मान गये ‘गुरू’ !
January 12, 2007 by Nitin Bagla
“साहब..खडा हो सकता हूँ, या उसके लिये भी लाइसेन्स लेना होगा ?”
उस जमाने की फ़िल्म है गुरू, जब आपको हर काम, हर फ़ेक्ट्री, हर धन्धे के लिये लाइसेन्स चाहिये होता था । हमने वो जमाना से देखा नही, जब तक सोंचने समझने लायक हुए तब तक ९० का दशक आ चुका था । लेकिन वाकई में गुजरात के एक गाँव से आये हुए, दसवीं फेल आदमी के लिये आसान नही रहा होगा । पर अपने दिमाग, लगन और जोड तोड से उसने कर दिखाया और इन सबसे बढ कर था, सपने देखना । मैं ‘गुरू’ की ही बात कर रहा हूँ, धीरू भाई अंबानी की नही, पर क्या फ़र्क पडता है ।
‘गुरू’ की कहानी में आप ऐसा नया शायद ही कुछ पायेंगे जो आप ना जानते हों, लेकिन अभिषेक बच्चन के लिये ये फ़िल्म जरूर देखियेगा । अभिनय, हावभाव, मेकअप….शानदार… ।और इन सबके ऊपर, आवाज….दम है भाई । कहीं कहीं बडे बच्चन नजर आते हैं । फ़िल्मांकन खूबसूरत है, खास तौर पर कुछ शुरुआती दृश्य तो मुझे गाडफ़ादर(शायद भाग २) की याद दिलाते हैं । और तीसरी तारीफ़ेकाबिल बात, संवाद । छोटे छोटे संवाद जो एक दम निशाने पर जाकर बैठते हैं ।
ऐश्वर्या राय, ठीक ठाक हैं, ‘बरसो रे मेघा’ गाने की बारिश में मैं ताल वाली ऐश्वर्या को देखने की कोशिश कर रहा था…पर असफल रहा, गलत जगह और समय पर गलत चीज ढूंढ रहा था । साथी कलाकार सब अपनी अपनी जगह फ़िट बैते हैं , वैसे माधवन-विद्या बालन की प्रेम कहानी की जरूरत नही थी । मिथुन दा को बहुत दिन बाद बडे पर्दे पर देखा ।
गुलजार साहब के गाने, हमेशा की तरह धीरे धीरे जुबान पर चढे, और हमेशा की ही तरह कई बोल अभी भी समझ में नही आये हैं। पर गाने कहीं कहीं गैर जरूरी महसूस हुए, १-२ ना होते तो भी ठीक था, करीब पौने तीन घंटे से ऊपर की फ़िल्म है ।
कुल मिला कर जरूर देखने लायक फ़िल्म, अभिषेक बच्चन की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ।……”आज खुश तो बहुत होंगे तुम..ऐं..???”
पुनश्चः -
बहुत दिन पहले एक मेल फ़ारवर्ड में पढा था,
प्र.- MBA के क्या मायने है ?
उ.- एक छोटे से गाँव से आया हुआ स्कूल फेल आदमी, अपनी मेहनत और लगन से ६४,००० करोड रुपये की कंपनी खडी करता है, दो MBA धारी आकर उसके २ टुकडे कर डालते हैं ।

अब देखी जायेगी यह फिल्म.
फिल्म देखनी पड़ेगी गुरू.
MBA सही अर्थ स्व. धीरू भाई के मायने में था ” मने बधु आवड़े” यानि मुझे सब आता है!
जरूर दे्खनी पड़ेगी यह फ़िल्म क्यों कि एक दिन में दूसरी समीक्षा पढ़ी है इस फिल्म के बारे में। उत्सुकता बढ़ गयी है। और नितिन भाइ आप तो अच्छे फ़िल्म समीक्षाकार बनते जा रहे हो, बधाई।
देखते हॆ क्य़ा गुल खिळया है आभिशेक ने. वैसे MBA वाळा जोके अच्छा है
शुक्रिया समीर जी, संजय जी, सागर जी एवं मूनी जी, आपकी टिप्पणियों के लिये
hey nitin.. why its that in Indian movies they try to portry hero as a good man always, acting wise its grt, but I thnk Maniratnam smewhere lost the movie in second half….
anyways grt analysis once again.. keep goin
ham hi hainupar dariyo mat….
जाने क्यों मुझे तो अभिषेक बच्चन फ़िल्म की कमज़ोरी लगे। लगा की अनिल अंबानि ने सिफ़ारिश से रोल दिलाया होगा। खैर क्या फ़र्क पड़ता है। अच्छि समी़क्शा है नितिन जी।
फ़ेव/अखंड, जो बिकता है, वही परदे पर दिखता है…वैसे ऐसा नही है कि सभी हिन्दी सिनेमा नायक को अच्छा ही बताते हों…
नितिन जी, अपना अपना नजरिया है…, पर जिस आदमी ने अभिषेक बच्चन से ‘युवा’ में अभिनय करवाया, उसके लिये अंबानी की जरूरत तो शर्तिया नही पडेगी…
वैसे लगता है आपन ऐश के चक्कर में अभिषेक से खफा हैं

Arre bhai aapki samiksha padh li ab yeh chalchitra hum jaroor dekhenge,aise yeh bata tune blood diamond dekhi ki nahi,i m planning to go this weekend,tere samiksha mil jati to paise bach jaate….
aajkal kam likh rahe ho….aisa kyu? achcha he.. teri kuchh kuchh cheeze specially padhne ke liye blog khol leta hu ….
bhai i saw the movie, find the end to be too dramatic no connection to reality, if some law is “wrong” it doesnt mean you can butter your way out.I feeel that the end led the film down.
Par film hai isliye kuch bhi ho sakta hai and I agree that abhishek is really good, the song after the twins is scrap.