इस सप्ताहांत पर दो फ़िल्में देखीं, ओंकारा और फ़ना.
फ़ना काफ़ी पहले रिलीज हो गई थी पर हम देख नही पाए थे..फ़िल्म में खास कुछ नही है, सिवा आमिर-काजोल की जोडी के. मध्यांतर से पहले खूब शेर-ओ-शायरी है, जिस पर पब्लिक ने खूब तालियां/सीटियां मारी, हैदराबाद में मैने पहली बार देखा कि लोग सीटियां मार रहे थे, और कमेन्ट्स दे रहे थे…नही तो यहां पब्लिक इतना चुप चाप फ़िल्म देखती है मानो लगता है मय्यत में आये हैं. पर अपन को वो शेर-ओ-शायरी बिल्कुल चवन्नाछाप लगी…और फ़िल्म की कहानी का तो कहना ही क्या…सच कहता हूं अगर आमिर-काजोल नही होते तो फ़िल्म शायद ३ दिन भी नही चलती. काजोल जबरदस्त लगी…(पर अपन को काजोल DDLJ के गाने “मेरे ख्वाबों में जो आये“..में जैसी लगी वैसी फ़िर कभी नही लगी…:) )खैर, लिखने लायक ज्यादा कुछ नही है फ़ना के बारे में….
अब आते हैं ओंकारा पर…फ़िल्म धांसू है, इसमें कोई शक नही….जैसा कि सबको पता है, ये शेक्स्पीयर के नाटक ओथेलो पर आधारित है…अतः कहानी में कुछ नया तो नही है, दो प्रेमी, प्रेम में शक, बुरा दोस्त/साथी जो शक के बीज डालता है आदि के घालमेल से सैंकडों फ़िल्में बनी होंगी, पर विशाल भारद्वाज ने कहानी को जो ‘ट्रीटमेंट’ दिया है वो वाकई काबिले तारीफ़ है.
फ़िल्म की जान हैं…..१) फ़िल्म के संवाद २)उसके बाद कलाकारों का अभिनय और फ़िर ३) संगीत….इन सबके साथ साथ बेहद खूबसूरती से फ़िल्माये गये द्र्श्य…फ़िल्म की प्रष्ठ्भूमि उत्तर प्रदेश की है, पर शायद फ़िल्मांकन महाराष्ट्र के किसी इलाके में हुआ है….
बहुत समय बाद कोई फ़िल्म ऐसी देखी, जिसे देखने के बाद बाहर निकल कर मैं उसके संवाद दोहरा रहा था….फ़िल्म में गालियों का भरपूर प्रयोग किया गया है, सो शायद किसी-किसी को वो खल सकता है, लेकिन मेरे हिसाब से यही बात फ़िल्म को बहुत जाना पहचाना सा बनाती है, विशेषकर अगर आप कभी UP/बिहार के किसी गांव में रहे हॊ….इसके मद्देनजर हम ये सलाह देंगे कि अपनी महिला मित्र के साथ ये फ़िल्म ना ही देखने जाएं…आप खुल कर हंस भी नही पायेंगे…हां अगर दोस्तो के साथ जायेंगे तो जमकर मजा लेंगे….हैदराबाद में शायद लोगों को संवाद समझ ना आ पाये हों पर उत्तर भारत में खूब तालियां मिलेंगी ये अपनी गारंटी…इसके साथ ही पात्रों के नाम काफ़ी स्ट्राइकिंग हैं…(मिसाल बिपासा उर्फ़ ‘बिल्लो चमनबहार’)
अभिनय के लिहाज से सैफ़ के केरियर की सबसे अच्छी फ़िल्म…”लंगडा त्यागी” लम्बे समय तक याद रखा जायेगा, अजय देवगन के बारे में कुछ नही कहूंगा, वो पहले भी कई बार ऐसे रोल कर चुके हैं खासकर जिस फ़िल्म में उन्हे आंखों से बोलना होता है(पढें गंभीर अभिनय ). कोंकना सेन शर्मा….उफ़्फ़्फ़….एकदम ‘नेचुरल’…. एक संवाद “हंसी बडी मंहंगी हो रखी है आजकल” अभी भी मेरे कानो में गूंज रहा है….विवेक ओबेराय और करीना, ठीक ठाक थे, और बिपासा…इनके हिस्से में दो जबरदस्त आयटम नम्बर थे (’बीडी’ और ‘नमक’)…लेकिन मैं यही कहूंगा कि इन्हे डांस करना नही ही आता..अगर यही गाने शिल्पा शेट्टी को दे देते तो फ़ोड डालती…हां गानों की सिचुएशन ऐसी है कि बुरा नाच भी अखरता नही है…
हिमेश रेशमिया के जमाने मे विशाल भारद्वाज बहुत सुकून देते हैं ”जग जा री गुडीया” बहुत ही मीठा बन पडा है बहुत मीठी लोरी जैसा…मुझे सदमा के गाने ‘सुरमई अंखियों में…‘ की याद दिला रहा था…’बीडी’ और ‘नमक’ सुन कर लग रहा था कि सीट छोड कर नाचने लगें..पर ये अलवर तो नही न था..टाइटल ट्रेक भी जोश भरा है. गुलजार साहब के बोल और उपमाएं वाकई जादू हैं(गौर करें…”आंखें तेज ततैया जैसे जीभ सांप का फ़ुंकारा“).
कुलमिला कर विशाल भारद्वाज ने एक अच्छा पैकेज दिया है. ‘मकडी’ बच्चों की फ़िल्म कही गई थी, और ‘मकबूल’ काफ़ी गंभीर थी..कई जगह ऊपर से निकलने जैसी..पर ‘ओंकारा’ में अच्छा मसाला भरा है…एक बार जरूर चखिये…अच्छा लगेगा..”नमक इस्क का”
ओमकारा देखने की इच्छा है. विशाल बहुत ही प्रतिभावान निर्देशक है
फना घटिया से भी घटिया फिल्म है
ऒंकारा देखनी पडेगी लग रहा है।
फना , मत पूछो यार इतनी घटीया फिल्म तो मिथुन दा की भी नही होती
आशीष भईया सँभल के! मिथुन दा के अपुन फैन हैं।
Lagta hai apun ko dkhni hi paregi, namak ishak ka chakna hi mangta hai….
फना तो हमहूं देखे रहे भइया, सर घूम गया रहा। आमिर अब इतना बुढ्ढा लगने लगा है कि रोमांटिक रोल में ऐसा लगता है जैसा नीम पर चढा करैला।
reading hindi after pretty long, nice review
अरे इ का बबुआ, नयी नयी सलीमा की तारीफ़ किए जात हो। इधर कुवैत मे फिर से डीवीडी पर बैन लग गया रे….
हम फिर से पायरेटेड वीडीओ कैसेट के जमाने मे लौट गए, जिसमे अच्छी सी अच्छी फिल्म भी घटिया दिखती है। अब इन्तजार है भारत से आने वाले साथियों का कुछ नयी डीवीडी लाएं तो तनिक चैन आए।तब तक राम राम।
पश्चिमि उत्तर प्रदेश की बोली हूबहू दिखती है
फ़िल्म हरियाना तथा दिल्ली प्रदेश मैं HIT होनै की पूर्ना सम्भाव्ना है