पिछले २-३ महीनों से मैं नियमित रूप से फ़िल्में देख पा रहा हूं, एक तो नौकरी लगने के बाद से सप्ताहांत थोडे फ़्री मिल ही जाते हैं…और यहाँ हैदराबाद में टिकट दरें एक दम जेब को माफ़िक आती हैं…५० रुपये के अन्दर अन्दर आप किसी भी टाकिज में फ़िल्म देख लीजिये (मल्टीप्लेक्स, Imax आदि छोडकर)..
शुरुआत की एक दो फ़िल्में हमने मल्टीप्लेक्स में जाकर देखी, पर कुल मिलाकर वो जेब कटाना साबित हुआ..एक तो २ दिन पहले सीट बुक कराओ…फ़िर भी साले आगे की सीट दे देंगे…फ़िर सीटें एकदम घटिया, पैर फ़ैलाने की जगह नही, पुशबेक भी नही…और कुछ खानापीना भी साथ नही ले जाने देते…वहीं खरीद के खाओ(याने फ़िर जेब कटाओ)…हाँ ‘पब्लिक’ सही आती है…पर इतने पैसे(१००/- से १८०/-) सिर्फ़ ‘पब्लिक’ को देखने के लिये तो खर्चा नही न करेंगे….वो तो हम मुफ़्त में Eat Street पे जाके देख लेंगे…सो हम साधारण टाकिज में ही जाते हैं…पुशबेक सीट, आगे पैर फ़ैलाने की अच्छी जगह..और ३५-५० रुपये मात्र…
तो मैं कह रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है….बोले तो..कैसा…
‘कभी अलविदा ना कहना’…. महा बकवास फ़िल्म हमें लगी, पर वो हिट हो रही है (इंडिया कि रिपोर्ट्स का पता नही, पर अमेरिका में तो…)
‘फ़ना’ बिल्कुल बेकार फ़िल्म लगी….सुपरहिट हुई है
‘कृष’ में भी कुछ खास नही लगा…वो भी सुपरहिट
और ‘ओम्कारा’ हमें खूब पसंद आयी…बेचारी फ़्लोप हो गयी !!!
ऐसा मेरे साथ(या उन फ़िल्मों के साथ) क्यों हो रहा है ?
मेरे ख्याल में सारे के सारे फ़िल्म निर्माता लाईन लगा कर सबरिमाला और हाजीअली पर प्राथर्ना करने में लगे हैं कि भाई उनकी फ़िल्म नितिन बागला को महाबकवास लगे! आखिर हमें समझ आ ही गया कि भारत के सिनेमा उद्योग के घटिया होने में किसका हाथ है!
फिल्मों को हिट कराते हैं वो देखने वाले जो दिमाग को घर पर छोड़कर फ़िल्म देखने जाते हैं (हिन्दी फ़िल्मों के बारे में लागू)
अब अगली बार आप अपना दिमाग घर पर छोड़ कर जाएँ, फ़िल्म हिट होगी तो लगेगी भी!
ठीक यही बात हम लिखने वाले थे, परतुं घटीया फिल्मे हीट करवाने के आरोप से बच गये. यह आरोप आप पहले लिख कर अपने सर ले लिया हैं
ये फ़िल्म पसन्द नहीं करने का क्या शुल्क लेते हो आप?
[...] नितिन को समझ में नहीं आ रहा कि आजकल फ़िल्मों का हिट-फ़्लॉप होना उनकी पसंद-नापसंद से कैसे जुड़ गया है. [...]
भई अाप खुशनसीब समझें खुद को, कि फिल्में देख तो पा रहे हैं। अच्छी लगे न लगे वो अलग बात। यहां तो मल्टीप्लेक्स के अलावा कुछ है ही नहीं, और कीमत कुछ ५ से १० यूरो के बीच। सप्ताहांत पर कीमत अधिक, सप्ताह के बीच में कम।
क्रिश और ओमकारा अच्छी फ़िल्में हैं. बाक़ी तो अपन ने देखी ही.. आप क्यों देखते हो भैये. करण जोहर की पहली फ़िल्म कुकुहोहै के बाद बकवास लगी. फ़ना अपने को देखनी ही नहीं.
सच यार, मल्टीप्लैक्स में बहोत खर्चा होता है. सहेली या मित्र साथ हों तो समझो गए पांच छह सौ.
कभी अलविदा कहां से हिट हो गई। सब बोल रहे हैं महाबकवास है यार।
फना देखकर जहां से फना होने जाने की इच्छा हुई थी।
कृष सुना ठीक थी थोडी।
ओम्कारा में सुना बहुत गालियां थीं, परिवार के साथ कोई नही देख सकता, महिलाओं को पसंद नही आई।
सुनील जी,संजय जी, सागर जी….टिप्पणी का और ‘मजे लेने का’ शुक्रिया
क्षितिज जी, वाकई ५-१० यूरो बडे भारी पडते होंगे..पर आजकल इन्टरनेट पर भी फ़िल्में आसानी से उपलब्ध हो जाती है…हाँ पर उसनें हाल जैसा मजा ना आये
नीरज जी, आपकी हमारी (ना)पसंद एक जैसी ही है
ई छाया, कअनाक ने विदेशों में रिकार्ड तोड कमाई की है, indiafm व rediff पर पढा था, हां अपने यहां की कह सकता हूँ कि जिसने देखी, अपना माथा ही पीटा
नितिन जी, आंकड़ों की माया पर मत जाइए, ” कअविदा” इस वर्ष की सबसे बड़ी फ्लॉप फ़िल्म है। ज़रा सिनेमाहॉल का चक्कर लगा कर देखिए, उल्लू बोल रहे हैं। फ़ना और कृश के आंकड़े भी बड़ॆ बढ़ा-चढ़ा कर बताए जा रहे हैं, आप ही बताइए, कितने लोगों ने ये फ़िल्में दोबारा देखी हैं? फ़िल्म तब हिट होती है जब वह लंबे अर्से तक चले, जैसे “शोले”। पर आजकल तो हिट कहलाने का फ़ार्मूला यह है कि 200 रु. टिकिट के दाम रखो, 10 शो रखो दिन के और चार दिन की कमाई के हिसाब दिखा कर एलान करो कि इतनी कमाई की है इसलिये फ़िल्म हिट है। यह बात और है कि फिल्म पांच महीने भी न चले।
शेखचिल्ली, आपकी बात से सहमत हूँ, मैं फ़िल्म की रिलीज के दिन शाम का शो देखने गया था, और मेरे आगे की करीबन ५ पंक्त्तियाँ बिल्कुल खाली थी…., ये भी कि कोई फ़ोकट में भी इसे दोबारा देखना पसंद नही करेगा.
पर शायद NRI जनता को ये फ़िल्म खूब पसंद आयी है…विदेशों में रिकार्ड तोड कमाई की खबरें यहां पढें
http://www.indiafm.com/trade/overseas_boxoffice/index.html
http://in.rediff.com/movies/2006/aug/16kank.htm
अरे भाई “कभी अलविदा..” की याद ना दिलायें, कल ही झेली है..
badhiya hai…ye hindi format bada pasand aya hame…!
KANK pe apse pura agreement rakhte hain.