह तो गुजरातियों के प्रति अन्याय होगा।
लेख के अगले अंक में वहाँ की तस्वीरों को भी बतायें।
श्रीश जी, धन्यवाद, जैसा कि मैने ऊपर लिखा,कहीं भी घूमने नही जा सका ..रन भी नही ।

पंकज जी, भुज के फोटो अभी हैं नही…ज्यादातर समय मेरे पास केमरा नही था
संजय जी एवं प्रमेन्द्र जी…शुक्रिया ।
अलोक , सुझाव एवं तारीफ का शुक्रिया, OT पार्टनर से नही मिला…
सागर भाई, खाने को लेकर कोई बहुत खास अनुभव नही रहे, हैदराबाद से गया था..अतः वहाँ नियमित मिल रही रोटी-सब्जी ही अपने पकवान थे. और मेहमाननवाजी तो तरकश टीम ने धाँसू की, वो विवरण वहीं पर
अगले भाग में फोटो लगाने का प्रयत्न करूंगा
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