एक सवाल, एक टिप्पणी
December 14, 2006 by Nitin Bagla
पिछले दिनों एक दस दिवसीय कार्यशाला आयोजित करवाई थी । कुछ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभागी भी थे। आखिरी दिन दो अलग अलग मेहमानों ने दो अलग अलग बातें कहीं
भोजन करते वक्त सेनेगल के एक प्रतिभागी पूंछ बैठे, “क्या आपके यहाँ हमेशा खडे होकर भोजन करने की परंपरा है?”
मैं अवाक रह गया । लेकिन प्रश्न अपनी जगह सही था, मैने गौर किया तो पाय कि पिछले १० दिन में भी टेबल कुर्सी की व्यवस्था होने के बावजूद अधिकतर लोग खडे होकर बातें करते हुए भोजन कर रहे थे ।
खैर, मैं काफ़ी देर तक उन्हे समझाता रहा कि परम्परागत रूप से तो भारत में जमीन पर बैठ कर भोजन किया जाता है पर…जमाना बदल रहा है।
एक अन्य टिप्पणी खुश कर देने वाली थी, सेनेगल के ही एक अन्य प्रतिभागी बोले, “मैं अपनी जिन्दगी में कभी नही सोंच सकता था कि मैं इतने दिन तक माँस खाये बिन रह पाऊँगा । मैं विश्वास नही कर सकता कि शाकाहारी भोजन भी इतने तरीके से पकाया और खाया जा सकता है कि माँसाहार की जरूरत ही महसूस नही होती ।”(वैसे उन्हे दिन में एक बार निरामिष भोजन उपलब्ध कराया जाता था, पर पता नही वो खाते थे या नही) जाते जाते बोले, मैं अपने देश जाकर भी इन सब चीजों को बनाने/खाने की कोशिश करूंगा…वाह जी वाह…सेनेगल में आलू का परांठा :), क्या कहने ![]()


“…कितने आदमी थे….
2,542 ठोकरें खा चुका हूँ..”
अंदाज़ निराला है… मेरा ठोकर 2543 वां रहा होगा. इसे याद रखिएगा…
अपनी शारीरिक संरचना के हिसाब से मनुष्य मूलतः शाकाहारी प्राणी है . मांसाहार आदिम अवस्था का अवशेष है . इधर वैज्ञानिकों ने शाकाहार को अच्छे स्वास्थ्य से भी जोड़ कर देखा है . हां कुछ समुदायों के मांसाहारी होने के भौगोलिक कारण हैं .
पर परम्परा और रुचि-भेद के कारण इसके नैतिक और अनैतिक के रूप में सामान्यीकरण से बचना ही बेहतर होगा .
हां, शाकाहार और अच्छे स्वास्थ्य के सह-संबंध के अध्ययन को वैज्ञानिक और चिकित्सीय प्रयोगों/आधार द्वारा स्थापित और प्रचारित किया जाना चाहिये .
Bhrata shree,
Aap to international ho gaye, ye batao i was just guessin how did you kept urself awake thru all this lectures.giv me an honest ans
Alok
रवि जी, कोशिश करते हैं कि हर ठोकर याद रहे…
प्रियंकर जी, शाकाहार पर आपके विचारों से सहमत हूं